Parveen Shakir

Top 10 of Parveen Shakir

    मलाल है मगर इतना मलाल थोड़ी है
    ये आँख रोने की शिद्दत से लाल थोड़ी है

    बस अपने वास्ते ही फ़िक्र-मंद हैं सब लोग
    यहाँ किसी को किसी का ख़याल थोड़ी है

    परों को काट दिया है उड़ान से पहले
    ये ख़ौफ़-ए-हिज्र है शौक़-ए-विसाल थोड़ी है

    मज़ा तो तब है कि तुम हार के भी हँसते रहो
    हमेशा जीत ही जाना कमाल थोड़ी है

    लगानी पड़ती है डुबकी उभरने से पहले
    ग़ुरूब होने का मतलब ज़वाल थोड़ी है
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    Parveen Shakir
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    हर्फ़-ए-ताज़ा नई ख़ुशबू में लिखा चाहता है
    बाब इक और मोहब्बत का खुला चाहता है

    एक लम्हे की तवज्जोह नहीं हासिल उस की
    और ये दिल कि उसे हद से सिवा चाहता है

    इक हिजाब-ए-तह-ए-इक़रार है माने वर्ना
    गुल को मालूम है क्या दस्त-ए-सबा चाहता है

    रेत ही रेत है इस दिल में मुसाफ़िर मेरे
    और ये सहरा तिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा चाहता है

    यही ख़ामोशी कई रंग में ज़ाहिर होगी
    और कुछ रोज़ कि वो शोख़ खुला चाहता है

    रात को मान लिया दिल ने मुक़द्दर लेकिन
    रात के हाथ पे अब कोई दिया चाहता है

    तेरे पैमाने में गर्दिश नहीं बाक़ी साक़ी
    और तिरी बज़्म से अब कोई उठा चाहता है
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    Parveen Shakir
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    तेरी ख़ुश्बू का पता करती है
    मुझ पे एहसान हवा करती है

    चूम कर फूल को आहिस्ता से
    मोजज़ा बाद-ए-सबा करती है

    खोल कर बंद-ए-क़बा गुल के हवा
    आज ख़ुश्बू को रिहा करती है

    अब्र बरसते तो इनायत उस की
    शाख़ तो सिर्फ़ दुआ करती है

    ज़िंदगी फिर से फ़ज़ा में रौशन
    मिशअल-ए-बर्ग-ए-हिना करती है

    हम ने देखी है वो उजली साअत
    रात जब शे'र कहा करती है

    शब की तन्हाई में अब तो अक्सर
    गुफ़्तुगू तुझ से रहा करती है

    दिल को उस राह पे चलना ही नहीं
    जो मुझे तुझ से जुदा करती है

    ज़िंदगी मेरी थी लेकिन अब तो
    तेरे कहने में रहा करती है

    उस ने देखा ही नहीं वर्ना ये आँख
    दिल का अहवाल कहा करती है

    मुसहफ़-ए-दिल पे अजब रंगों में
    एक तस्वीर बना करती है

    बे-नियाज़-ए-कफ़-ए-दरिया अंगुश्त
    रेत पर नाम लिखा करती है

    देख तू आन के चेहरा मेरा
    इक नज़र भी तिरी क्या करती है

    ज़िंदगी भर की ये ताख़ीर अपनी
    रंज मिलने का सिवा करती है

    शाम पड़ते ही किसी शख़्स की याद
    कूचा-ए-जाँ में सदा करती है

    मसअला जब भी चराग़ों का उठा
    फ़ैसला सिर्फ़ हवा करती है

    मुझ से भी उस का है वैसा ही सुलूक
    हाल जो तेरा अना करती है

    दुख हुआ करता है कुछ और बयाँ
    बात कुछ और हुआ करती है
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    Parveen Shakir
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    कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी
    दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी

    बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद की
    चाँद भी ऐन चैत का उस पे तिरा जमाल भी

    सब से नज़र बचा के वो मुझ को कुछ ऐसे देखता
    एक दफ़ा तो रुक गई गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी

    दिल तो चमक सकेगा क्या फिर भी तराश के देख लें
    शीशा-गिरान-ए-शहर के हाथ का ये कमाल भी

    उस को न पा सके थे जब दिल का अजीब हाल था
    अब जो पलट के देखिए बात थी कुछ मुहाल भी

    मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर
    हाथ दुआ से यूँ गिरा भूल गया सवाल भी

    उस की सुख़न-तराज़ियाँ मेरे लिए भी ढाल थीं
    उस की हँसी में छुप गया अपने ग़मों का हाल भी

    गाह क़रीब-ए-शाह-रग गाह बईद-ए-वहम-ओ-ख़्वाब
    उस की रफ़ाक़तों में रात हिज्र भी था विसाल भी

    उस के ही बाज़ुओं में और उस को ही सोचते रहे
    जिस्म की ख़्वाहिशों पे थे रूह के और जाल भी

    शाम की ना-समझ हवा पूछ रही है इक पता
    मौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार कुछ तो मिरा ख़याल भी
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    Parveen Shakir
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    वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा
    मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा

    हम तो समझे थे कि इक ज़ख़्म है भर जाएगा
    क्या ख़बर थी कि रग-ए-जाँ में उतर जाएगा

    वो हवाओं की तरह ख़ाना-ब-जाँ फिरता है
    एक झोंका है जो आएगा गुज़र जाएगा

    वो जब आएगा तो फिर उस की रिफ़ाक़त के लिए
    मौसम-ए-गुल मिरे आँगन में ठहर जाएगा

    आख़िरश वो भी कहीं रेत पे बैठी होगी
    तेरा ये प्यार भी दरिया है उतर जाएगा

    मुझ को तहज़ीब के बर्ज़ख़ का बनाया वारिस
    जुर्म ये भी मिरे अज्दाद के सर जाएगा
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    Parveen Shakir
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    मैं सच कहूँगी मगर फिर भी हार जाऊँगी
    वो झूट बोलेगा और ला-जवाब कर देगा
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    हुस्न के समझने को उम्र चाहिए जानाँ
    दो घड़ी की चाहत में लड़कियाँ नहीं खुलतीं
    Parveen Shakir
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    कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने
    बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की
    Parveen Shakir
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