लड़की! ये लम्हे बादल हैंगुज़र गए तो हाथ कभी नहीं आएँगेइन के लम्स को पीती जाक़तरा क़तरा भीगती जाभीगती जा तू जब तक इन में नम हैऔर तिरे अंदर की मिट्टी प्यासी हैमुझ से पूछकि बारिश को वापस आने का रस्ता कभी न याद हुआबाल सुखाने के मौसम अन-पढ़ होते हैं!— Parveen Shakir