Raj Tiwari

Raj Tiwari

@rajti3910096

Raj Tiwari 'Azlan' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Raj Tiwari 'Azlan''s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ख़ामुशी जिन को समझदार बनाती है 'राज' अपनी आवाज़ को वो लोग तरस जाते हैं — Raj Tiwari
ज़मीं भी वही है वही आसमाँ है नए साल में कुछ नया सा कहाँ है — Raj Tiwari
लगी इक उम्र मुझे टुकड़ों को समेटने में फिर एक उम्र से मैं दिल को दिल बना रहा हूँ — Raj Tiwari
मेरी और उस की कहानी एक सी है ग़ालिबन रो पड़ा है वो जो मेरी दास्ताँ सुनते हुए — Raj Tiwari
बहुत देर कर दी है मिलने में मैं ने मिरे हाथ ख़ाली हैं मैं क्या दूँ ख़ुद को — Raj Tiwari
शीशे के टूटने पर शोर मचा आदमी टूटा तो ख़ामोश हुआ — Raj Tiwari
वक़्त पर कामयाब होना दोस्त वक़्त वरना बहुत लगेगा दोस्त — Raj Tiwari
चलो की फिर मिलेंगे दोनों पहली बार की तरह कभी मिले थे दिल जहाँ पे ग़म-गुसार की तरह — Raj Tiwari
लबों को कुछ तो नए साल क़हक़हे देना पुरानी आँखों को कुछ ख़्वाब अब नए देना — Raj Tiwari
मिरी जगह कोई और उस की जगह कोई और कहानी तो नहीं बदली बदल गए किरदार — Raj Tiwari
ख़्वाब टूटा तो नींद रूठ गई नींद टूटी तो ख़्वाब भी ले उड़ी — Raj Tiwari
ये बर्ग-ए-गुल हैं मौसम-ए-बहार के जो दिल पे छाले पड़ गए हैं प्यार के — Raj Tiwari
न कश्ती पर न साहिल पर न ही दरिया पर आएगा अगर तू डूबा तो इल्ज़ाम तेरे ही सर आएगा — Raj Tiwari
अच्छी क़ीमत मिली है मुझ को मिरी ग़ज़लों की मैं ने बाज़ार में बस आँसू का व्यापार किया — Raj Tiwari
झट से लगा लूँ गले उस को ग़म अपना बतलाए तो सही शख़्स आईने का आईने से बाहर आए तो सही — Raj Tiwari
मुरव्वतन नदी की इब्तिदा थी कोहसार से जो आदतन समंदरो में जा मिली है प्यार से — Raj Tiwari

Ghazal

चराग़-ए-दहर यूँँ जलता नहीं होता हवा का रुख़ अगर बदला नहीं होता रुकूँ तो फिर कोई मंज़िल नहीं दिखती चलूँ तो फिर कोई रस्ता नहीं होता वफ़ादारी अदाकारी नहीं होती हर इक के चेहरे पर चेहरा नहीं होता परी-ज़ादी हमें भी दिखती ये दुनिया अगर हम ने तुम्हें देखा नहीं होता असीर-ए-इश्क़ हूँ शहर-ए-मुहब्बत में जो तन्हाई में भी तन्हा नहीं होता खुलेंगी सब किताबें इश्क़ की उस जगह जहाँ पर जिस्म का पर्दा नहीं होता ये पौधे धूप में सँवला गए होते अगर इन के लिए गमला नहीं होता जो बनती जोड़ियाँ गर आसमानों में किसी के साथ फिर धोका नहीं होता मिरे होने से आख़िर क्या हुआ है 'राज' न होता मैं अगर तो क्या नहीं होता — Raj Tiwari
किनारे पर जो मिलता है समुंदर में नहीं रहता उसी पर आता है दिल जो मुकद्दर में नहीं रहता की पहले एक आईना सजाना तोड़ देना फिर ये भी तो इक हुनर है जो की शाइ'र में नहीं रहता अगर वो होते इंसाँ तो समझते फिर मुहब्बत को धड़कता हो अगर दिल तो वो पत्थर में नहीं रहता मिरे घर आए थे वो चाँद का रिश्ता लिए अपने ज़मीं का फूल तो उस के बराबर में नहीं रहता ख़ुदा से कैसे माँगू मैं मुकद्दर में उसे मेरे किनारा कोई भी हो पर वो सागर में नहीं रहता बिना तेरे मैं कैसे बाग़ से तेरे निकल आऊँ निकल आता अगर तो मैं मेरे घर में नहीं रहता ज़माना ये परिंदे को कब उड़ने देता है खुलकर परिंदा उड़ गया तो फिर वो पिंजर में नहीं रहता कभी आया था सिलने कोई टूटा हुआ दिल राज ये सीने का हुनर कोई रफ़ूगर में नहीं रहता — Raj Tiwari
मुझे देखने वाले सोचा करेंगे सभी फिर मुहब्बत से तौबा करेंगे जो कहते है ये वक़्त रुकता नहीं है अगर वक़्त रुक जाए तो क्या करेंगे नहीं कोई आएगा दिल में हमारे हम इस कमरे को इतना तन्हा करेंगे कहानी तुम्हारी नई तो नहीं है कि टूटे हैं दिल और टूटा करेंगे हमारी उदासी हमारी क़बा है हम अब इस की तासीर पैदा करेंगे तुम उस चाँद का अक्स हो इस ज़मीं पर तुम्हें देखने वाले देखा करेंगे हमारे ही आईने को चूम कर हम हर इक आँसुओं को सुनहरा करेंगे शजर काटते वक़्त सोचा नहीं क्यूँँ वो बे-घर परिंदे सभी क्या करेंगे हमें कामयाबी की दरकार है राज हम अब ख़्वाब अपने तराशा करेंगे — Raj Tiwari
ख़ाक से ख़ाक तलक का ये फ़साना होगा दिल तुम्हारा था तुम्हारा है तुम्हारा होगा मुस्तक़िल दस्तकें देते रहे ये सोच के हम बंद दरवाज़े के पीछे कोई रस्ता होगा रिश्तो में कुछ तो वफ़ा की नमी भी दीजिएगा सख़्त मिट्टी में भी पानी हो तो पौधा होगा शाम होते ही उसी शख़्स की याद आती है जिसे हम ने कभी सोचा था हमारा होगा ये ग़ज़ल-गोई विरासत में नहीं मिलती है ये हुनर आप को अश्कों से कमाना होगा इश्क़ बदनाम गली है न गुज़रना यहाँ से आप के पास जो कुछ भी है गवाना होगा आसमानों की उड़ानों से उतरने के बा'द सूखी डाली ही परिंदों का ठिकाना होगा — Raj Tiwari
अब ये भी हौसला हम आज़मा के देखते हैं इस चराग़-ए-दिल-ओ-जाँ को जला के देखते हैं इस ज़माने की अदा हम को कभी आई नहीं कैसे जाते हुए को मुस्कुरा के देखते हैं आप के बा'द बस इक आप की तस्वीर रखी जिसे सीने से हम अपने लगा के देखते हैं ओढ़कर धूप जो ये बाद-ए-सबा आई है दर-ओ-दीवार भी पर्दा हटा के देखते हैं कोख से बस्तियों की एक धुआँ उठता है रास्ते हाथ दुआ में उठा के देखते हैं लहरों पर नाम लिखे आँधियों से दोस्ती की लहरों को कश्तियों में जो सजा के देखते हैं आप भी तीर चलाने का हुनर जारी रखे हम भी अब अपना जिगर आज़मा के देखते हैं — Raj Tiwari
राह-ए-इश्क़ एक हसीं मुझ को सफ़र लगता है पर मुझे मंजिलों से इश्क़ के डर लगता है शाख़-ए-दिल पर यूँँ गुलाबों का शजर लगता है हम-सफ़र तुम सा हो तो सीधा डगर लगता है शाम थक हार के जब काम से घर जाता हूँ माँ को आवाज़ दूँ तो घर मेरा घर लगता है यूँँ ज़मीं पर दिलों की ग़ज़लें नहीं फूटती हैं लफ़्ज़ों को सींचने में ख़ून-ए-जिगर लगता है टूटी कश्ती में उतरता हुआ दरिया मानो जैसे सदियों का कोई प्यासा बशर लगता है किसी की राह के पत्थर हटा दो हो सके तो फिर सफ़र ज़िन्दगी का एक सफ़र लगता है आज भी धड़कनें उस से मेरी वाबस्ता हैं दर्द उठता है उधर और इधर लगता है — Raj Tiwari
उड़ रहे हैं सब परिंदे घर सजाने के लिए हम ने भी तो जाने से पहले कई वादे लिए आख़िरस मैं कौन से मुखड़े पे करता एतबार वो जब आया भी तो आया चहरे पर चहरे लिए तुम मुहब्बत से नवाज़ो नफरतों को भी कभी कीजिए साया कभी सूखे दरख़्तो के लिए मेरे दरवाज़े पे दस्तक होगी तेरी एक दिन ख़्वाब ठहरें हैं इन आँखों में कई लम्हे लिए मैं जहाँ से लौट आया था सफ़र में हार कर बस ख़डी थी ज़िंदगी उस मोड़ पर मेरे लिए एक घर सूखा पड़ा था मुद्दतों से शहर में दूर से आई है बारिश फिर से नज़राने लिए इक किनारा ख़ामुशी से देखता है जब मुझे तब मचलता है समुंदर पानी में लहरे लिए कोई सुनता ही नहीं है ख़ामुशी की जब सदा 'राज' क्यूँ सब दर-ब-दर फिरते हैं आवाज़े लिए — Raj Tiwari