Prashant Kumar

Prashant Kumar

@adarshgangwar817128

Adarsh Gangwar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Adarsh Gangwar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm
दिल ख़ुश-गवार भी है तिरा बे-क़रार भी
कुछ कुछ तो लग रहा है हमें उस्तुवार भी

हरदम उन्हीं के रहते हो घर में घुसे हुए
ऊपर से बन रहे हो बड़े नाक-दार भी

करता हूँ दो शिकार मैं तो एक तीर से
फ़न गीतकार भी है मिरा हुस्न-कार भी

तुमने नहीं कहा था जहाँ छोड़ दे अभी
ऊपर से कर रहे हो मिरा इंतिज़ार भी

तुम लोग कह रहे हो भला आदमी उसे
मुझको नज़र से लग रहा है 'ऐब-दार भी

मुझ पर ही मेरी जान का इल्ज़ाम धर दिया
ऊपर से बोलते हो मुझे ग़म-गुसार भी

हरदम नमक लगाना ग़रीबों के ज़ख़्म पर
ये तेरा काम-काज है और रोज़गार भी
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Prashant Kumar
मिरे अंदाज़ ज़माने से निराले होंगे
आज अँधेरे हैं तो क्या कल को उजाले होंगे

एक रोटी में सुनाते हैं तुझे कितना कुछ
कल से होंटों पे तिरे मेरे निवाले होंगे

कम से कम सैकड़ों को भूख ने मारा होगा
बच गए जितने सभी दर्द ने पाले होंगे

अब हमें मौत भी मक़बूल नहीं करती है
ज़िंदगी तू ही बता किसके हवाले होंगे

हर दफ़ा छीन लिया मेरा निवाला सबने
फिर तो बच्चे भी तिरे भूख ने पाले होंगे

अरे कमरे में मिरे कुछ भी नहीं है सच्ची
चार दीवार मिलेंगी बचे जाले होंगे

शहर-ए-दिल में सुनो तो कोई नहीं रहता है
तुम कहाँ जा रहे हो सब में ही ताले होंगे

छोड़ के ख़ुद को ज़माने को दिया है मरहम
फिर तो बेशक ही तिरे पाँव में छाले होंगे
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Prashant Kumar
ज़माने के ज़ुल्म-ओ-सितम देख लो
मिरी ज़िंदगी के भी ग़म देख लो

क़यामत से बढ़कर रहे हैं सभी
कमर के न मानो तो ख़म देख लो

मोहब्बत तो करने चले हो मगर
मोहब्बत में क्या-क्या हैं ग़म देख लो

ये ख़ंजर चलाने से पहले सुनो
मिरा हाल तो कम से कम देख लो

अरे अब के ज़ाहिद भी पीने लगे
न मानो तो दैर-ओ-हरम देख लो
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Prashant Kumar
ख़ाक बस्तियों में घर रेत के बनाओगे
रोज़ रोज़ ऐसे ही ख़ूब चोट खाओगे

सोचते तो हैं हम भी छत से कूद जाएँ अब
फिर ख़याल आता है तुम कहाँ पे जाओगे

जो हमारे हो कर भी हर किसी को देखोगे
बे-वफ़ा की गिनती में यार आ ही जाओगे

बे-नक़ाब होकर के हम निकल तो आएँगे
हो गया कहीं कुछ भी हमपे टिन-टिनाओगे

शब के आठ बजते ही तुम कहाँ पे जाते हो
कोई पूछ बैठा फिर बोलो क्या बताओगे

जब रक़ीब बनकर ही कुछ नहीं हुआ तुमसे
तुम हबीब बनकर क्या बस्तियाँ जलाओगे

जब नज़र झुकाओगे बात बन ही जाएगी
प्यार से जो बोलेंगे तुम भी मान जाओगे

इश्क़ का मुहब्बत का जब बुख़ार आएगा
वक़्त पर दवा लेना ख़ुद ही भूल जाओगे

जब कभी भी तन्हाई नोच करके खाएगी
मेरा नाम लिख कर तुम हाथ पर मिटाओगे

दास्ताँ मोहब्बत की एक बार सुन लोगे
मेरा नाम गीतों में तुम भी गुन-गुनाओगे
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Prashant Kumar
हुस्न वालों में सभी को शंग होना चाहिए
और इसके साथ ही नव-रंग होना चाहिए

अंजुमन में आएँगे तो दाद भी देंगे मगर
हर सुख़न-वर शर्त है ख़ुद-रंग होना चाहिए

मैं ज़माने में अगर मंसूब था तो तुमसे था
क़ब्र में भी तुमको मेरे संग होना चाहिए

तीस दिन में एक दिन ही दिल पे दस्तक देते हो
इश्क़ करने का कोई तो ढंग होना चाहिए

मुझसे ही मंसूब है इस मुल्क की मिट्टी तो फिर
इस तिरंगे में भी मेरा अंग होना चाहिए
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Prashant Kumar
ख़्वाबों में सही रोज़ सताने के लिए आ
आ फिर से मिरे दिल को चुराने के लिए आ

हर कोई समझता है मुझे काँच का मरहम
कुछ और हूँ मैं इनको बताने के लिए आ

हर बार तिरे बस में कहाँ मुझको उठाना
इस बार निगाहों से गिराने के लिए आ

वो रात वही दिन वही तन्हाई का आलम
आँखों में वही प्यास जगाने के लिए आ

साँसों के चराग़ाँ तिरी ज़ुल्फ़ों ने बुझाए
अब तू ही जनाज़े को उठाने के लिए आ

इक तेरे सिवा था ही मिरा कौन जहाँ में
सो क़ब्र की भी रस्म निभाने के लिए आ

जिन दस्त-ए-मुबारक में मिरी जान बसी थी
मस्जिद में वही हाथ उठाने के लिए आ
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Prashant Kumar
कुछ लोग ज़माने में हम नाम निकल आए
जो ख़ास सभी से थे वो 'आम निकल आए

है सबसे जुदा तेरा अंदाज़ तबस्सुम का
जो एक हँसी में दो गुलफ़ाम निकल आए

जो सबको सिखाते थे इकराम मुहब्बत का
उन पर ही मुहब्बत के इल्ज़ाम निकल आए

जो सबको बताते थे मैं अजनबी हूँ कोई
वो नाम से मेरे ही बदनाम निकल आए

तू अहल-ए-ज़मीं से सुन हर बात बना के रख
कुछ भी न पता किससे क्या काम निकल आए
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Prashant Kumar
तुम्हारे बाद से दुनिया मुझे शमशान लगती है
तुम्हारे बाद हर महफ़िल मुझे वीरान लगती है

क़बा ऐसी तो पहनाकर तुझे पहचान लूँ जिसमें
मुझे ऐसी क़बा में तू कोई शैतान लगती है

मरुँ तो इक तिलक इसका जबीं पर भी लगा देना
मुझे इस हिन्द की मिट्टी मिरा भगवान लगती है

तुझे तो आस्ताँ पर दिल ने पहली बार देखा है
कहाँ से आई है तू मौत का ऐलान लगती है
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Prashant Kumar