Sahir Ludhianvi

Sahir Ludhianvi

@sahir-ludhianvi

📍 Mumbai· India

Sahir Ludhianvi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Sahir Ludhianvi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

222

Content

91

Likes

2738

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm

Sher

बस अब तो दामन-ए-दिल छोड़ दो बेकार उम्मीदो बहुत दुख सह लिए मैं ने बहुत दिन जी लिया मैं ने — Sahir Ludhianvi
किस दर्जा दिल-शिकन थे मोहब्बत के हादसे हम ज़िंदगी में फिर कोई अरमाँ न कर सके — Sahir Ludhianvi
फ़क़ीर-ए-शहर के तन पर लिबास बाक़ी है अमीर-ए-शहर के अरमाँ अभी कहाँ निकले — Sahir Ludhianvi
रंग और नस्ल ज़ात और मज़हब जो भी है आदमी से कमतर है इस हक़ीक़त को तुम भी मेरी तरह मान जाओ तो कोई बात बने — Sahir Ludhianvi
सर्द झोंकों से भड़कते हैं बदन में शो'ले जान ले लेगी ये बरसात क़रीब आ जाओ — Sahir Ludhianvi
टैंक आगे बढ़ें कि पीछे हटें कोख धरती की बाँझ होती है — Sahir Ludhianvi
छू लेने दो नाज़ुक होंठों को, कुछ और नहीं हैं जाम हैं ये क़ुदरत ने जो हम को बख़्शा है, वो सब सेे हसीं ईनाम हैं ये — Sahir Ludhianvi
दूर रह कर न करो बात क़रीब आ जाओ याद रह जाएगी ये रात क़रीब आ जाओ — Sahir Ludhianvi
जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है जंग क्या मसअलों का हल देगी — Sahir Ludhianvi
तेरा मिलना ख़ुशी की बात सही तुझ से मिल कर उदास रहता हूँ — Sahir Ludhianvi
अभी न छेड़ मोहब्बत के गीत ऐ मुतरिब अभी हयात का माहौल ख़ुश-गवार नहीं — Sahir Ludhianvi
फिर खो न जाएँ हम कहीं दुनिया की भीड़ में मिलती है पास आने की मोहलत कभी कभी — Sahir Ludhianvi
लो आज हम ने तोड़ दिया रिश्ता-ए-उमीद लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम — Sahir Ludhianvi
मेरी तक़दीर में जलना है तो जल जाऊँगा तेरा वा'दा तो नहीं हूँ जो बदल जाऊँगा — Sahir Ludhianvi
तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा इंसान की औलाद है इंसान बनेगा — Sahir Ludhianvi
लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं रुह भी होती है उस में ये कहाँ सोचते हैं — Sahir Ludhianvi
महफ़िल में तेरी यूँँ ही रहे जश्न-ए-चरागाँ आँखों में ही ये रात गुज़र जाए तो अच्छा — Sahir Ludhianvi
ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है क्यूँँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम — Sahir Ludhianvi

Ghazal

हवस-नसीब नज़र को कहीं क़रार नहीं मैं मुंतज़िर हूँ मगर तेरा इंतिज़ार नहीं हमीं से रंग-ए-गुलिस्ताँ हमीं से रंग-ए-बहार हमीं को नज़्म-ए-गुलिस्ताँ पे इख़्तियार नहीं अभी न छेड़ मोहब्बत के गीत ऐ मुतरिब अभी हयात का माहौल ख़ुश-गवार नहीं तुम्हारे अहद-ए-वफ़ा को मैं अहद क्या समझूँ मुझे ख़ुद अपनी मोहब्बत पे ए'तिबार नहीं न जाने कितने गिले इस में मुज़्तरिब हैं नदीम वो एक दिल जो किसी का गिला-गुज़ार नहीं गुरेज़ का नहीं क़ाइल हयात से लेकिन जो सच कहूँ कि मुझे मौत नागवार नहीं ये किस मक़ाम पे पहुँचा दिया ज़माने ने कि अब हयात पे तेरा भी इख़्तियार नहीं — Sahir Ludhianvi

Nazm

"वो सुब्ह कभी तो आएगी" 1 वो सुब्ह कभी तो आएगी इन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगा जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर छलकेगा जब अंबर झूम के नाचेगा जब धरती नग़्में गाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी जिस सुब्ह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर कर जीते हैं जिस सुब्ह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं इन भूखी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इंसानों की क़ीमत कुछ भी नहीं इंसानों की इज़्ज़त जब झूटे सिक्कों में न तौली जाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को न बेचा जाएगा चाहत को न कुचला जाएगा ग़ैरत को न बेचा जाएगा अपने काले करतूतों पर जब ये दुनिया शरमाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूख के और बेकारी के टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारा-दारी के जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी मजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फाँकेगा मासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीक न माँगेगा हक़ माँगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी फ़ाक़ों की चिताओं पर जिस दिन इंसाँ न जलाए जाएँगे सीनों के दहकते दोज़ख़ में अरमाँ न जलाए जाएँगे ये नरक से भी गंदी दुनिया जब स्वर्ग बनाई जाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी 2 वो सुब्ह हमीं से आएगी जब धरती करवट बदलेगी जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगे जब पाप घरौंदे फूटेंगे जब ज़ुल्म के बंधन टूटेंगे उस सुब्ह को हम ही लाएँगे वो सुब्ह हमीं से आएगी वो सुब्ह हमीं से आएगी मनहूस समाजी ढाँचों में जब ज़ुल्म न पाले जाएँगे जब हाथ न काटे जाएँगे जब सर न उछाले जाएँगे जेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई जाएगी वो सुब्ह हमीं से आएगी संसार के सारे मेहनत-कश खेतों से मिलों से निकलेंगे बे-घर बे-दर बे-बस इंसाँ तारीक बिलों से निकलेंगे दुनिया अम्न और ख़ुश-हाली के फूलों से सजाई जाएगी वो सुब्ह हमीं से आएगी — Sahir Ludhianvi
रात सुनसान थी बोझल थीं फ़ज़ा की साँसें रूह पर छाए थे बे-नाम ग़मों के साए दिल को ये ज़िद थी कि तू आए तसल्ली देने मेरी कोशिश थी कि कम्बख़्त को नींद आ जाए देर तक आँखों में चुभती रही तारों की चमक देर तक ज़ेहन सुलगता रहा तन्हाई में अपने ठुकराए हुए दोस्त की पुर्सिश के लिए तो न आई मगर उस रात की पहनाई में यूँँ अचानक तिरी आवाज़ कहीं से आई जैसे पर्बत का जिगर चीर के झरना फूटे या ज़मीनों की मोहब्बत में तड़प कर नागाह आसमानों से कोई शोख़ सितारा टूटे शहद सा घुल गया तल्ख़ाबा-ए-तन्हाई में रंग सा फैल गया दिल के सियह-ख़ाने में देर तक यूँँ तिरी मस्ताना सदाएँ गूँजीं जिस तरह फूल चटकने लगें वीराने में तू बहुत दूर किसी अंजुमन-ए-नाज़ में थी फिर भी महसूस किया मैं ने कि तू आई है और नग़्मों में छुपा कर मिरे खोए हुए ख़्वाब मेरी रूठी हुई नींदों को मना लाई है रात की सतह पर उभरे तिरे चेहरे के नुक़ूश वही चुप-चाप सी आँखें वही सादा सी नज़र वही ढलका हुआ आँचल वही रफ़्तार का ख़म वही रह रह के लचकता हुआ नाज़ुक पैकर तू मिरे पास न थी फिर भी सहर होने तक तेरा हर साँस मिरे जिस्म को छू कर गुज़रा क़तरा क़तरा तिरे दीदार की शबनम टपकी लम्हा लम्हा तिरी ख़ुश्बू से मोअत्तर गुज़रा अब यही है तुझे मंज़ूर तो ऐ जान-ए-क़रार मैं तिरी राह न देखूँगा सियह रातों में ढूँढ़ लेंगी मिरी तरसी हुई नज़रें तुझ को नग़्मा ओ शे'र की उमडी हुई बरसातों में अब तिरा प्यार सताएगा तो मेरी हस्ती तिरी मस्ती भरी आवाज़ में ढल जाएगी और ये रूह जो तेरे लिए बेचैन सी है गीत बन कर तिरे होंटों पे मचल जाएगी तेरे नग़्मात तिरे हुस्न की ठंडक ले कर मेरे तपते हुए माहौल में आ जाएँगे चंद घड़ियों के लिए हूँ कि हमेशा के लिए मिरी जागी हुई रातों को सुला जाएँगे — Sahir Ludhianvi
मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी मुझ को रातों की सियाही के सिवा कुछ न मिला मैं वो नग़्मा हूँ जिसे प्यार की महफ़िल न मिली वो मुसाफ़िर हूँ जिसे कोई भी मंज़िल न मिली ज़ख़्म पाए हैं बहारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी किसी गेसू किसी आंचल का सहारा भी नहीं रास्ते में कोई धुंदला सा सितारा भी नहीं मेरी नज़रों ने नज़ारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी दिल में नाकाम उमीदों के बसेरे पाए रौशनी लेने को निकला तो अंधेरे पाए रंग और नूर के धारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी मेरी राहों से जुदा हो गईं राहें उन की आज बदली नज़र आती हैं निगाहें उन की जिन से इस दिल ने सहारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी प्यार माँगा तो सिसकते हुए अरमान मिले चैन चाहा तो उमडते हुए तूफ़ान मिले डूबते दिल ने किनारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी — Sahir Ludhianvi
ये कूचे, ये नीलामघर दिलकशी के ये लुटते हुए कारवां ज़िन्दगी के कहाँ हैं, कहाँ है, मुहाफ़िज़ ख़ुदी के जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं ये पुरपेच गलियाँ, ये बदनाम बाज़ार ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झन्कार ये इस्मत के सौदे, ये सौदों पे तकरार जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं ये सदियों से बेख्वाब, सहमी सी गलियाँ ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियाँ ये बिकती हुई खोखली रंग-रलियां जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं वो उजले दरीचों में पायल की छन-छन थकी-हारी साँसों पे तबले की धन-धन ये बेरूह कमरों में खांसी की ठन-ठन जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख फ़िकरे ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं यहाँ पीर भी आ चुके हैं, जवां भी तनोमंद बेटे भी, अब्बा, मियाँ भी ये बीवी भी है और बहन भी है, मां भी जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी यशोदा की हमजिंस, राधा की बेटी पयम्बर की उम्मत, ज़ुलयखां की बेटी जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं ज़रा मुल्क के रहबरों को बुलाओ ये कुचे, ये गलियाँ, ये मंज़र दिखाओ जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उन को लाओ जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं — Sahir Ludhianvi
लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं रूह भी होती है उस में ये कहाँ सोचते हैं रूह क्या होती है इस से उन्हें मतलब ही नहीं वो तो बस तन के तक़ाज़ों का कहा मानते हैं रूह मर जाते हैं तो ये जिस्म है चलती हुई लाश इस हक़ीक़त को न समझते हैं न पहचानते हैं कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है कितनी सदियों से है क़ाएम ये गुनाहों का रिवाज लोग औरत की हर इक चीख़ को नग़्मा समझे वो क़बीलों का ज़माना हो कि शहरों का रिवाज जब्र से नस्ल बढ़े ज़ुल्म से तन मेल करें ये अमल हम में है बे-इल्म परिंदों में नहीं हम जो इंसानों की तहज़ीब लिए फिरते हैं हम सा वहशी कोई जंगल के दरिंदों में नहीं इक बुझी रूह लुटे जिस्म के ढांचे में लिए सोचती हूँ मैं कहाँ जा के मुक़द्दर फोड़ूं मैं न ज़िंदा हूँ कि मरने का सहारा ढूंढ़ूं और न मुर्दा हूँ कि जीने के ग़मों से छूटूं कौन बतलाएगा मुझ को किसे जा कर पूछूँ ज़िंदगी क़हर के सांचों में ढलेगी कब तक कब तलक आँख न खोलेगा ज़माने का ज़मीर ज़ुल्म और जब्र की ये रीत चलेगी कब तक औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दिया तुलती है कहीं दीनारों में बिकती है कहीं बाज़ारों में नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों में ये वो बे-इज़्ज़त चीज़ है जो बट जाती है इज़्ज़त-दारों में औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया मर्दों के लिए हर ज़ुल्म रवा औरत के लिए रोना भी ख़ता मर्दों के लिए हर ऐश का हक़ औरत के लिए जीना भी सज़ा मर्दों के लिए लाखों सेजें, औरत के लिए बस एक चिता औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया जिन सीनों ने इन को दूध दिया उन सीनों को बेवपार किया जिस कोख में इन का जिस्म ढला उस कोख का कारोबार किया जिस तन से उगे कोंपल बन कर उस तन को ज़लील-ओ-ख़्वार किया संसार की हर इक बे-शर्मी ग़ुर्बत की गोद में पलती है चकलों ही में आ कर रुकती है फ़ाक़ों से जो राह निकलती है मर्दों की हवस है जो अक्सर औरत के पाप में ढलती है औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया औरत संसार की क़िस्मत है फिर भी तक़दीर की हेटी है अवतार पयम्बर जनती है फिर भी शैतान की बेटी है ये वो बद-क़िस्मत मां है जो बेटों की सेज पे लेटी है औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया — Sahir Ludhianvi
ताज तेरे लिए इक मज़हर-ए-उल्फ़त ही सही तुझ को इस वादी-ए-रंगीं से अक़ीदत ही सही मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से बज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मअ'नी सब्त जिस राह में हों सतवत-ए-शाही के निशाँ उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मअ'नी मेरी महबूब पस-ए-पर्दा-ए-तश्हीर-ए-वफ़ा तू ने सतवत के निशानों को तो देखा होता मुर्दा-शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली अपने तारीक मकानों को तो देखा होता अन-गिनत लोगों ने दुनिया में मोहब्बत की है कौन कहता है कि सादिक़ न थे जज़्बे उन के लेकिन उन के लिए तश्हीर का सामान नहीं क्यूँँकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़्लिस थे ये इमारात ओ मक़ाबिर ये फ़सीलें ये हिसार मुतलक़-उल-हुक्म शहंशाहों की अज़्मत के सुतूँ सीना-ए-दहर के नासूर हैं कोहना नासूर जज़्ब है उन में तिरे और मिरे अज्दाद का ख़ूँ मेरी महबूब उन्हें भी तो मोहब्बत होगी जिन की सन्नाई ने बख़्शी है उसे शक्ल-ए-जमील उन के प्यारों के मक़ाबिर रहे बेनाम-ओ-नुमूद आज तक उन पे जलाई न किसी ने क़िंदील ये चमन-ज़ार ये जमुना का किनारा ये महल ये मुनक़्क़श दर ओ दीवार ये मेहराब ये ताक़ इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़ मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से — Sahir Ludhianvi
साथियो! मैं ने बरसों तुम्हारे लिए चाँद तारों बहारों के सपने बुने हुस्न और इश्क़ के गीत गाता रहा आरज़ूओं के ऐवाँ सजाता रहा मैं तुम्हारा मुग़न्नी तुम्हारे लिए जब भी आया नए गीत लाता रहा आज लेकिन मिरे दामन-ए-चाक में गर्द-ए-राह-ए-सफ़र के सिवा कुछ नहीं मेरे बरबत के सीने में नग़्मों का दम घुट गया तानें चीख़ों के अम्बार में दब गई हैं और गीतों के सुर हिचकियाँ बन गए हैं मैं तुम्हारा मुग़न्नी हूँ नग़्मा नहीं हूँ और नग़्में की तख़्लीक़ का साज़-ओ-सामाँ साथियो! आज तुम ने भस्म कर दिया है और मैं अपना टूटा हुआ साज़ था में सर्द लाशों के अम्बार को तक रहा हूँ मेरे चारों तरफ़ मौत की वहशतें नाचती हैं और इंसाँ की हैवानियत जाग उठी है बरबरियत के ख़ूँ-ख़ार इफ़रीत अपने नापाक जबड़ों को खोले ख़ून पी पी के ग़ुर्रा रहे हैं बच्चे माँओं की गोदों में सह में हुए हैं इस्मतें सर-बरहना परेशान हैं हर तरफ़ शोर-ए-आह-ओ-बुका है और मैं इस तबाही के तूफ़ान में आग और ख़ूँ के हैजान में सर-निगूँ और शिकस्ता मकानों के मलबे से पुर रास्तों पर अपने नग़्मों की झोली पसारे दर-ब-दर फिर रहा हूँ मुझ को अम्न और तहज़ीब की भीक दो मेरे गीतों की लय मेरा सुर मेरी नय मेरे मजरूह होंटों को फिर सौंप दो साथियो! मैं ने बरसों तुम्हारे लिए इंक़लाब और बग़ावत के नग़्में अलापे अजनबी राज के ज़ुल्म की छाँव में सरफ़रोशी के ख़्वाबीदा जज़्बे उभारे और उस सुब्ह की राह देखी जिस में इस मुल्क की रूह आज़ाद हो आज ज़ंजीर-ए-महकूमियत कट चुकी है और इस मुल्क के बहर-ओ-बर बाम-ओ-दर अजनबी क़ौम के ज़ुल्मत-अफ़्शाँ फरेरे की मनहूस छाँव से आज़ाद हैं खेत सोना उगलने को बेचैन हैं वादियाँ लहलहाने को बेताब हैं कोहसारों के सीने में हैजान है संग और ख़िश्त बे-ख़्वाब व बेदार हैं उन की आँखों में तामीर के ख़्वाब हैं उन के ख़्वाबों को तकमील का रूप दो मुल्क की वादियाँ घाटियाँ खेतियाँ औरतें बच्चियां हाथ फैलाए ख़ैरात की मुंतज़िर हैं इन को अम्न और तहज़ीब की भीक दो माँओं को उन के होंटों की शादाबियाँ नन्हे बच्चों को उन की ख़ुशी बख़्श दो मुल्क की रूह को ज़िंदगी बख़्श दो मुझ को मेरा हुनर मेरी लय बख़्श दो आज सारी फ़ज़ा है भिकारी और मैं इस भिकारी फ़ज़ा में अपने नग़्मों की झोली पसारे दर-ब-दर फिर रहा हूँ मुझ को फिर मेरा खोया हुआ साज़ दो मैं तुम्हारा मुग़न्नी तुम्हारे लिए जब भी आया नए गीत लाता रहूँगा — Sahir Ludhianvi
ख़ून अपना हो या पराया हो नस्ल-ए-आदम का ख़ून है आख़िर जंग मशरिक़ में हो कि मग़रिब में अम्न-ए-आलम का ख़ून है आख़िर बम घरों पर गिरें कि सरहद पर रूह-ए-तामीर ज़ख़्म खाती है खेत अपने जलें कि औरों के ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है टैंक आगे बढ़ें कि पिछे हटें कोख धरती की बाँझ होती है फ़त्ह का जश्न हो कि हार का सोग ज़िंदगी मय्यतों पे रोती है जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है जंग क्या मसअलों का हल देगी आग और ख़ून आज बख़्शेगी भूक और एहतियाज कल देगी इस लिए ऐ शरीफ़ इंसानो जंग टलती रहे तो बेहतर है आप और हम सभी के आँगन में शमाजलती रहे तो बेहतर है बरतरी के सुबूत की ख़ातिर ख़ूँ बहाना ही क्या ज़रूरी है घर की तारीकियाँ मिटाने को घर जलाना ही क्या ज़रूरी है जंग के और भी तो मैदाँ हैं सिर्फ़ मैदान-ए-किश्त-ओ-ख़ूँ ही नहीं हासिल-ए-ज़िंदगी ख़िरद भी है हासिल-ए-ज़िंदगी जुनूँ ही नहीं आओ इस तीरा-बख़्त दुनिया में फ़िक्र की रौशनी को आम करें अम्न को जिन से तक़्वियत पहुँचे ऐसी जंगों का एहतिमाम करें जंग वहशत से बरबरिय्यत से अम्न तहज़ीब ओ इर्तिक़ा के लिए जंग मर्ग-आफ़रीं सियासत से अम्न इंसान की बक़ा के लिए जंग इफ़्लास और ग़ुलामी से अम्न बेहतर निज़ाम की ख़ातिर जंग भटकी हुई क़यादत से अम्न बे-बस अवाम की ख़ातिर जंग सरमाए के तसल्लुत से अम्न जम्हूर की ख़ुशी के लिए जंग जंगों के फ़लसफ़े के ख़िलाफ़ अम्न पुर-अम्न ज़िंदगी के लिए — Sahir Ludhianvi
आओ कि आज ग़ौर करें इस सवाल पर देखे थे हम ने जो वो हसीं ख़्वाब क्या हुए दौलत बढ़ी तो मुल्क में अफ़्लास क्यूँँ बढ़ा ख़ुश-हाली-ए-अवाम के अस्बाब क्या हुए जो अपने साथ साथ चले कू-ए-दार तक वो दोस्त वो रफ़ीक़ वो अहबाब क्या हुए क्या मोल लग रहा है शहीदों के ख़ून का मरते थे जिन पे हम वो सज़ा-याब क्या हुए बे-कस बरहनगी को कफ़न तक नहीं नसीब वो व'अदा-हा-ए-अतलस-ओ-किम-ख़्वाब क्या हुए जम्हूरियत-नवाज़ बशर-दोस्त अम्न-ख़्वाह ख़ुद को जो ख़ुद दिए थे वो अलक़ाब क्या हुए मज़हब का रोग आज भी क्यूँँ ला-इलाज है वो नुस्ख़ा-हा-ए-नादिर-ओ-नायाब क्या हुए हर कूचा शोला-ज़ार है हर शहर क़त्ल-गाह यक-जहती-ए-हयात के आदाब क्या हुए सहरा-ए-तीरगी में भटकती है ज़िंदगी उभरे थे जो उफ़ुक़ पे वो महताब क्या हुए मुजरिम हूँ मैं अगर तो गुनहगार तुम भी हो ऐ रहबरना-ए-क़ौम ख़ता-कार तुम भी हो — Sahir Ludhianvi
हिरास तेरे होंटों पे तबस्सुम की वो हल्की सी लकीर मेरे तख़्य्युल में रह रह के झलक उठती है यूँ अचानक तिरे आरिज़ का ख़याल आता है जैसे ज़ुल्मत में कोई शमां भड़क उठती है तेरे पैराहन-ए-रंगीं की जुनूं-ख़ेज़ महक ख़्वाब बन बन के मिरे ज़ेहन में लहराती है रात की सर्द ख़मोशी में हर इक झोंके से तेरे अन्फ़ास तिरे जिस्म की आँच आती है मैं सुलगते हुए राज़ों को अयां तो कर दूँ लेकिन उन राज़ों की तशहीर से जी डरता है रात के ख़्वाब उजाले में बयाँ तो कर दूँ उन हसीं ख़्वाबों की ता'बीर से जी डरता है तेरी साँसों की थकन तेरी निगाहों का सुकूत दर-हक़ीक़त कोई रंगीन शरारत ही न हो मैं जिसे प्यार का अंदाज़ समझ बैठा हूँ वो तबस्सुम वो तकल्लुम तिरी आदत ही न हो सोचता हूँ कि तुझे मिल के मैं जिस सोच में हूँ पहले उस सोच का मक़्सूम समझ लूँ तो कहूँ मैं तिरे शहर में अंजान हूँ परदेसी हूँ तेरे अल्ताफ़ का मफ़्हूम समझ लूँ तो कहूँ कहीं ऐसा न हो पाँव मिरे थर्रा जाएँ और तिरी मरमरीं बाँहों का सहारा न मिले अश्क बहते रहें ख़ामोश सियह रातों में और तिरे रेशमी आंचल का किनारा न मिले — Sahir Ludhianvi
मेरे ख़्वाबों के झरोकों को सजाने वाली तेरे ख़्वाबों में कहीं मेरा गुज़र है कि नहीं पूछ कर अपनी निगाहों से बता दे मुझ को मेरी रातों के मुक़द्दर में सहर है कि नहीं चार दिन की ये रिफ़ाक़त जो रिफ़ाक़त भी नहीं उम्र भर के लिए आज़ार हुई जाती है ज़िंदगी यूँ तो हमेशा से परेशान सी थी अब तो हर साँस गिरां-बार हुई जाती है मेरी उजड़ी हुई नींदों के शबिस्तानों में तू किसी ख़्वाब के पैकर की तरह आई है कभी अपनी सी कभी ग़ैर नज़र आई है कभी इख़्लास की मूरत कभी हरजाई है प्यार पर बस तो नहीं है मिरा लेकिन फिर भी तू बता दे कि तुझे प्यार करूँं या न करूँं तू ने ख़ुद अपने तबस्सुम से जगाया है जिन्हें उन तमन्नाओं का इज़हार करूँं या न करूँं तू किसी और के दामन की कली है लेकिन मेरी रातें तिरी ख़ुश्बू से बसी रहती हैं तू कहीं भी हो तिरे फूल से आरिज़ की क़सम तेरी पलकें मिरी आँखों पे झुकी रहती हैं तेरे हाथों की हरारत तिरे साँसों की महक तैरती रहती है एहसास की पहनाई में ढूंढ़ती रहती हैं तख़्ईल की बांहें तुझ को सर्द रातों की सुलगती हुई तन्हाई में तेरा अल्ताफ़-ओ- करम एक हक़ीक़त है मगर ये हक़ीक़त भी हक़ीक़त में फ़साना ही न हो तेरी मानूस निगाहों का ये मोहतात पयाम दिल के ख़ूँ करने का एक और बहाना ही न हो कौन जाने मिरे इमरोज़ का फ़र्दा क्या है क़ुर्बतें बढ़ के पशेमान भी हो जाती हैं दिल के दामन से लिपटती हुई रंगीं नज़रें देखते देखते अंजान भी हो जाती हैं मेरी दरमांदा जवानी की तमन्नाओं के मुज़्महिल ख़्वाब की ता'बीर बता दे मुझ को मेरा हासिल मेरी तक़दीर बता दे मुझ को — Sahir Ludhianvi
मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है — Sahir Ludhianvi