नाम-ए-मज़हब पे कटे सर नहीं देखे जाते

अब सियासत के ये मंज़र नहीं देखे जाते

हो पहुँचने का इरादा जो अगर मंज़िल पर
दोस्त फिर राह के पत्थर नहीं देखे जाते

इक तरफ़ शौक़ ए मसीहाई यहाँ है सब को
इक तरफ़ इन से पयम्बर नहीं देखे जाते

तुम तो आशिक़ हो तुम्हें ये तो पता ही होगा
दिल में उतरे हुए नश्तर नहीं देखे जाते

इक परी रूह ने छीनी है मेरी बीनाई
मुझ से अब हुस्न के पैकर नहीं देखे जाते

मेरे अश्कों को न तुम पोंछो तुम्हें मेरी क़सम
जलते अंगारे यूँ छू कर नहीं देखे जाते

घर की हर एक ख़बर रखते तो हैं हम लेकिन
हम किसी वक़्त कभी घर नहीं देखे जाते

देखते हम भी हैं सौ ख़्वाब हर इक रोज़ मगर
अपनी औक़ात से बढ़ कर नहीं देखे जाते

बात जब आन की आ जाए तो फिर ऐ साहिल
ख़ाक होते हुए गौहर नहीं देखे जाते

— A R Sahil "Aleeg"

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