Shaheen Abbas

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@shaheen-abbas

Shaheen Abbas shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Shaheen Abbas's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

हमें इतनी बड़ी दुनिया का पता थोड़ी था जहाँ हम तुम हुआ करते थे वहाँ रह गए हम — Shaheen Abbas
तेरी ख़ुशबू को लुटाते हुए आते जाते बाक़ी बचता है जो इंसान कहाँ जाता है — Shaheen Abbas
इक नक़्श हो न पाए इधर से उधर मेरा जैसा तुम्हें मिला था मैं वैसा जुदा करो — Shaheen Abbas
मैं बार बार तुझे देखता हूँ इस डर से कि पिछली बार का देखा हुआ ख़राब न हो — Shaheen Abbas
मुझ से आगे नज़र आने में ख़ुशी थी उस की मेरी ज़ंजीर से ज़ंजीर बड़ी थी उस की — Shaheen Abbas
वो सामने था तो कम कम दिखाई देता था चला गया तो बराबर दिखाई देने लगा — Shaheen Abbas
वो इस तरह से मुझे देखता हुआ गुज़रा मैं अपने आप को बेहतर दिखाई देने लगा — Shaheen Abbas
मैं बाग़ में जिस जगह खड़ा हूँ हर फूल से काम चल रहा है — Shaheen Abbas

Ghazal

बोलते बोलते जब सिर्फ़ ज़बाँ रह गए हम तब इशारे से बताया कि कहाँ रह गए हम जाने किस किस के बराबर में यहाँ रह गए हम हम जो हमसाया-ए-दुनिया थे कहाँ रह गए हम हमें इतनी बड़ी दुनिया का पता थोड़ी था जहाँ हम तुम हुआ करते थे वहाँ रह गए हम हम मकीं भी थे मकाँ भी थे कि बाज़ार था गर्म फिर ख़सारा हुआ और सिर्फ़ मकाँ रह गए हम घर ही ऐसा था ये कुछ दोहरी मसहरी वाला अपना रहने के अलावा भी यहाँ रह गए हम पाँव दर्ज़ों में टिकाए हुए सर रख़नों में इस निहाँ-ख़ाने में रह रह के अयाँ रह गए हम एक आवाज़ के दो हिस्से हुए ठीक हुआ तुम वहाँ रह गए ख़ामोश यहाँ रह गए हम देर तक ख़ाली मकान ख़ाली नहीं छोड़ते हैं आप तब थे ही नहीं आप के हाँ रह गए हम एक रखना जो इन आँखों से उन आँखों तक है कैसा रह रह के दिखाता है कहाँ रह गए हम — Shaheen Abbas
मौजा-ए-ख़ून-ए-परेशान कहाँ जाता है मुझ से आगे मेरा तूफ़ान कहाँ जाता है चाय की प्याली में तस्वीर वही है कि जो थी यूँ चले जाने से मेहमान कहाँ जाता है मैं तो जाता हूँ बयाबान-ए-नज़र के उस पार मेरे हम-राह बयाबान कहाँ जाता है तेरी ख़ुशबू को लुटाते हुए आते जाते बाक़ी बचता है जो इंसान कहाँ जाता है बात यूँ ही तो नहीं करता हूँ मैं रुक रुक कर क्या बताऊँ कि मेरा ध्यान कहाँ जाता है आज मैं पहली दफ़ा साथ नहीं पीछे हूँ देखता हूँ मेरा सामान कहाँ जाता है घर बदलना तो बहाना है बहाना कर के अंदर अंदर ही से इंसान कहाँ जाता है कुछ बता तो सही ऐ ध्यान से जाते हुए शख़्स तू चला जाए तो फिर ध्यान कहाँ जाता है दास्ताँ-गो की निशानी कोई रक्खी है कि वो दास्ताँ-गोई के दौरान कहाँ जाता है रंग-ओ-रोग़न से तो लगता है मुसव्विर है वही आज फिर इतना परेशान कहाँ जाता है अब तो दरिया में बंधे बैठे हैं दरिया की तरह अब किनारों की तरफ़ ध्यान कहाँ जाता है — Shaheen Abbas
हम रह गए हमारा ख़लल क्यूँ नहीं रहा मुश्किल का एक हल था वो हल क्यूँ नहीं रहा मुड़ मुड़ के देखता हूँ वहीं का वहीं ग़ुबार मैं चल रहा हूँ रास्ता चल क्यूँ नहीं रहा वो मेरी गुफ़्तुगू से तो कब का निकल चुका अब मेरी ख़ामुशी से निकल क्यूँ नहीं रहा मौज़ूअ' को बदलता हूँ सफ़्हे उलटता हूँ मज़मून क्या बताऊँ बदल क्यूँ नहीं रहा मेरे और उस के बीच शब-ए-आख़िरीं का दाग़ इक आख़िरी चराग़ है जल क्यूँ नहीं रहा मैं ने कहा ख़ुदा से ख़ुदा ने कहा मुझे घर से कोई गली में निकल क्यूँ नहीं रहा इस रुख़ पे ऐसा क्या है जो उस की तरह का है पहलू बदल रहा हूँ बदल क्यूँ नहीं रहा — Shaheen Abbas
ज़मीं का आख़िरी मंज़र दिखाई देने लगा मैं देखता हुआ पत्थर दिखाई देने लगा वो सामने था तो कम कम दिखाई देता था चला गया तो बराबर दिखाई देने लगा निशान-ए-हिज्र भी है वस्ल की निशानियों में कहाँ का ज़ख़्म कहाँ पर दिखाई देने लगा वो इस तरह से मुझे देखता हुआ गुज़रा मैं अपने आप को बेहतर दिखाई देने लगा तुझे ख़बर ही नहीं रात मो'जिज़ा जो हुआ अँधेरे को तुझे छू कर दिखाई देने लगा कुछ इतने ग़ौर से देखा चराग़ जलता हुआ कि मैं चराग़ के अंदर दिखाई देने लगा पहुँच गया तेरी आँखों के उस किनारे तक जहाँ से मुझ को समुंदर दिखाई देने लगा — Shaheen Abbas
मुझ से आगे नज़र आने में ख़ुशी थी उस की मेरी ज़ंजीर से ज़ंजीर बड़ी थी उस की बात से बात निकल आती थी और हाथ से हाथ वो था हमराह मेरा और कमी थी उस की एक छत के तले फिर बात कहाँ तक चलती मेरी ख़ामोशी पुरानी थी नई थी उस की इंहिदाम आए हैं जो देख के देख आए हैं क्या मेरी तस्वीर पे तस्वीर गिरी थी उस की उस ने क्या क्या न मेरे पानियों के छीटें उड़ाएँ भरते भरते ही कहीं ओक भरी थी उस की जब अँधेरे में अँधेरे की तरह थे सब लोग रौशनी याद है किस किस पे पड़ी थी उस की इक रिवायत थी कि इस शहर में इक शख़्स है कम उस ने साबित किया आ कर ये कमी थी उस की — Shaheen Abbas
देखना है कब ज़मीं को ख़ाली कर जाता है दिन इस क़दर आता नहीं है जिस क़दर जाता है दिन मुंतशिर चलिए कि यूँ बाज़ार भर जाता तो है मुश्तहर कीजे कि फिर अच्छा गुज़र जाता है दिन जब ज़रा रद्द-ओ-बदल होता है इस ता'मीर में बाहर आ जाती है रात अंदर उतर जाता है दिन डूबना होता है जिस को वो डुबोता भी तो है जानता हूँ क्यूँ मुझे तारीक कर जाता है दिन दिन की अपनी मुस्तक़िल कोई नहीं तारीख़-ए-दर्द ज़ख़्म पर जाता था और अब दाग़ पर जाता है दिन अच्छी गुंजाइश निकल आती है शाम और शोर की जब खनकते ख़ाली इंसानों से भर जाता है दिन जाते जाते छोड़ जाता है मेरे दिल पर लकीर दो अँधेरों में मुझे तक़्सीम कर जाता है दिन — Shaheen Abbas
दर बना बैठा हूँ दीवार बना बैठा हूँ और समझता हूँ कि घर-बार बना बैठा हूँ उठता जाता है सितारे पे सितारा और मैं वही बेदार का बेदार बना बैठा हूँ किस मुलाक़ात की तय्यारी है और कब से है कुछ गिरफ़्तार गिरफ़्तार बना बैठा हूँ कहीं शो'ला ही रुका है न कहीं राख मेरी मैं ये सब मंज़िलें बेकार बना बैठा हूँ टूट जाता है ये लम्हा इसे जैसे भी बनाऊँ बैठते उठते कई बार बना बैठा हूँ ख़ुद को भुगताया है इक शख़्स को निमटाया है ये जो इंसान सा नाचार बना बैठा हूँ न मैं जाता हूँ यहाँ से न मैं आता हूँ यहाँ इस गली में अजब आज़ार बना बैठा हूँ — Shaheen Abbas