Gulzar

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    मुझको इतने से काम पे रख लो
    जब भी सीने में झूलता लॉकेट
    उल्टा हो जाये तो मैं हाथों से
    सीधा करता रहूं उसको

    जब भी आवेज़ा उलझे बालों में
    मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो
    'आह, चुभता है यह, अलग कर दो।'

    जब ग़रारे में पांव फंस जाये
    या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके
    इक नज़र देख लो तो काफ़ी है

    'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है
    लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है
    मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा

    मुझको इतने से काम पे रख लो
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    शाम से आँख में नमी सी है
    आज फिर आप की कमी सी है

    दफ़्न कर दो हमें कि साँस आए
    नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है

    कौन पथरा गया है आँखों में
    बर्फ़ पलकों पे क्यूँ जमी सी है

    वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
    आदत इस की भी आदमी सी है

    आइए रास्ते अलग कर लें
    ये ज़रूरत भी बाहमी सी है
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    दर्द हल्का है साँस भारी है
    जिए जाने की रस्म जारी है

    आप के ब'अद हर घड़ी हम ने
    आप के साथ ही गुज़ारी है

    रात को चाँदनी तो ओढ़ा दो
    दिन की चादर अभी उतारी है

    शाख़ पर कोई क़हक़हा तो खिले
    कैसी चुप सी चमन पे तारी है

    कल का हर वाक़िआ तुम्हारा था
    आज की दास्ताँ हमारी है
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    दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
    जैसे एहसाँ उतारता है कोई

    दिल में कुछ यूँ सँभालता हूँ ग़म
    जैसे ज़ेवर सँभालता है कोई

    आइना देख कर तसल्ली हुई
    हम को इस घर में जानता है कोई

    पेड़ पर पक गया है फल शायद
    फिर से पत्थर उछालता है कोई

    देर से गूँजते हैं सन्नाटे
    जैसे हम को पुकारता है कोई
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    कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ
    उन से कितना कुछ कहने की कोशिश की
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    कभी तो चौंक के देखे कोई हमारी तरफ़
    किसी की आँख में हम को भी इंतिज़ार दिखे
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    आइना देख कर तसल्ली हुई
    हम को इस घर में जानता है कोई
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    वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
    आदत इस की भी आदमी सी है
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    याद है एक दिन?
    मेरी मेज़ पे बैठे-बैठे
    सिगरेट की डिबिया पर तुमने
    एक स्केच बनाया था

    आकर देखो
    उस पौधे पर फूल आया है.
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    मैं सिगरेट तो नहीं पीता
    मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?"
    बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
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