न पूछो जान कैसा लगता है अब ''इश्क़
हमें आतिश का दरिया लगता है अब ''इश्क़
हक़ीक़त में तो इससे काँपती है रूह
किताबों में ही अच्छा लगता है अब ''इश्क़
जिधर देखो उधर अय्यारियाँ हैं बस
फ़रेबों का ही मेला लगता है अब ''इश्क़
हमारी जान ले कर ही ये मानेगा
फ़क़त ख़ूँ का ही प्यासा लगता है अब ''इश्क़
ज़माना और था जब 'इश्क़ भारी था
यहाँ नफ़रत से हल्का लगता है अब ''इश्क़
जहाँ भर को इसी पर तंज़ कसने हैं
सभी को सिर्फ़ रुस्वा लगता है अब ''इश्क़
जहाँ को जो भी लगता है लगे 'साहिल'
मुझे तो सिर्फ़ धोखा लगता है अब 'इश्क़
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