राधा से इश्क़ कर ले या बंसी से इश्क़ कर

तू चाहता है जिस को भी उस ही से इश्क़ कर

अज्दाद ने कहा था के करना नहीं दग़ा
बन जाए बे-वफ़ा तो भी उस ही से इश्क़ कर

कब तुझ से बे-वफ़ाई करे कुछ ख़बर नहीं
दरिया से इश्क़ कर न तू कश्ती से इश्क़ कर

दोनों जहाँ में काम तेरे आएगी यही
ये बात मेरी मान ले नेकी से इश्क़ कर

मुझ सा फ़क़ीर शाह के दर पर न जाएगा
करना है तुझ को शाह की जूती से इश्क़ कर

कोई यहाँ पे और नहीं काम आएगा
मक़्तल में आ गया है तो बरछी से इश्क़ कर

ख़ुश हूँ निकाल कर मैं तुझे दिल से बे-वफ़ा
दो चार क्या है सारी ही बस्ती से इश्क़ कर

सूरत नहीं है कोई रिहाई की जब तेरी
तू दिल लगा ले तौक़ से बेड़ी से इश्क़ कर

मिल जाए तुझ को क़ीमती अश'आर चार छह
ये सोच कर ख़याल की नद्दी से इश्क़ कर

अल्लाह फ़न ये देता है हर नौ निहाल को
माँ बाप थोड़े कहते हैं मिट्टी से इश्क़ कर

गर चाहता है मुझ को मेरे ऐब मत गिना
करना है इश्क़ तुझ को तो ख़ूबी से इश्क़ कर

साहिल पे कितनी मौजों ने आ कर कहा है ये
सब को तलब है तेरी किसी से भी इश्क़ कर

— A R Sahil "Aleeg"

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