जिस्म से है न हम को जाँ से इश्क़
अब तो है तेरे आस्ताँ से इश्क़
इश्क़ करना है तो ख़ुदा से कर
क्या ज़मीं और आसमाँ से इश्क़
नफ़रतें देख कर ये लगता है
उठ गया जैसे इस जहाँ से इश्क़
मेज़बानी से उन को क्या मतलब
वो जो करते हैं मेज़बाँ से इश्क़
इश्क़ की दास्ताँ लिखेंगे हम
आप करिएगा दास्ताँ से इश्क़
कोई सहरा यहाँ नहीं होता
अब्र करता जो तिश्नगाँ से इश्क़
सब्र इक शख़्स से कहाँ 'साहिल'
उन को करना है ता-जहाँ से इश्क़
— A R Sahil "Aleeg"















