हम रह गए हमारा ख़लल क्यूँ नहीं रहा
मुश्किल का एक हल था वो हल क्यूँ नहीं रहा
मुश्किल का एक हल था वो हल क्यूँ नहीं रहा
मुड़ मुड़ के देखता हूँ वहीं का वहीं ग़ुबार
मैं चल रहा हूँ रास्ता चल क्यूँ नहीं रहा
वो मेरी गुफ़्तुगू से तो कब का निकल चुका
अब मेरी ख़ामुशी से निकल क्यूँ नहीं रहा
मौज़ूअ' को बदलता हूँ सफ़्हे उलटता हूँ
मज़मून क्या बताऊँ बदल क्यूँ नहीं रहा
मेरे और उस के बीच शब-ए-आख़िरीं का दाग़
इक आख़िरी चराग़ है जल क्यूँ नहीं रहा
मैं ने कहा ख़ुदा से ख़ुदा ने कहा मुझे
घर से कोई गली में निकल क्यूँ नहीं रहा
इस रुख़ पे ऐसा क्या है जो उस की तरह का है
पहलू बदल रहा हूँ बदल क्यूँ नहीं रहा
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दर बना बैठा हूँ दीवार बना बैठा हूँ
और समझता हूँ कि घर-बार बना बैठा हूँ
और समझता हूँ कि घर-बार बना बैठा हूँ
उठता जाता है सितारे पे सितारा और मैं
वही बेदार का बेदार बना बैठा हूँ
किस मुलाक़ात की तय्यारी है और कब से है
कुछ गिरफ़्तार गिरफ़्तार बना बैठा हूँ
कहीं शो'ला ही रुका है न कहीं राख मेरी
मैं ये सब मंज़िलें बेकार बना बैठा हूँ
टूट जाता है ये लम्हा इसे जैसे भी बनाऊँ
बैठते उठते कई बार बना बैठा हूँ
ख़ुद को भुगताया है इक शख़्स को निमटाया है
ये जो इंसान सा नाचार बना बैठा हूँ
न मैं जाता हूँ यहाँ से न मैं आता हूँ यहाँ
इस गली में अजब आज़ार बना बैठा हूँ
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ज़मीं का आख़िरी मंज़र दिखाई देने लगा
मैं देखता हुआ पत्थर दिखाई देने लगा
मैं देखता हुआ पत्थर दिखाई देने लगा
वो सामने था तो कम कम दिखाई देता था
चला गया तो बराबर दिखाई देने लगा
निशान-ए-हिज्र भी है वस्ल की निशानियों में
कहाँ का ज़ख़्म कहाँ पर दिखाई देने लगा
वो इस तरह से मुझे देखता हुआ गुज़रा
मैं अपने आप को बेहतर दिखाई देने लगा
तुझे ख़बर ही नहीं रात मो'जिज़ा जो हुआ
अँधेरे को तुझे छू कर दिखाई देने लगा
कुछ इतने ग़ौर से देखा चराग़ जलता हुआ
कि मैं चराग़ के अंदर दिखाई देने लगा
पहुँच गया तेरी आँखों के उस किनारे तक
जहाँ से मुझ को समुंदर दिखाई देने लगा
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इक नक़्श हो न पाए इधर से उधर मेरा
जैसा तुम्हें मिला था मैं वैसा जुदा करो
जैसा तुम्हें मिला था मैं वैसा जुदा करो
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रौशनी जैसे किसी शाम के आने से हुई
ख़ाक दरयाफ़्त मेरी ख़ाक उड़ाने से हुई
ख़ाक दरयाफ़्त मेरी ख़ाक उड़ाने से हुई
रंग फिर आए नहीं मौज में पहले की तरह
ऐसी तस्वीर मुअख़्ख़र तेरे जाने से हुई
तू ने चुप साध ली मौज़ू'-ए-मोहब्बत दे कर
गुफ़्तुगू तुझ से जो होनी थी ज़माने से हुई
था मगर ऐसा अकेला मैं कहाँ था पहले
मेरी तन्हाई मुकम्मल तेरे आने से हुई
अपने बारे में वो इक बात जो होती नहीं थी
तेरी आवाज़ में आवाज़ मिलाने से हुई
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ख़ुदा ऐसा तन्हा किसी को न रक्खे
कोई भी न हो जब मुख़िल होने वाला
पस-ए-आब-ओ-गिल मैं दिखा भी चुका हूँ
तमाशा सर-ए-आब-ओ-गिल होने वाला
सफ़ीने भरे आ रहे हैं बराबर
है दरिया कहीं मुंतक़िल होने वाला
वही एक हम हैं वही एक तुम हो
ये आलम नहीं मो'तदिल होने वाला
लहू के किनारे भी ज़द पर हैं दोनों
ये क्या ज़ख़्म है मुंदमिल होने वाला
मिरी राख देखो तो क्या मुतमइन है
मैं इक शख़्स था मुश्तइ'ल होने वाला
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