हम तो कितनों को मह-जबीं कहतेआप हैं इस लिए नहीं कहतेचाँद होता न आसमाँ पे अगरहम किसे आप सा हसीं कहतेआप के पाँव फिर कहाँ पड़तेहम ज़मीं को अगर ज़मीं कहतेआप ने औरों से कहा सब कुछहम से भी कुछ कभी कहीं कहतेआप के बा'द आप ही कहिएवक़्त को कैसे हम-नशीं कहतेवो भी वाहिद है मैं भी वाहिद हूँकिस सबब से हम आफ़रीं कहते— Gulzar