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शाम ढले मैं घर रौशन भी करता था
कितना कुछ तो मैं बेमन भी करता था
कितना कुछ तो मैं बेमन भी करता था
दुनिया मुझ से सिर्फ़ मोहब्बत करती है
वो दीवाना पागलपन भी करता था
तुम जो कहते थे ना इक दिन छू लोगे
छू लेते ना मेरा मन भी करता था
मेरे सिरहाने वो घुँघरू गुम-सुम है
उस के पैरों में छनछन भी करता था
उस के हाथों में बस हम ही जँचते थे
दावा सोने का कंगन भी करता था
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उम्र गुज़री है माँजते ख़ुद को
साफ़ हैं पर चमक नहीं पाए
Read Fullसाफ़ हैं पर चमक नहीं पाए
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तुम ने जब से अपनी पलकों पर रक्खा
कालिख़ को सब काजल काजल कहते हैं
कालिख़ को सब काजल काजल कहते हैं
इश्क़ में पागल ही तो होना होता है
पागल हैं जो मुझ को पागल कहते हैं
Read Fullपागल हैं जो मुझ को पागल कहते हैं
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मुझ को बेहद उदास करता है
ख़ास लोगों का आम रह जाना
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साफ़ दिखता है तेरे चेहरे पे
इश्क़ डाले है डेरे चेहरे पे
इश्क़ डाले है डेरे चेहरे पे
इतनी शिद्दत से देखिए मुझ को
नील पड़ जाएँ मेरे चेहरे पे
इतनी आँखें नहीं है दुनिया में
जितने चेहरे हैं तेरे चेहरे पे
सोलहवाँ साल लग गया जैसे
उस ने जब हाथ फेरे चेहरे पे
हम तुझे देख ही नहीं पाए
इतनी नज़रें थी तेरे चेहरे पे
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तुम ने जब से अपनी पलकों पर रक्खा
कालिख़ को सब काजल काजल कहते हैं
कालिख़ को सब काजल काजल कहते हैं
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