ख़ुद को भूखा ही रखा और कमाई रोटी

तब कहीं बाप ने बच्चों को खिलाई रोटी

उस की मेहनत के ही सदक़े में मिली है हम को
उस ने जल जल के है खेतों में उगाई रोटी

बा'द मुद्दत के मिरे गांव को लौटा जब मैं
अपने हाथों से मेरी माँ ने खिलाई रोटी

और मांगेगा भी क्या इस के सिवा बूढ़ा फ़क़ीर
एक कंबल हो अगर, और दो ढाई रोटी

हम ने खूँ दे के बनाया है ज़मीं को ज़रखेज़
तब कहीं जा के तिरे हाथ में आई रोटी

उस के चेहरे पे ख़ुशी देखने के लायक़ थी
उस ने जब पहली दफ़ा गोल बनाई रोटी

मैं ने कल शब जो सबब रोने का पूछा उस से
उस ने चंदा में इशारे से दिखाई रोटी

— Afzal Ali Afzal

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