Prashant Kumar

Prashant Kumar

@adarshgangwar817128

Adarsh Gangwar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Adarsh Gangwar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मुस्कुराहट में छुपाना नहीं आसाँ ग़म-ए-दिल अश्क पलकों से बग़ावत पे उतर आते हैं — Prashant Kumar
बेरोज़गार होना भी हिम्मत का काम है अपने ही घर में माँगनी पड़ती हैं रोटियाँ — Prashant Kumar
मिरे अंदाज़ ज़माने से निराले होंगे आज अँधेरे हैं तो क्या कल को उजाले होंगे एक रोटी में सुनाते हैं तुझे कितना कुछ कल से होंटों पे तिरे मेरे निवाले होंगे कम से कम सैकड़ों को भूख ने मारा होगा बच गए जितने सभी दर्द ने पाले होंगे अब हमें मौत भी मक़बूल नहीं करती है ज़िंदगी तू ही बता किस के हवाले होंगे हर दफ़ा छीन लिया मेरा निवाला सबने फिर तो बच्चे भी तिरे भूख ने पाले होंगे अरे कमरे में मिरे कुछ भी नहीं है सच्ची चार दीवार मिलेंगी बचे जाले होंगे शहर-ए-दिल में सुनो तो कोई नहीं रहता है तुम कहाँ जा रहे हो सब में ही ताले होंगे छोड़ के ख़ुद को ज़माने को दिया है मरहम फिर तो बेशक ही तिरे पाँव में छाले होंगे — Prashant Kumar
ख़ाक बस्तियों में घर रेत के बनाओगे रोज़ रोज़ ऐसे ही ख़ूब चोट खाओगे सोचते तो हैं हम भी छत से कूद जाएँ अब फिर ख़याल आता है तुम कहाँ पे जाओगे जो हमारे हो कर भी हर किसी को देखोगे बे-वफ़ा की गिनती में यार आ ही जाओगे बे-नक़ाब होकर के हम निकल तो आएँगे हो गया कहीं कुछ भी हमपे टिन-टिनाओगे शब के आठ बजते ही तुम कहाँ पे जाते हो कोई पूछ बैठा फिर बोलो क्या बताओगे जब रक़ीब बनकर ही कुछ नहीं हुआ तुम सेे तुम हबीब बनकर क्या बस्तियाँ जलाओगे जब नज़र झुकाओगे बात बन ही जाएगी प्यार से जो बोलेंगे तुम भी मान जाओगे इश्क़ का मुहब्बत का जब बुख़ार आएगा वक़्त पर दवा लेना ख़ुद ही भूल जाओगे जब कभी भी तन्हाई नोच कर के खाएगी मेरा नाम लिख कर तुम हाथ पर मिटाओगे दास्ताँ मोहब्बत की एक बार सुन लोगे मेरा नाम गीतों में तुम भी गुन-गुनाओगे — Prashant Kumar

Ghazal

किस क़दर दिल को दुखाते हैं ज़माने वाले देख तो ज़ख़्म उभर आए पुराने वाले राहज़न तो अरे बदनाम हुए हैं यूँ ही क़ाफ़िला लूट रहे राह दिखाने वाले हम भी बस ख़्वाब ही तो देख रहे हैं तब से क्या ख़बर अब कहाँ हैं लोरी सुनाने वाले बड़ी मुश्किल से हुआ ज़ख़्म-ए-कुहन ठीक मिरा अब बुलाओ कहाँ हैं दिल को दुखाने वाले अब कहाँ जाएँ समझ में ही नहीं आता कुछ हर जगह लूट रहे अपना बताने वाले इस मोहब्बत से हमें लगने लगा है डर अब क्यूँकि दिल तोड़ रहे दिल में समाने वाले मुंसिफ़ों ने किया है मुझको मवाली घोषित अब बुलाओ कहाँ हैं उँगली उठाने वाले — Prashant Kumar
गली में रोज़ आया क्यूँँ करूँँ मैं किसी को देख भागा क्यूँँ करूँँ मैं तुम्हारे पास बैठा क्यूँँ करूँँ मैं तुम्हारे होंट चूमा क्यूँँ करूँँ मैं कि मेरे गुदगुदाया क्यूँँ करे तू तिरे गालों पे मारा क्यूँँ करूँँ मैं मिरा ही नाम लिक्खा क्यूँँ करे तू तिरे हाथों को चूमा क्यूँँ करूँँ मैं मोहब्बत की नुमाइश क्यूँँ करे तू अदावत का ही वा'दा क्यूँँ करूँँ मैं मिरी बातों में आया क्यूँँ करे तू तिरी बातों में आया क्यूँँ करूँँ मैं तुझे मैं जानता ही जब नहीं हूँ मोहब्बत का कि वा'दा क्यूँँ करूँँ मैं कहाँ जाते हो अब ये तो बताओ ख़ुदा से तुम को माँगा क्यूँँ करूँँ मैं — Prashant Kumar
घर से निकलो तो बुज़ुर्गों के सबक़ याद करो ठीक कहते हैं कभी वक़्त न बर्बाद करो ये जवानी बड़ी मुश्किल से मिला करती है इसे बेकार के कामों में न बर्बाद करो जब कमाओगे तो मालूम चलेगा तुम को ऐसे माँ-बाप की दौलत को न बर्बाद करो अरे हर काम को करने का तरीक़ा है एक शे'र सुनना है तो पहले सभी इरशाद करो हर किसी को नहीं आता ये हुनर भी लोगों पहले बर्बाद करो सब को फिर आबाद करो एक जाएगी इधर दूसरी आ जाएगी पीछे लड़की के कभी वक़्त न बर्बाद करो ख़ुद को आबाद न माँ-बाप की दौलत से करो ख़ुद की दौलत से कि माँ-बाप को आबाद करो — Prashant Kumar
अब काम तुम्हें छोड़ कर आना ही पड़ेगा खाना मुझे हाथों से खिलाना ही पड़ेगा इक रोज़ जहाॅं छोड़ के जाना ही पड़ेगा ये रीत है दुनिया की निभाना ही पड़ेगा जीवन है यही मान लो बाज़ार को आए सो शाम तलक घर तुम्हें जाना ही पड़ेगा रखता नहीं विश्वास मैं भक्ति में ख़ुदा में रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया तो निभाना ही पड़ेगा दौलत तिरी रिश्ते तिरे बेकार की बातें इक रोज़ इन्हें छोड़ के जाना ही पड़ेगा माटी के खिलौने के सिवा कुछ नहीं इंसाँ माटी को तो माटी में मिलाना ही पड़ेगा ऐसे तो तुझे आज मैं जाने नहीं दूँगा चेहरा मुझे इक बार दिखाना ही पड़ेगा — Prashant Kumar
वो शख़्स हर तरह से मनाता रहा मुझे मेरी निशानियाँ भी दिखाता रहा मुझे देखा नहीं मुकर के मगर एक बार भी रो रो के खिड़कियों से बुलाता रहा मुझे इस में हवा का दोष नहीं है मिरी ख़ता मेरा चराग़ ख़ुद ही बुझाता रहा मुझे हर बार अच्छी किस्म का मैं बीज बन गया मिट्टी में कितनी बार मिलाता रहा मुझे नज़रों से दूर हो गया फिर उस के बा'द भी एहसास अपनेपन का कराता रहा मुझे तब बात और थी मगर अब बात और है जब तक रहा वो अपना बताता रहा मुझे मैं कब जहाँ में आया मुझे ख़ुद नहीं पता जब तक रहा वो याद दिलाता रहा मुझे याँ कौन क्या है यार मुझे ख़ुद नहीं पता जब तक रहा वो दुनिया दिखाता रहा मुझे मजबूत आदमी हूँ मैं फिसला कभी नहीं अपनी अदाओं से वो लुभाता रहा मुझे — Prashant Kumar
अंगूरी बदन आतिश यौवन ज़ुल्फ़ों की झलक फिर वैसी ही चलने का हुनर नायाब तिरा फ़ित्ने की चमक फिर वैसी ही रुख़सार तिरा है मौज-ए-बला और होंट तिरे सूरज की किरन जोशीला बदन आफ़त चितवन ऊपर से फुदक फिर वैसी ही वो पहली दफ़ा जब तुम सेे मिले तुम ख़ूब लिपट के रोए थे अब शहर से हैं जाने को मगर होंटों पे सिसक फिर वैसी ही पाताल से ढूँढ़ निकालेगा जो हम ने छोड़ा शहर तिरा हम भूले नहीं ग़ुस्सा तेरा आँखों में खटक फिर वैसी ही खेतों की कगर पर बैठ के हम चीज़ इक दूजे को खिलाते थे हम आज बिछड़ने को हैं मगर होंटों पे गज़क फिर वैसी ही क्या हाल बनाया है ऐसा सदियों से जैसे देखा न हो मैं सामने रोज़ आता हूँ मगर आँखों में कसक फिर वैसी ही वो रात सितारों वाली हो गालों पर तेरे लाली हो सर जाँघ पे तेरी रक्खा हो सीने की लपक फिर वैसी ही — Prashant Kumar
आप का रोज़ नाम लूँगा मैं आपसे प्यार भी करूँँगा मैं पीठ पीछे न वार करता हूँ हर जगह सामने मिलूँगा मैं घूम कर देख ले जहाॅं चाहे अब कहीं भी नहीं मिलूँगा मैं ऐ ख़ुदा तू जहाॅं नहीं होगा देख लेना वहीं मिलूँगा मैं वो जहाॅं छोड़ कर गया था तू शर्त रख ले वहीं मिलूँगा मैं राह में फूल आएँ या काँटे मुस्कुराते हुए चलूँगा मैं सामने क्यूँँ मिरे नहीं आती देख कर तुझ को जी उठूँगा मैं हर ख़ुशी में तिरी ख़ुशी है मिरी कौन कहता है जल उठूँगा मैं ज़िंदगी ज़िंदगी नहीं तो क्या ज़िंदगी से गले मिलूँगा मैं ख़ुल्द दोज़ख़ दुकान हो या घर तू जहाॅं जाएगा चलूँगा मैं ज़िंदगी से मुझे नहीं है प्यार तू रहेगी तो ही रहूँगा मैं प्यार से बात वो करे न करे प्यार की बात तो करूँँगा मैं अपनी मर्ज़ी का मैं तो मालिक हूँ यूँँ जिया हूँ यूँँ ही जिऊँगा मैं — Prashant Kumar
दिल तुम सेे कर चुका है हमेशा की यारियाँ फिर क्यूँँ चला रहे हो मिरे दिल पे आरियाँ किस को सुनाएँ कौन सुनेगा हमारियाँ धर लेगा हाथ कान पे सुन बे-क़रारियाँ जो लोग मुझ कबीर को क़ातिल बुला रहे करते फिरेंगे याद मिरी दस्त-कारियाँ इंसान हो परिंद हो शैतान या ख़ुदा सब की निभा रहे हैं हमीं ज़िम्मेदारियाँ इस को सुना रहे कभी उस को सुना रहे क्यूँँ कर रहे हैं लोग मिरे ग़म की ख़्वारियाँ तुझ को मुझे कोई भी यहाँ जानता नहीं मशहूर इस क़दर हैं तिरी मेरी यारियाँ अब क्या बताएँ तुझ को मोहब्बत की दास्ताँ रातों को तेरी याद में चलती हैं आरियाँ इतना बता दे बस तू अगर बाग़बान है फूलों के साथ सूख रहीं क्यूँँ ये क्यारियाँ हर शख़्स की ज़बाँ पे तिरा मेरा नाम है मशहूर हो गई हैं तिरी मेरी यारियाँ — Prashant Kumar

Nazm

पहला प्यार पहली दफ़ा जब आँख मिली तो दिल में उठे तूफ़ान कई दिल ने दिल का हाल सुनाया जागे फिर अरमान कई उन का बदन नाज़ुक नाज़ुक था देख के हम शर्माए बहुत दोनों अंजाने थे लेकिन इक दूजे को भाए बहुत ख़ुद को बड़ी मुश्किल से सँभाला ऐसा लगा अब जान गई रुख़ से पल्लू जब सरकाया फिर तो हुए बेजान कई हँसते हुए लट बिखरा के वो सामने आ कर बैठ गए शर्म से हम ने उठना चाहा वो तो हम पर ऐंठ गए हाथ पकड़ के पास बिठाया प्यार की बातें करने लगे गाल भी चू में हाथ भी चू में और किए एहसान कई अगले दिन जब याद आई तो दिल जोरों से रोने लगा प्यार था पहला दिल था ज़िद्दी पीछे पीछे आ ही गया हम ने दिल को रोकना चाहा और इसे समझाया भी लेकिन इसने एक न मानी और किए नुक़सान कई — Prashant Kumar
"तू वही लड़की है मैं भी वही लड़का हूँ" क्या याद है गोरी बचपन में दिल तू ने रखा था अचकन में दिल तुझ सेे मैं ने माँगा था फिर ठेंगा तू ने दिखाया था तू सच में वो ही लड़की है मैं सच में वो ही लड़का हूँ तू मुझ सेे मोहब्बत करती है मैं तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ दिल धड़कन एक मिनट में सब आपस में जितनी बार मिले हम दोनों भी इक दूजे से इक दिन में उतनी बार मिले जब मुझ सेे ग़लती होती थी तू पागल कह के चिढ़ाती थी पीछे से दुबारा आती थी तू छेड़ के मुझ को जाती थी पर जब लगती थी चोट मुझे तू दूर से रोने लगती थी जल्दी से भाग के आती थी सीने से मुझ को लगाती थी कहती थी सॉरी कान पकड़ तू दारू दवा सब करती थी तू साथ में मेरे खेली है मैं साथ में तेरे खेला हूँ तू लड़की हाई-फाई है और मैं लड़का अलबेला हूँ तू सच में वो ही लड़की है मैं सच में वो ही लड़का हूँ तू मुझ सेे मोहब्बत करती है मैं तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ मैं रोज़ तिरे घर आता था तू रोज़ मिरे घर आती थी स्कूल को दोनों जाते थे तू मुझ को रोज़ बुलाती थी तू मुझ को घर पे पढ़ाती थी और हाथों से लिखवाती थी कितनी शैतानी करता था तू कान पकड़ के रखती थी मैं आँख से ओझल होता था फिर तू भी डरने लगती थी तू मुझ को ढूँढती थी सब में तू मुझ को देखती थी सब में तू जान बताती थी मुझ को हाथों से खिलाती थी मुझ को मैं शाम सवेरे जान-ए-मन तेरी गोदी में सोया हूँ तू सच में वो ही लड़की है मैं सच में वो ही लड़का हूँ तू मुझ सेे मोहब्बत करती है मैं तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ — Prashant Kumar
"दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है" अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है होंठों पे मिरे प्यार का पैग़ाम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है ये रोग जवानी में सभी को ही लगा है बिन इश्क़ मोहब्बत के भला किस का हुआ है ऐसा है यहाँ कौन जो बदनाम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है मतलब की मोहब्बत से परेशान रहा हूँ मैं क्यूँँकि यहाँ बनके इक इंसान रहा हूँ कैसा भी कहीं दिल को अब आराम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है लोगों ने मोहब्बत का यहाँ ढोंग रचाया वादे सभी झूटे किए इल्ज़ाम लगाया मुझ सा कोई आशिक़ कहीं बदनाम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है मैं जाऊँ जिधर लोग हँसी मेरी उड़ाते पागल भी बताते हैं मुझे फिर भी सताते मालिक तिरी दुनिया में मिरा काम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है — Prashant Kumar
"दौर-ए-जवानी" इसी उम्र में जो भी करना है कर लो इसी उम्र में तुम कि सज लो सँवर लो नहीं उम्र फिर लौट कर आएगी ये यही है समझ लो ख़ुदा का इशारा मिलेगी नहीं ज़िंदगी फिर दुबारा इसी उम्र में ऐश-ओ-आराम कर लो इसी उम्र में चाहो तुम नाम कर लो बहुत क़ीमती है जवानी का मौसम इसी में है बरसात पतझड़ का मौसम बहुत क़ीमती है ये दौर-ए-जवानी न आएगी फिर लौट कर ये जवानी मैं फिर कह रहा हूँ सभी से तिबारा मिलेगी नहीं ज़िंदगी फिर दुबारा इसी उम्र में सारे बच्चे बिगड़ते इसी उम्र में सारे बच्चे सुधरते अगर इस को चाहो तो सोना बना लो अगर इस को चाहो खिलौना बना लो ये पर्वत ये नदियाँ सभी पेड़ पौधे सभी अपने पथ पर चले जा रहे हैं ज़मीं आसमाँ कह रहे चाँद तारे यही कह रहा है नदी का किनारा मिलेगी नहीं ज़िन्दगी फिर दुबारा — Prashant Kumar
"चाँद तकता है रातों को छत से तुझे" क्यूँँ है इतनी जवाँ क्यूँँ है इतनी हसीं नाम किस ने रखा तेरा ज़ोहरा-जबीं तंग सी टॉप पहने अब आना नहीं चाँद तकता है रातों को छत से तुझे राह में देखता है पलट के तुझे मुझ को डर है कहीं ले न जाए तुझे राह में देखता है पलट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे चाँद में दाग़ है फिर भी मग़रूर है लग रहा अपनी आदत से मजबूर है तू जिधर जा रहा चाँद उधर आ रहा ये तुझे देख कर कितना शर्मा रहा आड़ में देखता है सिमट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे ख़ूब-सूरत बहुत लग रही आज तू आज से बन गई मेरी मुमताज़ जब कैसी कारीगरी है ख़ुदा की क़सम ज़ुल्फ़ से पाँव तक ज़हर है तू सनम मैं तिरी जान हूँ तू मिरी जान है ख़्वाब में देखता हूँ लिपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे अपनी सूरत दिखा दे ख़ुदा के लिए मुझ को दिल में बसा ले ख़ुदा के लिए अब तो घर से निकल आ ख़ुदा के लिए मुझ को अपना बना ले ख़ुदा के लिए उम्र भर के लिए बाहों में थाम ले ओ मिरी जान-ए-मन दिल से तू काम ले ऐसी बारिश में देखूँ रपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे माल ज़ेवर छिपे तेरी पोशाक में हैं फ़रिश्ते ख़ुदा सब तिरी ताक में जान ऐसे में घर से निकलना नहीं कोई ले जाएगा तुझ को अफ़्लाक में कुछ न कुछ बात तो तुझ में है जान-ए-मन यूँँ ही थोड़ी लुटाते हैं सब जान-ए-तन तेरी बाहों में देखूँ लिपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे तू अकेले दुकेले न जाना कहीं तुझ को समझा रहा हूँ मिरी हम-नशीं मैं कहीं रह न पाऊँगा तेरे बिना तू मुझे छोड़ कर यार जाना नहीं तेरी आँखों से मौसम बदलने लगा तेरी ज़ुल्फ़ों में जादू सा चलने लगा तेरे काँधे से पल्लू सरकने लगा जिस ने देखा नज़ारा ये जलने लगा नींद में देखता हूँ उचट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे जाँ तिरे नाम की जोश ही जोश में ख़ुद को रक्खूँगा अब तेरी आग़ोश में आते जाते सभी छेड़ते हैं तुझे टकटकी बाँध के देखते हैं तुझे हाँ बहुत देर तक देखते हैं तुझे चाँद तारे तुझे ताड़ते हैं सभी फ़ालतू में ही मुँह फाड़ते हैं सभी सब सेे ले जाऊँगा मैं झपट के तुझे चाँद तकता है रातों को छत से तुझे — Prashant Kumar
"तुम्हें देखती है हमारी नज़र फिर" तुम्हें देखती है हमारी नज़र फिर हमें देखती है तुम्हारी नज़र फिर कि छुप छुप के हम को न देखा करो तुम कोई फूल ऐसे न फेंका करो तुम कोई फूल ऐसे न फेंका करो तुम कि बदनाम होगी बिचारी नज़र फिर तुम्हें देखती है हमारी नज़र फिर दुपट्टा न खींचो न यूँँ गुदगुदाओ कोई देख लेगा अरे मान जाओ कोई देख लेगा अरे मान जाओ कहाँ जाएगी ये हमारी नज़र फिर तुम्हें देखती है हमारी नज़र फिर ज़माने में यकता तुम्हारा बदन है क़सम से बड़ा क़ीमती बाँकपन है क़सम से बड़ा क़ीमती बाँकपन है कहीं लग न जाए हमारी नज़र फिर तुम्हें देखती है हमारी नज़र फिर कि बदनाम चौखट ये घर लग रहा है यही सोच कर हम को डर लग रहा है यही सोच कर हम को डर लग रहा है कहीं रह न जाए कुँवारी नज़र फिर तुम्हें देखती है हमारी नज़र फिर ज़माने की तोहमत न लग जाए तुम पर हमारी तरह ही न हो जाओ बे-घर हमारी तरह ही न हो जाओ बे-घर कहीं मर न जाए कुमारी नज़र फिर तुम्हें देखती है हमारी नज़र फिर — Prashant Kumar
"अधूरी कहानी" मोहब्बत अधूरी कहानी है तुम बिन अधूरी अधूरी जवानी है तुम बिन मेरे दिल पे तुम हाथ धर के तो देखो ये धड़कन पुरानी पुरानी है तुम बिन मुझे कुछ भी दे दो मगर मैं न लूँगा मुझे तुम मिलोगे जभी मैं हँसूँगा हुई हैं मिरे हक़ में सब की दुआएँ मदीने से आने लगी हैं सदाएँ अधूरी मिरी हर निशानी है तुम बिन मोहब्बत अधूरी कहानी है तुम बिन तुम्हीं ने मुझे दिल चुराना सिखाया तुम्हीं ने मुझे इतना ज़िद्दी बनाया मिरे पास बैठो कहीं भी न जाओ मिरे साथ में अब चलो घर बसाओ अधूरी मिरी ज़िंदगानी है तुम बिन मोहब्बत अधूरी कहानी है तुम बिन मुझे साँस भी कल तुम्हीं ने तो दी थी वगरना मिरी ज़िंदगी ही नहीं थी चलो हाथ पकड़ो गले से लगाओ मोहब्बत हो मेरी सभी को बताओ वफ़ा की अधूरी कहानी है तुम बिन मोहब्बत अधूरी कहानी है तुम बिन तुम्हें देखने से सहर मेरी होती तुम्हें देखने से मिरी शाम होती तुम्हीं को ख़यालों में ढूँढा करूँँ मैं तुम्हारे ही दिल की गली में रहूँ मैं अधूरा इन आँखों का पानी है तुम बिन मोहब्बत अधूरी कहानी है तुम बिन कहीं ये न हो ग़ैर दिल में बसा लो मिरी बारी आए तो नज़रें घुमा लो मिरे साथ होगे सलामी करेगा ये चंदा तुम्हारी ग़ुलामी करेगा अधूरा बदन ये जवानी है तुम बिन मोहब्बत अधूरी कहानी है तुम बिन — Prashant Kumar
"अगर तुम न आते मिरी ज़िंदगी में" न ये दिल धड़कता न फिर बात होती न मौसम बदलता न बरसात होती न दिन ही निकलता न फिर रात होती अगर तुम न आते मिरी ज़िंदगी में अगर तुम न आते मिरी ज़िंदगी में ज़रा भी किसी का सहारा न होता अगर तुम न आते गुज़ारा न होता अकेले-अकेले ही घुट घुट के जीता सभी आशिक़ों की तरह रोज़ पीता अगर तुम न आते मिरी ज़िंदगी में इधर लोग मुझ को भिखारी समझते ये बच्चे गली के मदारी समझते कई लोग मुझ को जुआरी समझते मुझे राक्षस भी मुरारी समझते अगर तुम न आते मिरी ज़िंदगी में कभी भी न इतनी हसीं रात होती सितारों की महफ़िल कहाँ साथ होती सदा आँसुओं की ही बरसात होती कहाँ दिन निकलता कहाँ रात होती अगर तुम न आते मिरी ज़िंदगी में पता ही न चलता मुझे ज़िंदगी का कि लेता सहारा मैं फिर ख़ुद-कुशी का मिटाता मैं नाम-ओ-निशाँ ज़िंदगी का अरे फिर मैं करता भी क्या ज़िंदगी का अगर तुम न आते मिरी ज़िंदगी में — Prashant Kumar
" गुलज़ार साहब के नाम" आज के दिन ही दीना में जन्म हुआ गुलज़ार का सुन याद में उन की पेश किया अफ़साना गुलज़ार का सुन बचपन में ही जुदा हुए थे वो अपने घर वालों से दिल में उन्होंने क्या बतलाऊँ दर्द हज़ारों पाले थे फिर भी उन के जीने के सब अंदाज़ निराले थे हाल सुनाया है बस मैं ने लफ़्ज़ों में गुलज़ार का सुन आज के दिन ही दीना में जन्म हुआ गुलज़ार का सुन याद में उन की पेश किया अफ़साना गुलज़ार का सुन घर से निकले जीते रहे ऐसे ही तन्हाई में भूखे प्यासे चलते रहे धूप कड़ी पुरवाई में ख़ून-पसीना एक किया जीवन की गहराई में ऐसे हासिल थोड़ी हुआ नाम उन्हें गुलज़ार का सुन आज के दिन ही दीना में जन्म हुआ गुलज़ार का सुन याद में उन की पेश किया अफ़साना गुलज़ार का सुन माँ का लाड़ मिला उन को न ही पिता का प्यार मिला समझा पराया अपनों ने ऐसा उन्हें घर द्वार मिला तुम क्या जानो जीवन में उन को क्या किरदार मिला हँस के निभाया हर रिश्ता जीवन के किरदार का सुन आज के दिन ही दीना में जन्म हुआ गुलज़ार का सुन याद में उन की पेश किया अफ़साना गुलज़ार का सुन गीतों का गुलशन चमका क़लमों की हरियाली से झूम उठी थी शहनाई उन के सुरों की लाली से उन की क़लम के चर्चे तुम सुन लो हर दिलवाले से राज़ रहेगा दुनिया की क़लमों पे गुलज़ार का सुन आज के दिन ही दीना में जन्म हुआ गुलज़ार का सुन याद में उन की पेश किया अफ़साना गुलज़ार का सुन सुख में दुख में साथ दिया अपनाया था राखी को जग में फिर मशहूर किया कितनों की आवाज़ों को ढूँढ़ रहा हूँ महफ़िल में आज उन के अफ़साने को हर फ़नकार पे कर्म हुआ राखी के गुलज़ार का सुन आज के दिन ही दीना में जन्म हुआ गुलज़ार का सुन याद में उन की पेश किया अफ़साना गुलज़ार का सुन — Prashant Kumar
"हिंदुस्तान वाले" मिलाकर देख तू भी हाथ हिंदुस्तान वाले हैं नहीं आएगी तुझ पे आँच हिंदुस्तान वाले हैं अरे इक बार हम सेे भी मोहब्बत देख तो कर के अरे हम जान दे देते हैं हिंदुस्तान वाले हैं अरे हम उँगलियों से चीर देते हैं पहाड़ों को कि इस दुनिया में असली मर्द हिंदुस्तान वाले हैं अगर दुश्मन भी आ जाए हमारी आस्ताँ पर तो कलेजे से लगा लेते हैं हिंदुस्तान वाले हैं सियासत हो बग़ावत हो मोहब्बत हो या नफ़रत हो सभी दिल खोलकर करते हैं हिंदुस्तान वाले हैं अरे सहराओं में भी हम गुल-ए-अहमर खिला देते कि काँटे फूल कर देते हैं हिंदुस्तान वाले हैं जहाँ जाते हैं हम अपनी वहाँ दुनिया बना लेते ख़ुदा भी फैन है अपना कि हिंदुस्तान वाले हैं हमारे जैसा बनने में गुज़र जाएगी पूरी उम्र असम्भव हम करें सम्भव कि हिंदुस्तान वाले हैं फ़क़ीरों को ग़रीबों को अरे दिल में बिठा लेते नहीं करते कोई भी फ़र्क हिंदुस्तान वाले हैं अरे हम जीत लेते जंग ऐसे ही निगाहों से हटा ले इक तरफ़ बंदूक हिंदुस्तान वाले हैं हमारे काँधे पे रख कर चलाते हैं सभी बंदूक हमारी साँस पे ज़िंदा हैं हिंदुस्तान वाले हैं — Prashant Kumar
आँखें तुम्हारी बहुत ख़ूब-सूरत हैं आँखें तुम्हारी बना दो इन्हें आज क़िस्मत हमारी इन्हीं की बदौलत जहाँ में ख़ुशी है इन्हीं की बदौलत यहाँ रौशनी है अगर देख लें ये परेशाँ जिगर को तो हो जाए फ़ारिग़ वो दिल उम्र-भर को ख़ुदा ने भी इन की नज़र है उतारी बहुत ख़ूब-सूरत हैं आँखें तुम्हारी बना दो इन्हें आज क़िस्मत हमारी है कितनी मोहब्बत इन आँखों से हम को अगर पास आओ तो बतलाएँ तुम को इन आँखों के दम से ही ज़िंदा हैं हम तो बिना इन के फाँसी का फंदा हैं हम तो इन्हें देखते रोक कर सब सवारी बहुत ख़ूब-सूरत हैं आँखें तुम्हारी बना दो इन्हें आज क़िस्मत हमारी यही कह रहे हैं ये चंदा सितारे तुम्हारी निगाहें हैं आलू बुखारे कोई देख कर कैसे ख़ुद को संभाले इन्हें क्यूँँ न वो दिल में अपने बसा ले इन आँखों की करते हैं पूजा पुजारी बहुत ख़ूब-सूरत हैं आँखें तुम्हारी बना दो इन्हें आज क़िस्मत हमारी — Prashant Kumar
"इंसान की दुनिया तो है इंसान नहीं है" इंसान की दुनिया तो है इंसान नहीं है कैसा भी मिरे दिल में अब अरमान नहीं है हैवान हैं याँ सब कोई इंसान नहीं है कैसा भी मिरे दिल में अब अरमान नहीं जो कुछ भी बना हूँ मैं वो मेहनत से बना हूँ दौलत से बना हूँ न सियासत से बना हूँ हाँ मुझ पे किसी का कोई एहसान नहीं है इंसान की दुनिया तो है इंसान नहीं है पहचान बिना कोई तुझे काम न देगा देगा भी कोई काम तो आराम न देगा अपनी तो कहीं भी कोई पहचान नहीं है इंसान की दुनिया तो है इंसान नहीं है जो बात है हक़ की ये वही बात छुपाते ये एक ही चेहरे में कई चेहरे लगाते इन की तो तरफ़-दारी में भगवान नहीं है इंसान की दुनिया तो है इंसान नहीं है मुँह पे तिरे तेरी मिरे मुँह पे मिरी कहते बाहरस ही अपने लगे अंदर से ये जलते तुझ को अभी इंसान की पहचान नहीं है इंसान की दुनिया तो है इंसान नहीं है — Prashant Kumar
"मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है" तू सब सेे जुदा है तू सब सेे हसीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है ज़माने में तुझ सेा न कोई कहीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है तुझे देख कर ही निकलता है सूरज तुझे देख कर रोज़ ढलता है सूरज तू इक बा-वज़ू अप्सरा है मिरी जाँ ख़ुदा भी तो तुझ पे फ़िदा है मिरी जाँ तुझी से मोहब्बत करेगा यक़ीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है तुझे काम सब छोड़ कर देखते हैं बिना बात के फूल भी फेंकते हैं कि मुम्ताज़ भी तेरे जैसी नहीं है यहाँ एक तू ही महा-सुंदरी है बहुत ख़ूब-सूरत है ज़ोहरा-जबीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है — Prashant Kumar
"सदा-ए-मुफ़लिस" मैं देने के लाएक़ नहीं कुछ किसी को सो अपने बदन की क़बा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मिरी ज़िंदगी की दुआ करने वालों तुम्हें आख़िरी मैं दुआ दे रहा हूँ मुबारक हो सब को ख़ुशी का ठिकाना ये महफ़िल ख़ुशी की तुम्हें दे रहा हूँ मिरे पास खाने को कुछ भी नहीं है सभी के लिए ये जवा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ अरे मत करो कोई एहसान मुझ पर उतारूँगा कैसे ये एहसान लोगों मुझे उम्र-भर गालियाँ दोगे फिर सब हमेशा रहोगे परेशान लोगों ज़रूरत नहीं कुछ भी देने की मुझ को मैं तुम को तुम्हारी वफ़ा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मुझे कोई ख़ुश रहने की मत दुआ दो ये ग़म ही मिरी ज़िंदगी बन गया है मुझे दर्द-ए-दिल ही सभी लोग देना यही तो मिरी बंदगी बन गया है मिरी ज़िंदगी आग का एक गोला है ऐसे में तुझ को हवा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ कभी तो मिलेगी मुझे मेरी मंज़िल यही सोच कर के चला जा रहा हूँ मुझे कुछ न लेना न देना किसी से ज़माने में सब सेे मैं तन्हा रहा हूँ मैं दुश्मन हूँ सबका मगर देख फिर भी सभी के लिए दिल में जा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ कोई ये न कहना कभी उन सेे जा कर कि ज़ख़्मों को कैसे मैं अब सी रहा हूँ अगर हाल मेरा कोई तुम सेे पूछे तो कहना यही पी के मैं जी रहा हूँ अब इस सेे ज़ियादा नहीं देने को कुछ तुम्हें अपना रंग-ए-नशा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ ये दिल की सदा है इसे दिल से सुनना कहीं भी न फिर ये दुबारा मिलेगी मिरी ज़िंदगी मुफ़लिसी में कटी है इसी में कटेगी इसी में कटेगी मिरे हाल पर कोई रोना नहीं मैं बस ऐसे ही ख़ुद को सज़ा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मिरे पास जाँ के सिवा कुछ नहीं है जिसे दे रहा हूँ यही दे रहा हूँ मैं सब जानता हूँ मुझे मत सिखाओ मैं जो दे रहा हूँ सही दे रहा हूँ अमीरों की औक़ात के जो है बाहर फ़क़ीरों को मैं वो अता दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ — Prashant Kumar
"दुपट्टा" चले जा रहे हैं वो गुम हैं ख़यालों में धरती पे लटका हुआ है दुपट्टा ख़बर होगी तब तक सरक जाएगा सब यूँँ काँटों में अटका हुआ है दुपट्टा ज़ियादा हिलो मत इधर से उधर तुम कहीं फट न जाए बहुत क़ीमती है कराया गया है फ़रिश्तों से तैयार काँटों में अटका हुआ है दुपट्टा इधर से उधर तुम न हिलना न डुलना बस ऐसे ही रहना अभी आ रहा हूँ कहीं हो न जाए तुम्हें कुछ मिरी जान गर्दन में अटका हुआ है दुपट्टा बहुत सावधानी बरतनी पड़ेगी इसे मैं निकालूँगा ऐसे ही रहना मैं पहुँचा हुआ आदमी हूँ बहुत ही निगाहों में खटका हुआ है दुपट्टा कि तितली के पंखों से ज़्यादा हो नाज़ुक कहीं चुभ न जाए तुम्हें कोई काँटा तुम्हें मैं निकालूँगा इन वादियों से कि काँटों में अटका हुआ है दुपट्टा कभी दब रहा है मिरे पाँव से तो कभी दब रहा है तुम्हारे क़दम से इधर दाएँ कुछ भी नहीं है तुम्हारे उधर पूरा लटका हुआ है दुपट्टा यहाँ से वहाँ तक इधर से उधर तक बता ऐसी काँटों भरी वादियों में कहाँ तक निकालूँगा ऐसे मैं काँटा कि पूरे में अटका हुआ है दुपट्टा — Prashant Kumar
"नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ" नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ मिरी जान हो तुम मिरे पास आओ नहीं दूर से देख कर मुस्कुराओ मिरी जाँ मोहब्बत में क्या शर्म करना ग़लत कुछ नहीं है मोहब्बत में आओ नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ मोहब्बत को मेरी न हल्के में लेना मैं पहुँचा हुआ आदमी हूँ समीना बहादुर हूँ बंदा किसी से न डरता मुझे जो भी कहना है मुँह पर ही कहता सुनाना है जो कुछ भी जल्दी सुनाओ नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ मिरी बात का मत बुरा मान जाना मैं ऐसा ही हूँ यार पागल दिवाना इधर देखो बातों पे मेरी न जाना समझदार हो तुम मैं पागल दिवाना मिरी जान हो तुम मिरे पास आओ नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ अगर आह भर के मुझे देखना हो अगर फूल ऊपर मिरे फेंकना हो घुमाकर नज़र हर तरफ़ देख लेना कहीं कोई है तो नहीं पास हमदम अगर पास हो कोई रुक जाना हमदम मिरी जान तुम काम दिल से ही लेना न तुम चुपके चुपके मिरे पास आना कोई चीज़ मेरे लिए तुम न लाना अगर देख लेगा कोई क्या कहेगा वो बदनाम सारे जहाँ में करेगा मोहब्बत है मुझ सेे तो मुझ को बताओ नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ जिधर बैठता मैं उधर बैठते हो हमेशा मिरी ही तरफ़ देखते हो समझदार हो यार समझा करो तुम मुझे देर तक यूँँ न देखा करो तुम अकेले मिलूँ तब ही बोला करो तुम कोई सामने हो तो बन जाओ अंजान फिर ऐसे रहो जैसे हो मेरे मेहमान करो काम सारे नज़र में मत आओ नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ तुम ऐसे में निकलो न लूँ चल रही है हवा भी कई रंग में ढल रही है बहुत तेज़ गर्मी इधर बैठ जाओ लो पानी पियो और फिर मुस्कुराओ नज़र से मिलाकर नज़र मत चुराओ — Prashant Kumar
"कौन हो तुम" ख़ुदा की क़सम आज क्या लग रही हो बला की बला की बला लग रही हो सभी लोग कहते मज़ा लग रही हो हमें तो मगर तुम क़ज़ा लग रही हो कि कुछ तो बता दो अरे कौन हो तुम अरे जानलेवा बदन है तुम्हारा मगर दिल हमारा सजन है तुम्हारा इधर आओ जानम कि जाती कहाँ हो हमारे ही दिल में भवन है तुम्हारा लगा दो हमें हथकड़ी उम्र-भर को क़सम ज़िंदगी की सज़ा लग रही हो कि कुछ तो बता दो अरे कौन हो तुम तुम्हारी वजह से ही पागल हुए हैं तुम्हें देख कर लोग घाइल हुए हैं तुम इंसान हो कौन हो ये बताओ तुम्हारे मु'अम्में कहाँ हल हुए हैं तुम्हें देख कर तो सभी खेलते हैं हमें कोई उड़ती हवा लग रही हो कि कुछ तो बता दो अरे कौन हो तुम तुम्हें देख कर रोग जाने लगे हैं तुम्हारी तरह मुस्कुराने लगे हैं तुम्हारा करम हम पे जब से हुआ है ख़ुदा के फ़रिश्ते बुलाने लगे हैं ख़ुदा की भी तक़दीर तुम ने सँवारी हमें तो ख़ुदा का ख़ुदा लग रही हो कि कुछ तो बता दो अरे कौन हो तुम — Prashant Kumar
"ज़मीं-ए-हिंद" सारे जहाँ से अच्छी बस हिंद की ज़मीं है आबाद करने वाली हर शख़्स को ज़मीं है इस के ही लब पे पहले वहदत का गीत आया इसने ही सब सेे पहले पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया सारे जहाँ को इसने इल्म-ओ-हुनर सिखाया कोई भी गीत क़ौमी इसने न गुनगुनाया नंगे उघारे फिरते लोगों की आबरू को मिंदील देने वाली हर एक को ज़मीं है दुश्नाम दे रहा है हर शख़्स इस ज़मीं को तिरपाल जब दिया है इसने ही हर किसी को सारे जहाँ को इसने जीवन नया दिया है सहराओं तक में इसने हर गुल खिला दिया है निखरे हैं इस ज़मीं में रुख़सार हम-नशीं के गजरे में खिलने वाला गुलफ़ाम भी ज़मीं है हिंदू का है न इस पर मुर्ग-ए-हरम का एहसाँ अंधा हुआ पड़ा है क्यूँँ धर्म में फिर इंसाँ शामिल है ख़ून इस में हम सबके तन बदन का सदक़ा उठा रहे हैं सब इस के बाँकपन का सारा जहाँ पला है आँचल में इस ज़मीं के ताक़ों पे धरने वाली हर क़ौम को ज़मीं है ज़िंदा है इस के दम पर सारे जहाँ की रौनक़ सब आज़मा रहे हैं इस के ही दम पे क़िस्मत इसने नहीं सिखाया आपस में बैर करना इसने सिखाया सब को आपस में प्रेम करना हिंदू हों या हों मुस्लिम वंदे हैं सब इसी के आँचल में लेने वाली इक साथ सब ज़मीं है है इस ज़मीं पे सबका हक़ एक ही बराबर कोई नहीं है नीचे कोई नहीं है ऊपर दुख सुख में इस के हरदम सब लोग साथ होंगे मुस्लिम हों सिख हों हिंदू सब साथ साथ होंगे आएगी आँच इस पर हाथों में हाथ होंगे सब छाँव में इसी की पलकर बड़े हुए हैं दाना खिलाने वाली हर शख़्स को ज़मीं है इस पर जब आँच आए सब साथ चल के आना धर्मों को मज़-हबों को रस्ते में छोड़ आना क़ौमी लिबास सारे घूरे पे फेंक आना हाथों में हाथ डाले सब मुस्कुराते आना तुम मुश्किलों में इस को मत छोड़ कर के जाना तरसे हैं इस ज़मीं को मत पूछो कितने काफ़िर इक़बाल से मिली पर तुम को ही ये ज़मीं है इस हिंद की ज़मीं पर जो भी उठाए उँगली उस को अभी उठा ले ख़ालिक़ तू इस जहाँ से इस हिंद की ज़मीं पर जिस का जनम हुआ है आबाद रखना ख़ालिक़ मेरी यही दुआ है — Prashant Kumar
"जब पापा पापा कहते थे" जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे जब पापा हम ने कहवाई जाँ फट के गले में है आई तब हँसते गाते फिरते थे अब मारे मारे फिरते हैं न ही कुछ खोने का डर था तब न ही कुछ पाने की इच्छा थी तब मन में जहाँ भी आता था वहीं पे रोया करते थे हम रोने के लिए भी अब हम को जा बुक करवानी पड़ती है जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे स्कूल को हम तुम जाते थे तब ज़ेब में पैसे रहते थे अब हाथ सभी के ख़ाली हैं कैसी यार अब की पढ़ाई है वो पीठ पे बोझ किताबों का और जेब में कंचे रहते थे जब स्कूल से घर आते थे तो चाॅक चुरा कर लाते थे गिल्ली डंडा ले ले कर रोज़ हम गलियों गलियों फिरते थे जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे याद आता है वो दौर हमें दादी के आँचल में छुपते थे मम्मी को झूट बताते थे पापा को झूट बताते थे फिर होती ख़ूब पिटाई थी हम अक्कड़ बक्कड़ करते थे खुट्टल बुट्टल भी करते थे जिस सेे भी लड़ाई होती थी जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे नाना नानी मौसा मौसी मेहमान जो घर में आते थे उन की ज़ेब से पैसे चुराते थे उन के बैग से चीज़ चुराते थे वो बचपन याद आता है जब बारिश में भीगा करते थे काग़ज़ की नाव बना कर ख़ूब आँगन में हम ने चलाई थी जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे मम्मी की आँखों में रहते ओझल न कहीं फिर होते थे मम्मी पापा के हिस्से की हर चीज़ हमीं ने खाई थी पापा की गोदी में रहते हम रोज़ दुकानों पर जाते फिर चीज़ वही मिलती हम को उँगली जिस पर भी उठाई थी जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे वो दिन याद आते हैं हम को जब सबके दिलों में रहते थे बचपन का फ़साना याद आया अब आँख मिरी भर आई है — Prashant Kumar