A R Sahil "Aleeg"

A R Sahil "Aleeg"

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A R Sahil "Alig" shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in A R Sahil "Alig"'s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

रूप बदले नाम बदले बदले एहसासात भी सब और फिर तुम बने तुम मैं बना मैं ख़त्म हम बाक़ी बचा है इश्क़ियात — A R Sahil "Aleeg"
मेरे इश्क़ का क़त्ल कर ख़ुश है 'साहिल' यही थी तेरे दिल की हसरत मुबारक — A R Sahil "Aleeg"
मेरे हाल पर सब उछल कर ये बोले तुम्हें इश्क़ और ये मोहब्बत मुबारक — A R Sahil "Aleeg"
कहाँ कितना हुआ बर्बाद मैं इश्क़-ओ-मोहब्बत में मैं माज़ी के झरोखों से ये जा कर देख लेता हूँ — A R Sahil "Aleeg"
सभी के वास्ते मुमकिन नहीं है इश्क़ में ये वो दिल जलाए जिसे दिल जलाना आता है — A R Sahil "Aleeg"
हमें मालूम था इस इश्क़ में ऐसा ही होता है किसी पर जाँ छिड़कते हैं किसी से दिल लगाते हैं — A R Sahil "Aleeg"
डर से घर से बाहर कब जाते हैं हम एक्सीडेंट करा देता है इश्क़ हमें — A R Sahil "Aleeg"
रहे क़ाएम-ओ-दाइम अहद-ओ-पैमाँ पर कहाँ मिलते हैं ऐसे नस्ल-ए-आदम अब — A R Sahil "Aleeg"
निकलने को न जाने दिल से जाँ क्या क्या नहीं निकला नहीं निकला तो बस इक इश्क़ और शहर-ए-मुज़फ़्फ़रपुर — A R Sahil "Aleeg"
अक्स किरदार का भी दिखता है आप समझे न महज़ लफ़्ज़ इसे — A R Sahil "Aleeg"
जहाँ भर में यकदम से मैं छा गया हूँ किया इश्क़ बर्बाद हज़रत मुबारक — A R Sahil "Aleeg"
हुए हैं इश्क़ में बदनाम इतने हम 'साहिल' हमारा नाम यहाँ रोज़ ही ख़बर में है — A R Sahil "Aleeg"
क़फ़स से इश्क़ है जिन को अलग वो रह नहीं सकते मगर फिर भी परिंदों को उड़ा कर देख लेता हूँ — A R Sahil "Aleeg"
इश्क़ के मारे हो तुम तुम को पता ही होगा बे-वफ़ाई के ये नश्तर नहीं देखे जाते — A R Sahil "Aleeg"
जो ज़ाए हो गए सो हो गए उन पर गिरा दो ख़ाक मगर अब इश्क़ में कोई भी आँसू मत गिरा देना — A R Sahil "Aleeg"

Ghazal

झील झरना दरिया जंगल सहरा सहरा इश्क़ है जिस तरफ़ भी देखिए हर सम्त फैला इश्क़ है आप चाहे लाख काबा-ओ-कलीसा छानिए बस वहीं पर है ख़ुदा जिस दिल में बैठा इश्क़ है जो यहाँ डूबा कभी उभरा नहीं है दोस्तो काएनाती हर समुंदर से भी गहरा इश्क़ है आ किसी दिन आ के इस को थोड़ी ठंडक बख़्श दे मेरे दिल में एक मुद्दत से दहकता इश्क़ है और दुनिया में कोई तदबीर दूजी है नहीं आशिक़-ए-बीमार का बस इक मुदावा इश्क़ है धड़कनों की है मसाजिद और है महबूब रब मज़हब-ए-आशिक़ अगर है तो ये यकता इश्क़ है दिल से दिल तक रहनुमाई कर रहा है हर घड़ी हम दिवानों के क़बीलों का मसीहा इश्क़ है आप कहने को कहे कुछ भी मगर सच है यही देखने वालों ने तो हर शय में देखा इश्क़ है मुझ से 'साहिल' पूछते हैं वो मेरे दिल में है क्या मैं तो आशिक़ हूँ मेरी हर इक तमन्ना इश्क़ है — A R Sahil "Aleeg"
सफ़ में दीवानों की आने के लिए इश्क़ करें आग इस दिल में लगाने के लिए इश्क़ करें हम उसे अपना बनाने के लिए इश्क़ करें फिर सितम ये कि भुलाने के लिए इश्क़ करें कब कहा हुस्न को पाने के लिए इश्क़ करें हुस्न के नाज़ उठाने के लिए इश्क़ करें रूठने और मनाने के लिए इश्क़ करें कब कहा हम ने जताने के लिए इश्क़ करें रब ने भेजा है चुकाने के लिए इश्क़ का क़र्ज़ बस वही क़र्ज़ चुकाने के लिए इश्क़ करें कह चुकी तर्क-ए-त'अल्लुक़ पे बहुत कुछ दुनिया आप रस्मन ही निभाने के लिए इश्क़ करें अक़्ल तो ख़ुद ही ठिकाने पे चली आएगी आप बस दिल के ठिकाने के लिए इश्क़ करें इस सेे बेहतर हैं ज़माने में कई और भी काम दिल को क्यूँ अपने दुखाने के लिए इश्क़ करें हम से दिल कौन लगाएगा ये छोड़ें 'साहिल' आप तो सिर्फ़ फ़लाने के लिए इश्क़ करें — A R Sahil "Aleeg"
तमाम उम्र रहा है इसी सफ़र में इश्क़ नज़र तो आए कभी तेरी इस नज़र में इश्क़ रगों में यूँँ हैं रवाँ नफ़रतें कि पूछो मत दिखाई देता नहीं अब किसी बशर में इश्क़ डगर डगर पे हसीनों के देखिए जल्वे बदन बदन में महक है नज़र नज़र में इश्क़ सिवाए इस के सिखाया नहीं मुझे कुछ भी ख़ुदा ने भेजा है भर कर मेरे हुनर में इश्क़ दिखाई कुछ भी नहीं देता इस के मारों को बसा है ऐसे हसीनों की हर नज़र में इश्क़ हमारा ख़त जो पहुँचता जवाब भी आता लगे है धूल ही खाया है डाक-घर में इश्क़ रहे है बाक़ी दिनों में ख़फ़ा ख़फ़ा सा वो कभी कभार लड़ाता है साल भर में इश्क़ ये कामयाबी के नुस्खे़ मुझे न दे 'साहिल' न दिल में ताब बची है मेरे न सर में इश्क़ — A R Sahil "Aleeg"
नज़र में ख़्वाब किसी का सुहाना आता है हर एक बात पे उस को बहाना आता है छुपा रहा हूँ मैं हर ग़म छुपाना आता है कोई हो हाल मुझे मुस्कुराना आता है सभी के वास्ते मुमकिन नहीं है इश्क़ में ये वो दिल जलाए जिसे दिल जलाना आता है अजीब खेल है क़िस्मत का देखिए तो सही वो रो रहा है जिसे मुस्कुराना आता है अमीर लोगों पे कुछ तो ख़ुदा की है रहमत किसी के हाथ यूँँ ही कब ख़ज़ाना आता है बताओ कैसे करूँँ तुम से चैन की उम्मीद तुम्हें तो सिर्फ़ मेरा दिल दुखाना आता है हमारे बीच ज़माने का जब नहीं है दख़्ल हमारे बीच भला क्यूँ ज़माना आता है मुझे भुलाने की जिद है तो ठीक है 'साहिल' भुलाने वाले तुझे कुछ भुलाना आता है — A R Sahil "Aleeg"
राधा से इश्क़ कर ले या बंसी से इश्क़ कर तू चाहता है जिस को भी उस ही से इश्क़ कर अज्दाद ने कहा था के करना नहीं दग़ा बन जाए बे-वफ़ा तो भी उस ही से इश्क़ कर कब तुझ से बे-वफ़ाई करे कुछ ख़बर नहीं दरिया से इश्क़ कर न तू कश्ती से इश्क़ कर दोनों जहाँ में काम तेरे आएगी यही ये बात मेरी मान ले नेकी से इश्क़ कर मुझ सा फ़क़ीर शाह के दर पर न जाएगा करना है तुझ को शाह की जूती से इश्क़ कर कोई यहाँ पे और नहीं काम आएगा मक़्तल में आ गया है तो बरछी से इश्क़ कर ख़ुश हूँ निकाल कर मैं तुझे दिल से बे-वफ़ा दो चार क्या है सारी ही बस्ती से इश्क़ कर सूरत नहीं है कोई रिहाई की जब तेरी तू दिल लगा ले तौक़ से बेड़ी से इश्क़ कर मिल जाए तुझ को क़ीमती अश'आर चार छह ये सोच कर ख़याल की नद्दी से इश्क़ कर अल्लाह फ़न ये देता है हर नौ निहाल को माँ बाप थोड़े कहते हैं मिट्टी से इश्क़ कर गर चाहता है मुझ को मेरे ऐब मत गिना करना है इश्क़ तुझ को तो ख़ूबी से इश्क़ कर साहिल पे कितनी मौजों ने आ कर कहा है ये सब को तलब है तेरी किसी से भी इश्क़ कर — A R Sahil "Aleeg"
करता है आशिक़ों के कलेजे पे वार इश्क़ जोबन पे ले के आता है जब भी निखार इश्क़ अच्छा नहीं है हिज्र ये दोनों के वास्ते कुछ बे-क़रार हम हैं तो कुछ बे-क़रार इश्क़ है कौन बे-वफ़ा ये बताएगा एक दिन ख़ुद फ़ैसला करेगा मियाँ आर-पार इश्क़ ये खेल हुस्न का है समझिए इसे हुज़ूर करता नहीं दिलों का कोई कार-बार इश्क़ कुछ तो सुबूत अपनी वफ़ाओं के छोड़ दे कैसे करेगा कोई तेरा ए'तिबार इश्क़ इक हम हैं हम सेे एक सँभाला नहीं गया कुछ लोग कर रहे हैं यहाँ चार चार इश्क़ महफ़िल में देख उन को निगाहें यूँँ फेर लीं 'साहिल' को कर न दे ये कहीं शर्मसार इश्क़ — A R Sahil "Aleeg"
रंग से रूप से लहजे से कि आवाज़ से इश्क़ सोचता हूँ कि करूँँ कौन से अंदाज़ से इश्क़ सर-फिरा कह के उसे सारे गुज़र जाते हैं कोई करता ही नहीं आशिक़-ए-जाँ-बाज़ से इश्क़ उन को अंजाम की परवाह नहीं रहती है वो जो करते हैं मियाँ इश्क़ के आगाज़ से इश्क़ आप को पहले भी देखा है कहीं तो मैं ने आप लगता है कभी करते थे ए'जाज़ से इश्क़ इस को मालूम नहीं है कि इसे नोचेगा कितनी नादान है चिड़िया जो करे बाज़ से इश्क़ कौन इस शहर में दुखड़ों को सुनेगा मेरे लोग करते हैं यहाँ आप की आवाज़ से इश्क़ जिस का ईमान सलामत है न गुफ़्तार का ढंग हाए फिर कौन करे काफ़िर-ए-तन्नाज़ से इश्क़ मात मुजरे को भी देते हैं अदब की महफ़िल भीड़ करती है फ़क़त झूठों से लफ़्फ़ाज़ से इश्क़ कौन पूछेगा हमें बज़्म में उन की साहिल सब के सब करते हैं बस साहिब-ए-एज़ाज़ से इश्क़ — A R Sahil "Aleeg"
ज़रा भी ख़ौफ़ मुझे अब न आन बान का है ये देखना है वो पाबंद क्या ज़बान का है मिटा रहा है अँधेरे गली के कम है क्या भले चराग़ किसी दूसरे मकान का है जो दरमियाँ है हमारे हमारा है ही नहीं ये फ़ासिला तो ज़मीं और आसमान का है ज़रा सी दूर उड़ा था मैं अपने पर खोले हवा में शोर अभी तक मिरी उड़ान का है बिखर गया है ज़मीं पर महकता है फिर भी ये फूल जाने भला किस के फूलदान का है भले अलग हैं तरीक़े मियाँ इबादत के है आरती का वही वक़्त जो अज़ान का है हमारा तीर नहीं जाता है हदफ़ के पार हदफ़ के पार निशाँ और ही कमान का है मैं अपने हक़ में सफ़ाई तमाम दे बैठा अब इंतिज़ार मुझे आप के बयान का है झलक ही जाती है लहज़े से परवरिश उस की ज़बाँ बताती है वो कैसे ख़ानदान का है डुबो न पाएगा दरिया कोई भी हम को ख़ुदा हमारे पास में 'साहिल' तेरी अमान का है — A R Sahil "Aleeg"
पहले हम को सिखाई वफ़ा इश्क़ ने और फिर कर दिया क्या से क्या इश्क़ ने जितनी मैं ने निभाई वफ़ादारियाँ हर क़दम उतना मुझ को छला इश्क़ ने क्यूँ नहीं कहते आसान है ये सफ़र दिन में तारे दिखाए हैं क्या इश्क़ ने हर कोई पढ़ रहा है सबक़ इश्क़ का खोल डाला है क्या मदरसा इश्क़ ने मेरी आवारगी मेरी दीवानगी मुझ को ये सब किया है अता इश्क़ ने ख़्वाब में रात ग़ालिब ने फिर ये कहा आप को भी निकम्मा किया इश्क़ ने इश्क़ ने ही मिलाया हमें बा-ख़ुदा और फिर कर दिया ख़ुद जुदा इश्क़ ने उस ने 'साहिल' सुखन में कमाया है नाम शा'इरी जिस को की थी अता इश्क़ ने — A R Sahil "Aleeg"
बेशक हो एक बार ज़रा सा तो इश्क़ कर दिल दे किसी पे वार ज़रा सा तो इश्क़ कर ज़ुल्फ़ों को ले सँवार ज़रा सा तो इश्क़ कर तुझ पर मरें हज़ार ज़रा सा तो इश्क़ कर ढल जाएगी ये धूप जवानी की एक दिन आँखों को कर ले चार ज़रा सा तो इश्क़ कर खिलने लगेगा इंद्रधनुष सा तेरा ये हुस्न तू बन वफ़ा शियार ज़रा सा तो इश्क़ कर आ जाएगी समझ है ये दीवानगी भी क्या कहता हूँ बार बार ज़रा सा तो इश्क़ कर है मशवरा ए अक़्ल न रख हुस्न से तू रब्त दिल की मगर पुकार ज़रा सा तो इश्क़ कर तन्हाइयों को छोड़ के रंगीनियों में तू कुछ वक़्त तो गुज़ार ज़रा सा तो इश्क़ कर गुलशन दिया उजाड़ ख़िज़ाँ ने सुनी न इक कहती रही बहार ज़रा सा तो इश्क़ कर लबरेज़ हैं घटाएँ हवाएँ भी सर्द हैं मौसम है ख़ुशगवार ज़रा सा तो इश्क़ कर — A R Sahil "Aleeg"
जिस ख़ाक से बने है उसी ख़ाक ही से इश्क़ हम सरफिरे हैं करते नहीं ज़िंदगी से इश्क़ कुछ भी नहीं सिवाए तबाही के इश्क़ में हम चाहते हैं हो न किसी को किसी से इश्क़ जिस ने तमाम शहर को बर्बाद कर दिया अब आप भी लड़ाने लगे हैं उसी से इश्क़ सच सच बताएँ आप को अल्लाह की क़सम करते हैं हम कि आप भला उस मुई से इश्क़ क़िस्सा ये देखना है कहाँ जा के हो तमाम ज़ख़्मों को मेरे होने लगा है छुरी से इश्क़ उतना निखार आएगा फ़न्न-ए-सुख़न में दोस्त जितना करेंगे आप फ़न-ए-शाइरी से इश्क़ 'साहिल' वो शख़्स बुलहवस-ए-हुस्न है तो फिर उस को कहाँ से होगा बताओ किसी से इश्क़ — A R Sahil "Aleeg"
नाम-ए-मज़हब पे कटे सर नहीं देखे जाते अब सियासत के ये मंज़र नहीं देखे जाते हो पहुँचने का इरादा जो अगर मंज़िल पर दोस्त फिर राह के पत्थर नहीं देखे जाते इक तरफ़ शौक़ ए मसीहाई यहाँ है सब को इक तरफ़ इन से पयम्बर नहीं देखे जाते तुम तो आशिक़ हो तुम्हें ये तो पता ही होगा दिल में उतरे हुए नश्तर नहीं देखे जाते इक परी रूह ने छीनी है मेरी बीनाई मुझ से अब हुस्न के पैकर नहीं देखे जाते मेरे अश्कों को न तुम पोंछो तुम्हें मेरी क़सम जलते अंगारे यूँँ छू कर नहीं देखे जाते घर की हर एक ख़बर रखते तो हैं हम लेकिन हम किसी वक़्त कभी घर नहीं देखे जाते देखते हम भी हैं सौ ख़्वाब हर इक रोज़ मगर अपनी औक़ात से बढ़ कर नहीं देखे जाते बात जब आन की आ जाए तो फिर ऐ साहिल ख़ाक होते हुए गौहर नहीं देखे जाते — A R Sahil "Aleeg"
बताऊँ क्या मैं जो पूछा है तुम ने क्या है इश्क़ न हो सकी जो मुकम्मल वो इल्तिज़ा है इश्क़ वो जानते हैं इसे जिन का हमनवा है इश्क़ हैं इब्तिदा भी ख़ुद ही ख़ुद ही इंतिहा है इश्क़ यक़ीन तुम को नहीं है तो ग़ौर से सुनिए धड़कते दिल से निकलती हुई सदा है इश्क़ तुम्हारे शहर के लोगों को और काम नहीं हर एक शख़्स यहाँ बस तलाशता है इश्क़ बिछड़ते वक़्त कभी भी नहीं कहूँगा मैं कोई तो आओ बचाओ कि डूबता है इश्क़ अभी अभी तो गँवाई है उस ने बीनाई अभी तो उस के लिए बस हरा-भरा है इश्क़ उसे ये बात मैं समझाऊँ तो भला कैसे नया नया है वो आशिक़ नया नया है इश्क़ हमारे दौर के लड़कों का हाल है ऐसा जिसे भी पूछिए कहता है बे-वफ़ा है इश्क़ जो सारी बज़्म को इतना उदास छोड़ गया ये कौन बज़्म से साहिल तेरी उठा है इश्क़ — A R Sahil "Aleeg"
जब भी रखना रखना दिल से बाहर इश्क़ दिल में आग लगा देता है अक्सर इश्क़ तेरे बस जो दीवानों का काम नहीं काहे खोल के बैठा है तू दफ़्तर इश्क़ मेरे जैसा आशिक़ मिलना नामुमकिन चाहे आप लड़ा कर देखें सत्तर इश्क़ जो मर्ज़ी में आए हम को दें तनख़्वाह लेकिन हम को रख लें अपना नौकर इश्क़ उस को लोगों माल-ओ-ज़र से क्या लेना सर से पा तक जिस का हो बस ज़ेवर इश्क़ दिन तो भीड़ में कट जाता है लेकिन सुन तेरी यादों से करता हूँ शब भर इश्क़ कोई हो तो आए सच्चा इश्क़ करे ये ही मिसरा दोहराता है दर-दर इश्क़ मैं भी माहिर हो जाऊँगा इस फ़न में कान में मेरे फूँक रहा है मंतर इश्क़ सोच रहा हूँ जाने कैसी लड़की है उस को सब से हो जाता है अक्सर इश्क़ जिस को कोई काम न आए दुनिया में ऐसा शख़्स ही कर सकता है बेहतर इश्क़ मैं ने जो कहा पछताने से क्या होगा काहे सर में मार रहा है पत्थर इश्क़ ख़ुद-दारी है या है कोई मजबूरी तोड़ रहा है फुट-पाथों पर पत्थर इश्क़ उम्र गँवा कर हम ने ये जाना 'साहिल' और नहीं कुछ ज़ख़्मों का है बिस्तर इश्क़ — A R Sahil "Aleeg"

Nazm