zikr hota hai jahaan bhi mire afsaane ka | ज़िक्र होता है जहाँ भी मिरे अफ़्साने का

  - Gulzar

ज़िक्र होता है जहाँ भी मिरे अफ़्साने का
एक दरवाज़ा सा खुलता है कुतुब-ख़ाने का

एक सन्नाटा दबे-पाँव गया हो जैसे
दिल से इक ख़ौफ़ सा गुज़रा है बिछड़ जाने का

बुलबुला फिर से चला पानी में ग़ोते खाने
न समझने का उसे वक़्त न समझाने का

मैं ने अल्फ़ाज़ तो बीजों की तरह छाँट दिए
ऐसा मीठा तिरा अंदाज़ था फ़रमाने का

किस को रोके कोई रस्ते में कहाँ बात करे
न तो आने की ख़बर है न पता जाने का

  - Gulzar

Wahshat Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Gulzar

As you were reading Shayari by Gulzar

Similar Writers

our suggestion based on Gulzar

Similar Moods

As you were reading Wahshat Shayari Shayari