Parveen Shakir

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📍 Karachi· Pakistan

Parveen Shakir shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Parveen Shakir's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ये दुख नहीं कि अँधेरो से सुल्ह की हम ने मलाल ये है कि अब सुब्ह की तलब भी नहीं — Parveen Shakir
मर भी जाऊँ तो कहाँ लोग भुला ही देंगे लफ़्ज़ मेरे मेरे होने की गवाही देंगे — Parveen Shakir
कल रात जो ईंधन के लिए कट के गिरा है चिड़ियों को बहुत प्यार था उस बूढे शजर से — Parveen Shakir
दुख तो ऐसा है कि दिल आँख से कट कट के बहे एक वा'दा है कि रोने नहीं देता मुझ को — Parveen Shakir
गुलाब हाथ में हो आँख में सितारा हो कोई वजूद मोहब्बत का इस्तिआ'रा हो — Parveen Shakir
आइने की आँख ही कुछ कम न थी मेरे लिए जाने अब क्या क्या दिखाएगा तुम्हारा देखना — Parveen Shakir
मज़ा तो तब है कि तुम हार के भी हँसते रहो हमेशा जीत ही जाना कमाल थोड़ी है — Parveen Shakir
रेल की सीटी में कैसे हिज्र की तम्हीद थी उस को रुख़्सत कर के घर लौटे तो अंदाज़ा हुआ — Parveen Shakir
बोझ उठाए हुए फिरती है हमारा अब तक ऐ ज़मीं माँ तिरी ये उम्र तो आराम की थी — Parveen Shakir
रात के शायद एक बजे हैं सोता होगा मेरा चाँद — Parveen Shakir
तुझ को क्या इल्म तुझे हारने वाले कुछ लोग किस क़दर सख़्त नदामत से तुझे देखते हैं — Parveen Shakir
वो मुसाफ़िर ही खुली धूप का था साए फैला के शजर क्या करते — Parveen Shakir
उस से इक बार तो रूठूँ मैं उसी की मानिंद और मेरी तरह से वो मुझ को मनाने आए — Parveen Shakir
ये क्या कि वो जब चाहे मुझे छीन ले मुझ से अपने लिए वो शख़्स तड़पता भी तो देखूँ — Parveen Shakir
तेरे सिवा भी कई रंग ख़ुश नज़र थे मगर जो तुझ को देख चुका हो वो और क्या देखे — Parveen Shakir
हम ने ही लौटने का इरादा नहीं किया उस ने भी भूल जाने का वा'दा नहीं किया — Parveen Shakir
वो मुझ को छोड़ के जिस आदमी के पास गया बराबरी का भी होता तो सब्र आ जाता — Parveen Shakir
लड़कियाँ बैठी थीं पाँव डालकर रौशनी सी हो गई तालाब में — Parveen Shakir
कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी — Parveen Shakir
तेरा घर और मेरा जंगल भीगता है साथ साथ ऐसी बरसातें कि बादल भीगता है साथ साथ — Parveen Shakir

Ghazal

जब कभी ख़ूबी-ए-क़िस्मत से तुझे देखते हैं आइना-ख़ाने की हैरत से तुझे देखते हैं वो जो पामाल-ए-ज़माना है मेरे तख़्त-नशीं देख तो कैसी मुहब्बत से तुझे देखते हैं कासा-ए-दीद में बस एक झलक का सिक्का हम फ़क़ीरों की क़नात से तुझे देखते हैं तेरे जाने का ख़याल आता है घर से जिस दम दर-ओ-दीवार की हसरत से तुझे देखते हैं तेरे कूचे में चले जाते हैं क़ासिद बनकर और अक्सर इसी सूरत से तुझे देखते हैं कह गई बाद-ए-सबा आज तेरे कान में क्या फूल किस दर्जा तुझे शरारत से देखते हैं तुझ को क्या इल्म तुझे हारने वाले कुछ लोग किस क़दर सख़्त नदामत से तुझे देखते हैं — Parveen Shakir
अपनी ही सदा सुनूँ कहाँ तक जंगल की हवा रहूँ कहाँ तक हर बार हवा न होगी दर पर हर बार मगर उठूँ कहाँ तक दम घटता है घर में हब्स वो है ख़ुश्बू के लिए रुकूँ कहाँ तक फिर आ के हवाएँ खोल देंगी ज़ख़्म अपने रफ़ू करूँँ कहाँ तक साहिल पे समुंदरों से बच कर मैं नाम तिरा लिखूँ कहाँ तक तन्हाई का एक एक लम्हा हंगामों से क़र्ज़ लूँ कहाँ तक गर लम्स नहीं तो लफ़्ज़ ही भेज मैं तुझ से जुदा रहूँ कहाँ तक सुख से भी तो दोस्ती कभी हो दुख से ही गले मिलूँ कहाँ तक मंसूब हो हर किरन किसी से अपने ही लिए जलूँ कहाँ तक आँचल मिरे भर के फट रहे हैं फूल उस के लिए चुनूँ कहाँ तक — Parveen Shakir
क्या करे मेरी मसीहाई भी करने वाला ज़ख़्म ही ये मुझे लगता नहीं भरने वाला ज़िंदगी से किसी समझौते के बा-वस्फ़ अब तक याद आता है कोई मारने मरने वाला उस को भी हम तिरे कूचे में गुज़ार आए हैं ज़िंदगी में वो जो लम्हा था सँवरने वाला उस का अंदाज़-ए-सुख़न सब से जुदा था शायद बात लगती हुई लहजा वो मुकरने वाला शाम होने को है और आँख में इक ख़्वाब नहीं कोई इस घर में नहीं रौशनी करने वाला दस्तरस में हैं अनासिर के इरादे किस के सो बिखर के ही रहा कोई बिखरने वाला इसी उम्मीद पे हर शाम बुझाए हैं चराग़ एक तारा है सर-ए-बाम उभरने वाला — Parveen Shakir
शौक़-ए-रक़्स से जब तक उँगलियाँ नहीं खुलतीं पाँव से हवाओं के बेड़ियाँ नहीं खुलतीं पेड़ को दुआ दे कर कट गई बहारों से फूल इतने बढ़ आए खिड़कियाँ नहीं खुलतीं फूल बन के सैरों में और कौन शामिल था शोख़ी-ए-सबास तो बालियाँ नहीं खुलतीं हुस्न के समझने को उम्र चाहिए जानाँ दो घड़ी की चाहत में लड़कियाँ नहीं खुलतीं कोई मौजा-ए-शीरीं चूम कर जगाएगी सूरजों के नेज़ों से सीपियाँ नहीं खुलतीं माँ से क्या कहेंगी दुख हिज्र का कि ख़ुद पर भी इतनी छोटी 'उम्रों की बच्चियाँ नहीं खुलतीं शाख़ शाख़ सरगर्दां किस की जुस्तुजू में हैं कौन से सफ़र में हैं तितलियाँ नहीं खुलतीं आधी रात की चुप में किस की चाप उभरती है छत पे कौन आता है सीढ़ियाँ नहीं खुलतीं पानियों के चढ़ने तक हाल कह सकें और फिर क्या क़यामतें गुज़रीं बस्तियाँ नहीं खुलतीं — Parveen Shakir
मुश्किल है कि अब शहर में निकले कोई घर से दस्तार पे बात आ गई होती हुई सर से बरसा भी तो किस दश्त के बे-फ़ैज़ बदन पर इक उम्र मिरे खेत थे जिस अब्र को तरसे कल रात जो ईंधन के लिए कट के गिरा है चिड़ियों को बड़ा प्यार था उस बूढ़े शजर से मेहनत मिरी आँधी से तो मंसूब नहीं थी रहना था कोई रब्त शजर का भी समर से ख़ुद अपने से मिलने का तो यारा न था मुझ में मैं भीड़ में गुम हो गई तन्हाई के डर से बे-नाम मसाफ़त ही मुक़द्दर है तो क्या ग़म मंज़िल का तअ'य्युन कभी होता है सफ़र से पथराया है दिल यूँँ कि कोई इस्म पढ़ा जाए ये शहर निकलता नहीं जादू के असर से निकले हैं तो रस्ते में कहीं शाम भी होगी सूरज भी मगर आएगा इस रहगुज़र से — Parveen Shakir
तराश कर मेरे बाज़ू उड़ान छोड़ गया हवा के पास बरहना कमान छोड़ गया रफ़ाक़तों का मेरी उस को ध्यान कितना था ज़मीन ले ली मगर आसमान छोड़ गया अजीब शख़्स था बारिश का रंग देख के भी खुले दरीचे पे इक फूल-दान छोड़ गया जो बादलों से भी मुझ को छुपाए रखता था बढ़ी है धूप तो बे-साएबान छोड़ गया निकल गया कहीं अन-देखे पानियों की तरफ़ ज़मीं के नाम खुला बादबान छोड़ गया उक़ाब को थी ग़रज़ फ़ाख़्ता पकड़ने से जो गिर गई तो यूँँही नीम-जान छोड़ गया न जाने कौन सा आसेब दिल में बस्ता है कि जो भी ठहरा वो आख़िर मकान छोड़ गया अक़ब में गहरा समुंदर है सामने जंगल किस इंतिहा पे मेरा मेहरबान छोड़ गया — Parveen Shakir
पा-ब-गिल सब हैं रिहाई की करे तदबीर कौन दस्त-बस्ता शहर में खोले मिरी ज़ंजीर कौन मेरा सर हाज़िर है लेकिन मेरा मुंसिफ़ देख ले कर रहा है मेरी फ़र्द-ए-जुर्म को तहरीर कौन आज दरवाज़ों पे दस्तक जानी पहचानी सी है आज मेरे नाम लाता है मिरी ताज़ीर कौन कोई मक़्तल को गया था मुद्दतों पहले मगर है दर-ए-ख़ेमा पे अब तक सूरत-ए-तस्वीर कौन मेरी चादर तो छिनी थी शाम की तन्हाई में बे-रिदाई को मिरी फिर दे गया तश्हीर कौन सच जहाँ पा-बस्ता मुल्ज़िम के कटहरे में मिले उस अदालत में सुनेगा अद्ल की तफ़्सीर कौन नींद जब ख़्वाबों से प्यारी हो तो ऐसे अहद में ख़्वाब देखे कौन और ख़्वाबों को दे ता'बीर कौन रेत अभी पिछले मकानों की न वापस आई थी फिर लब-ए-साहिल घरौंदा कर गया ता'मीर कौन सारे रिश्ते हिजरतों में साथ देते हैं तो फिर शहर से जाते हुए होता है दामन-गीर कौन दुश्मनों के साथ मेरे दोस्त भी आज़ाद हैं देखना है खींचता है मुझ पे पहला तीर कौन — Parveen Shakir
डसने लगे हैं ख़्वाब मगर किस से बोलिए मैं जानती थी पाल रही हूँ संपोलिए बस ये हुआ कि उस ने तकल्लुफ़ से बात की और हम ने रोते रोते दुपट्टे भिगो लिए पलकों पे कच्ची नींदों का रस फैलता हो जब ऐसे में आँख धूप के रुख़ कैसे खोलिए तेरी बरहना-पाई के दुख बाँटते हुए हम ने ख़ुद अपने पाँव में काँटे चुभो लिए मैं तेरा नाम ले के तज़ब्ज़ुब में पड़ गई सब लोग अपने अपने अज़ीज़ों को रो लिए ख़ुश-बू कहीं न जाए प इसरार है बहुत और ये भी आरज़ू कि ज़रा ज़ुल्फ़ खोलिए तस्वीर जब नई है नया कैनवस भी है फिर तश्तरी में रंग पुराने न घोलिए — Parveen Shakir

Nazm

रुत बदली तो भंवरो ने तितली से कहा आज से तुम आज़ाद हो परवाजों की सारी सम्तें तुम्हारे नाम हुईं जाओ जंगल की मग़रूर हवा के साथ उड़ो बादल के हमराह सितारे छू आओ ख़ुशबू के बाज़ू थामो और रक़्स करो रक़्स करो कि इस मौसम के सूरज की किरनों का ताज तुम्हारे सर है लहराओ कि इन रातों का चाँद तुम्हारी पेशानी पर अपने हाथ से दुआ लिखेगा गाओ इन लम्हों की हवाएँ तुम को तुम्हारे गीतों पर संगीत देंगी पत्ते कड़े बजाएँगे और फूलों के हाथों में दफ़ होगा तितली मा'सूमाना हैरत से सरशार सियह शाख़ों के हल्क़े से निकली सदियों के जकड़े हुए रेशमी पर फैलाए और उड़ने लगी खुली फ़ज़ा का ज़ाइक़ा चक्खा नर्म हवा का गीत सुना अन-देखे कोहसारों की क़ामत नापी रौशनियों का लम्स पिया ख़ुशबू के हर रंग को छू कर देखा लेकिन रंग हवा और ख़ुशबू का विज्दान अधूरा था कि रक़्स का मौसम ठहर गया रुत बदली और सूरज की किरनों का ताज पिघलने लगा चाँद के हाथ दुआ के हर्फ़ ही भूल गए हवा के लब बर्फ़ीले सुमों में नीले पड़ कर अपनी सदाएँ खो बैठे पत्तों की बाँहों के सर बे-रंग हुए और तन्हा रह गए फूलों के हाथ बर्फ़ की लहर के हाथों तितली को लौट आने का पैग़ाम गया भौंरे शबनम की ज़ंजीरें ले कर दौड़े और बेचैन परों में अन-चखी परवाजों की आशुफ़्ता प्यास जला दी अपने काले नाख़ूनों से तितली के पर नोच के बोले अहमक़ लड़की घर वापस आ जाओ नाटक ख़त्म हुआ ख़्वातीन का आलमी साल — Parveen Shakir
मुझे मालूम था ये दिन भी दुख की कोख से फूटा है मेरी मातमी चादर नहीं तब्दील होगी आज के दिन भी जो राख उड़ती थी ख़्वाबों की बदन में यूँँही आशुफ़्ता रहेगी और उदासी की यही सूरत रहेगी मैं अपने सोग में मातम-कुनाँ यूँँ सर-ब-ज़ानू रात तक बैठी रहूँगी और मिरे ख़्वाबों का पुर्सा आज भी कोई नहीं देगा मगर ये कौन है जो यूँँ मुझे बाहर बुलाता है बड़ी नर्मी से कहता है कि अपने हुजरा-ए-ग़म से निकल कर बाग़ में आओ ज़रा बाहर तो देखो दूर तक सब्ज़ा बिछा है और हरी शाख़ों पे नारंजी शगूफ़े मुस्कुराते हैं मुलाएम सब्ज़ पत्तों पर पड़ी शबनम सुनहरी धूप में हीरे की सूरत जगमगाती है दरख़्तों में छुपी नद्दी बहुत धीमे सुरों में गुनगुनाती है चमकते ज़र्द फूलों से लदी नन्ही पहाड़ी के अक़ब में नुक़रई चश्मा ख़ुशी से खिलखिलाता है परिंद-ए-ख़ुश-गुलू शाख़-ए-शगुफ़्ता पर चहकता है घने जंगल में बारिश का ग़ुबार-ए-सब्ज़ सत्ह-ए-शीशा-ए-दिल पर मुलाएम उँगलियों से मर्हबा के लफ़्ज़ लिखता है कोई आता है आ कर चादर-ए-ग़म को बड़ी आहिस्तगी से मेरे शानों से हटा कर सात रंगों का दुपट्टा खोल कर मुझ को उड़ाता है मैं खुल कर साँस लेती हूँ मिरे अंदर कोई पैरों में घुँघरू बाँधता है रक़्स का आग़ाज़ करता है मिरे कानों के आवेज़ों को ये किस ने छुआ जिस से लवें फिर से गुलाबी हो गई हैं कोई सरगोशियों में फिर से मेरा नाम लेता है फ़ज़ा की नग़्मगी आवाज़ देती है हवा जाम-ए-सेहत तज्वीज़ करती है — Parveen Shakir
सो अब ये शर्त-ए-हयात ठहरी कि शहर के सब नजीब अफ़राद अपने अपने लहू की हुरमत से मुन्हरिफ़ हो के जीना सीखें वो सब अक़ीदे कि इन घरानों में उन की आँखों के रंगतों की तरह तसलसुल से चल रहे थे सुना है बातिल क़रार पाए वो सब वफ़ादारियाँ कि जिन पर लहू के वा'दे हलफ़ हुए थे वो आज से मस्लहत की घड़ियाँ शुमार होंगी बदन की वाबस्तगी का क्या ज़िक्र रूह के अहद-नामे तक फ़स्ख़ माने जाएँ ख़मोशी-ओ-मस्लहत-पसंदी में ख़ैरियत है मगर मिरे शहर-ए-मुन्हरिफ़ में अभी कुछ ऐसे ग़य्यूर-ओ-सादिक़ ब-क़ैद-ए-जाँ हैं कि हर्फ़-ए-इंकार जिन की क़िस्मत नहीं बना है सो हाकिम-ए-शहर जब भी अपने ग़ुलाम-ज़ादे उन्हें गिरफ़्तार करने भेजे तो साथ में एक एक का शजरा-ए-नस्ब भी रवाना करना और उन के हमराह सर्द पत्थर में चुनने देना कि आज से जब हज़ार-हा साल बा'द हम भी किसी ज़माने के टेक्सलाया हड़प्पा बन कर तलाशे जाएँ तो उस ज़माने के लोग हम को कहीं बहुत कम-नसब न जानें — Parveen Shakir
दिल-आज़ारी भी इक फ़न है और कुछ लोग तो सारी ज़िंदगी इसी की रोटी खाते हैं चाहे उन का बुर्ज कोई हो अक़रब ही लगते हैं तीसरे दर्जे के पीले अख़बारों पर ये अपनी यर्क़ानी सोचों से और भी ज़र्दी मलते रहते हैं माला बारी केबिन हों या पाँच सितारा होटल कहीं भी क़य करने से बाज़ नहीं आते ऊपर से इस अमल को फ़िक़रे-बाज़ी कहते हैं जिस का पहला निशाना उमूमन बिल को अदा करने वाला साथी होता है! अपने अपने कुँवें को बहर-ए-आज़म कहने और समझने वाले ये नन्हे मेंडक हर हाथी को देख के फूलने लगे हैं और जब फटने वाले हों तो हाथी की आँखों पर फबती कसने लगे हैं कव्वे भी अंडे खाने के शौक़ को अपने फ़ाख़्ता के घर जा कर पूरा करते हैं लेकिन ये वो साँप हैं जो कि अपने बच्चे ख़ुद ही चट कर जाते हैं कभी कभी मैं सोचती हूँ कि साँपों की ये ख़सलत मालिक-ए-जिंन-ओ-इन्स की, इंसानों के हक़ में कैसी बे-पायाँ रहमत है! — Parveen Shakir
मुसाहिब-ए-शाह से कहो कि फ़क़ीह-ए-आज़म भी आज तस्दीक़ कर गए हैं कि फ़स्ल फिर से गुनाहगारों की पक गई है हुज़ूर की जुम्बिश-ए-नज़र के तमाम जल्लाद मुंतज़िर हैं कि कौन सी हद जनाब जारी करें तो तामील-ए-बंदगी हो कहाँ पे सर और कहाँ पे दस्तार उतारना अहसन-उल-अमल है कहाँ पे हाथों कहाँ ज़बानों को क़त्अ कीजिए कहाँ पे दरवाज़ा रिज़्क़ का बंद करना होगा कहाँ पे आसाइशों की भूखों को मार दीजे कहाँ बटेगी लुआन की छूट और कहाँ पर रज्म के अहकाम जारी होंगे कहाँ पे नौ साला बच्चियां चहल साला मर्दों के साथ संगीन में पिरोने का हुक्म होगा कहाँ पे इक़बाली मुलज़िमों को किसी तरह शक का फ़ाएदा हो कहाँ पे मासूम दार पर खींचना पड़ेगा हुज़ूर अहकाम जो भी जारी करेंगे फ़क़त इल्तिजा ये होगी कि अपने इरशाद-ए-आलिया को ज़बानी रखें वगरना कानूनी उलझनें हैं! — Parveen Shakir
'पत्थर की ज़बाँ'' की शाएरा ने इक महफ़िल-ए-शेर-ओ-शायरी में जब नज़्म सुनाते मुझ को देखा कुछ सोच के दिल में मुस्कुराई जब मेज़ पर हम मिले तो उस ने बढ़ कर मिरे हाथ ऐसे था में जैसे मुझे खोजती हो कब से फिर मुझ से कहा कि आज, 'परवीन'! जब शे'र सुनाते तुम को देखा मैं ख़ुद को बहुत ही याद आई वो वक़्त कि जब तुम्हारी सूरत मैं भी यूँँही शे'र कह रही थी लिखती थी इसी तरह की नज़्में पर अब तो वो सारी नज़्में ग़ज़लें गुज़रे हुए ख़्वाब की हैं बातें! मैं सब को डिसओन कर चुकी हूँ! ''पत्थर की ज़बाँ'' की शाएरा के चम्बेली से नर्म हाथ था में ''ख़ुश्बू'' की सफ़ीर सोचती थी दर-पेश हवाओं के सफ़र में पल पल की रफ़ीक़-ए-राह मेरे अंदर की ये सादा-लौह 'ऐलिस' हैरत की जमील वादियों से वहशत के मुहीब जंगलों में आएगी तो उस का फूल-लहजा क्या जब भी सबा-नफ़स रहेगा!? वो ख़ुद को डिसओन कर सकेगी!? — Parveen Shakir
आँख बोझल है मगर नींद नहीं आती है मेरी गर्दन में हमाइल तिरी बाँहें जो नहीं किसी करवट भी मुझे चैन नहीं पड़ता है सर्द पड़ती हुई रात माँगने आई है फिर मुझ से तिरे नर्म बदन की गर्मी और दरीचों से झिझकती हुई आहिस्ता हवा खोजती है मिरे ग़म-ख़ाने में तेरी साँसों की गुलाबी ख़ुश्बू! मेरा बिस्तर ही नहीं दिल भी बहुत ख़ाली है इक ख़ला है कि मिरी रूह में दहशत की तरह उतरा है तेरा नन्हा सा वजूद कैसे उस ने मुझे भर रक्खा था तिरे होते हुए दुनिया से तअल्लुक़ की ज़रूरत ही न थी सारी वाबस्तगियाँ तुझ से थीं तू मिरी सोच भी, तस्वीर भी और बोली भी मैं तिरी माँ भी, तिरी दोस्त भी हम-जोली भी तेरे जाने पे खुला लफ़्ज़ ही कोई मुझे याद नहीं बात करना ही मुझे भूल गया! तू मिरी रूह का हिस्सा था मिरे चारों तरफ़ चाँद की तरह से रक़्साँ था मगर किस क़दर जल्द तिरी हस्ती ने मिरे अतराफ़ में सूरज की जगह ले ली है अब तिरे गिर्द मैं रक़्सिंदा हूँ! वक़्त का फ़ैसला था तिरे फ़र्दा की रिफ़ाक़त के लिए मेरा इमरोज़ अकेला रह जाए मिरे बच्चे, मिरे लाल फ़र्ज़ तो मुझ को निभाना है मगर देख कि कितनी अकेली हूँ मैं! — Parveen Shakir