"दो सौंधे सौंधे से जिस्म जिस वक़्त"दो सौंधे सौंधे से जिस्म जिस वक़्तएक मुट्ठी में सो रहे थेलबों की मद्धम तवील सरगोशियों में साँसें उलझ गई थींमुँदे हुए साहिलों पे जैसे कहीं बहुत दूरठंडा सावन बरस रहा थाबस एक रूह ही जागती थीबता तू उस वक़्त मैं कहाँ था?बता तू उस वक़्त तू कहाँ थी?— Gulzar