Gulzar

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Mumbai· India

Gulzar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Gulzar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher(24)
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Sher

आदतन तुम ने कर दिए वादे आदतन हम ने ए'तिबार किया — Gulzar
कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है ज़िन्दगी एक नज़्म लगती है — Gulzar
दिल पर दस्तक देने कौन आ निकला है किस की आहट सुनता हूँ वीराने में — Gulzar
बे-सबब मुस्कुरा रहा है चाँद कोई साज़िश छुपा रहा है चाँद — Gulzar
ये शुक्र है कि मिरे पास तेरा ग़म तो रहा वगर्ना ज़िंदगी भर को रुला दिया होता — Gulzar
ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में एक पुराना ख़त खोला अनजाने में — Gulzar
हम ने अक्सर तुम्हारी राहों में रुक कर अपना ही इंतिज़ार किया — Gulzar
कितनी लंबी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ उन से कितना कुछ कहने की कोशिश की — Gulzar
कभी तो चौंक के देखे कोई हमारी तरफ़ किसी की आँख में हम को भी इंतिज़ार दिखे — Gulzar
इक ख़्वाब ने आँखें खोली हैं क्या मोड़ आया है कहानी में वो भीग रही है बारिश में और आग लगी है पानी में — Gulzar
ज़ख़्म कहते हैं दिल का गहना है दर्द दिल का लिबास होता है — Gulzar
ज़िंदगी पर भी कोई ज़ोर नहीं दिल ने हर चीज़ पराई दी है — Gulzar
चंद उम्मीदें निचोड़ी थीं तो आहें टपकीं दिल को पिघलाएँ तो हो सकता है साँसें निकलें — Gulzar
रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले क़रार दे के तिरे दर से बे-क़रार चले — Gulzar
तुम्हारे ख़्वाब से हर शब लिपट के सोते हैं सज़ाएँ भेज दो हम ने ख़ताएँ भेजी हैं — Gulzar
हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते — Gulzar
जिस की आँखों में कटी थीं सदियाँ उस ने सदियों की जुदाई दी है — Gulzar
शाम से आँख में नमी सी है आज फिर आप की कमी सी है — Gulzar

Ghazal

काँच के पीछे चाँद भी था और काँच के ऊपर काई भी तीनों थे हम वो भी थे और मैं भी था तन्हाई भी यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं सोंधी सोंधी लगती है तब माज़ी की रुस्वाई भी दो दो शक्लें दिखती हैं इस बहके से आईने में मेरे साथ चला आया है आप का इक सौदाई भी कितनी जल्दी मैली करता है पोशाकें रोज़ फ़लक सुब्ह ही रात उतारी थी और शाम को शब पहनाई भी ख़ामोशी का हासिल भी इक लंबी सी ख़ामोशी थी उन की बात सुनी भी हम ने अपनी बात सुनाई भी कल साहिल पर लेटे लेटे कितनी सारी बातें कीं आप का हुंकारा न आया चाँद ने बात कराई भी — Gulzar
ओस पड़ी थी रात बहुत और कोहरा था गर्माइश पर सैली सी ख़ामोशी में आवाज़ सुनी फ़रमाइश पर फ़ासले हैं भी और नहीं भी नापा तौला कुछ भी नहीं लोग ब-ज़िद रहते हैं फिर भी रिश्तों की पैमाइश पर मुँह मोड़ा और देखा कितनी दूर खड़े थे हम दोनों आप लड़े थे हम से बस इक करवट की गुंजाइश पर काग़ज़ का इक चाँद लगा कर रात अँधेरी खिड़की पर दिल में कितने ख़ुश थे अपनी फ़ुर्क़त की आराइश पर दिल का हुज्रा कितनी बार उजड़ा भी और बसाया भी सारी उम्र कहाँ ठहरा है कोई एक रिहाइश पर धूप और छाँव बाँट के तुम ने आँगन में दीवार चुनी क्या इतना आसान है ज़िंदा रहना इस आसाइश पर शायद तीन नुजूमी मेरी मौत पे आ कर पहुँचेंगे ऐसा ही इक बार हुआ था ईसा की पैदाइश पर — Gulzar
फूल ने टहनी से उड़ने की कोशिश की इक ताइर का दिल रखने की कोशिश की कल फिर चाँद का ख़ंजर घोंप के सीने में रात ने मेरी जाँ लेने की कोशिश की कोई न कोई रहबर रस्ता काट गया जब भी अपनी रह चलने की कोशिश की कितनी लंबी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ उन सेे कितना कुछ कहने की कोशिश की एक ही ख़्वाब ने सारी रात जगाया है मैं ने हर करवट सोने की कोशिश की एक सितारा जल्दी जल्दी डूब गया मैं ने जब तारे गिनने की कोशिश की नाम मिरा था और पता अपने घर का उस ने मुझ को ख़त लिखने की कोशिश की एक धुएँ का मर्ग़ोला सा निकला है मिट्टी में जब दिल बोने की कोशिश की — Gulzar
पेड़ के पत्तों में हलचल है ख़बर-दार से हैं शाम से तेज़ हवा चलने के आसार से हैं नाख़ुदा देख रहा है कि मैं गिर्दाब में हूँ और जो पुल पे खड़े लोग हैं अख़बार से हैं चढ़ते सैलाब में साहिल ने तो मुँह ढाँप लिया लोग पानी का कफ़न लेने को तय्यार से हैं कल तवारीख़ में दफ़नाए गए थे जो लोग उन के साए अभी दरवाज़ों पे बेदार से हैं वक़्त के तीर तो सीने पे सँभाले हम ने और जो नील पड़े हैं तिरी गुफ़्तार से हैं रूह से छीले हुए जिस्म जहाँ बिकते हैं हम को भी बेच दे हम भी उसी बाज़ार से हैं जब से वो अहल-ए-सियासत में हुए हैं शामिल कुछ अदू के हैं तो कुछ मेरे तरफ़-दार से हैं — Gulzar
गुलों को सुनना ज़रा तुम सदाएँ भेजी हैं गुलों के हाथ बहुत सी दुआएँ भेजी हैं जो आफ़्ताब कभी भी ग़ुरूब होता नहीं हमारा दिल है उसी की शुआएँ भेजी हैं अगर जलाए तुम्हें भी शिफ़ा मिले शायद इक ऐसे दर्द की तुम को शुआएँ भेजी हैं तुम्हारी ख़ुश्क सी आँखें भली नहीं लगतीं वो सारी चीज़ें जो तुम को रुलाएँ, भेजी हैं सियाह रंग चमकती हुई कनारी है पहन लो अच्छी लगेंगी घटाएँ भेजी हैं तुम्हारे ख़्वाब से हर शब लिपट के सोते हैं सज़ाएँ भेज दो हम ने ख़ताएँ भेजी हैं अकेला पत्ता हवा में बहुत बुलंद उड़ा ज़मीं से पाँव उठाओ हवाएँ भेजी हैं — Gulzar

Nazm

वक़्त को आते न जाते न गुज़रते देखा न उतरते हुए देखा कभी इल्हाम की सूरत जमा होते हुए इक जगह मगर देखा है शायद आया था वो ख़्वाबों से दबे पाँव ही और जब आया ख़यालों को भी एहसास न था आँख का रंग तुलु होते हुए देखा जिस दिन मैं ने चूमा था मगर वक़्त को पहचाना न था चंद तुतलाए हुए बोलों में आहट भी सुनी दूध का दाँत गिरा था तो वहाँ भी देखा बोसकी बेटी मिरी चिकनी सी रेशम की डली लिपटी-लिपटाई हुई रेशमी तांगों में पड़ी थी मुझ को एहसास नहीं था कि वहाँ वक़्त पड़ा है पालना खोल के जब मैं ने उतारा था उसे बिस्तर पर लोरी के बोलों से इक बार छुआ था उस को बढ़ते नाख़ूनों में हर बार तराशा भी था चूड़ियाँ चढ़ती उतरती थीं कलाई पे मुसलसल और हाथों से उतरती कभी चढ़ती थीं किताबें मुझ को मालूम नहीं था कि वहाँ वक़्त लिखा है वक़्त को आते न जाते न गुज़रते देखा जम'अ होते हुए देखा मगर उस को मैं ने इस बरस बोसकी अठारह बरस की होगी चंद तुतलाए हुए बोलों में आहट भी सुनी दूध का दाँत गिरा था तो वहाँ भी देखा बोसकी बेटी मिरी चिकनी सी रेशम की डली लिपटी-लिपटाई हुई रेशमी तांगों में पड़ी थी मुझ को एहसास नहीं था कि वहाँ वक़्त पड़ा है पालना खोल के जब मैं ने उतारा था उसे बिस्तर पर लोरी के बोलों से इक बार छुआ था उस को बढ़ते नाख़ूनों में हर बार तराशा भी थाचूड़ियाँ चढ़ती उतरती थीं कलाई पे मुसलसल और हाथों से उतरती कभी चढ़ती थीं किताबें मुझ को मालूम नहीं था कि वहाँ वक़्त लिखा है वक़्त को आते न जाते न गुज़रते देखा जम'अ होते हुए देखा मगर उस को मैं ने इस बरस बोसकी अठारह बरस की होगी — Gulzar