Abdulla Asif

Abdulla Asif

@asifabdullaasif11

Abdulla asif Asif shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Abdulla asif Asif's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

18

Content

87

Likes

743

Shayari
Audios
  • Sher(68)
  • Ghazal(18)
  • Nazm(1)

Sher

ज़हर ने उस को ज़िंदगी दे दी वरना सुकरात मर गया होता — Abdulla Asif
सम्त-ए-पंजुम में तू छुपा है कहीं शौक़-ए-दीदार से भरे हम लोग — Abdulla Asif
मेरे ख़ुदा ने कहा था मुझ सेे हरीफ़-ए-जाँ से भी इश्क़ करना सो बात मानी ख़ुदा की मैं ने ख़ुद अपना दीवाना बन गया हूँ — Abdulla Asif
मेरे पैरों में चुभ रहा था कुछ मैं ने दुनिया निकाल फेंकी है — Abdulla Asif
घरों से दूर रहने में बस इतनी ही मुसीबत है किसी की याद आएगी किसी को याद आओगे — Abdulla Asif
जन्नत से तो वैसे भी तअल्लुक़ नहीं कोई अल्लाह जहन्नम को मेरे शर से बचाए — Abdulla Asif
इक मसीहा जन्म लेने जा रहा है मरयमों के हाथ काटे जा रहे हैं — Abdulla Asif
उन से दोज़ख़ में पूछ बैठा हूँ शैख़ जी आप और यहाँ कैसे — Abdulla Asif
दरिया के इस तरफ़ से रवाना किया उसे दरिया के उस तरफ़ उसे लेने पहुँच गए — Abdulla Asif
उदास रहने की मिलने लगी हमें उजरत अमीर लोगों में हम भी शुमार होने लगे — Abdulla Asif
फ़िरदौस मसअला है नहीं तो ये आदमी वो पाप करते जिन का तसव्वुर हराम है — Abdulla Asif
ये ऐसा शे'र है जिस को बहुत ही कम सुनाता हूँ यही वो शे'र है हाँ हाँ यही है हो गया है शे'र — Abdulla Asif

Ghazal

दिल के दरबार में आता हूँ क़सीदे ले कर लौट जाता हूँ उमीदों के लिफ़ाफ़े ले कर टॉफ़ियाँ बेच रहे हैं यहाँ नन्हें बच्चे और मैं बाज़ार में आया हूँ खिलौने ले कर उस की सूरत से शिफ़ा पाते हैं बीमार-ए-शहर घर को जाते हैं तबीब अपने ख़सारे ले कर तज़्किरा अपनी वफ़ाओं का बहुत करती हो मर न जाऊँ कहीं एहसान तुम्हारे ले कर क़त्ल करने से भी बदला मेरा पूरा न हुआ फिर से मक़्तल न चला जाऊँ जनाज़े ले कर इक समुंदर ने किनारों की शिकायत न सुनी तश्ना-लब उतरे हैं पानी में सफ़ीने ले कर बात जब आ ही गई है तो कहे देते हैं आप तो जीते हैं एहसान हमारे ले कर — Abdulla Asif
ऐ हम सफ़र बता यहाँ क्या क्या फ़रेब है मंज़िल फ़रेब है या ये रस्ता फ़रेब है है बंदगी से मेरा शग़फ़ ख़ुल्द में मक़ाम या'नी मेरी जबीन का झुकना फ़रेब है मैं एक सा कहीं नहीं या'नी कहीं नहीं ये आइना फ़रेब है साया फ़रेब है अब तीन साल बा'द के रिश्ते को तोड़कर जाते हुए तेरा मुझे तकना फ़रेब है ख़ामोश है तू फिर भी है साबित तेरा वुजूद चिल्लाऊँ फिर भी तो मेरा होना फ़रेब है इस शहर की शराब का प्याला चखे बग़ैर उस शहर की शराब को पीना फ़रेब है सूरत ही देख कर कभी सीरत न जानिए सहरा के बीचोंबीच में दरिया फ़रेब है शबनम ग़िज़ा चुराती है तितली की फूल से गुलशन पे बाग़बाँ तेरा पहरा फ़रेब है कूज़ा-गरी की ख़ैर मगर टूटने के बा'द फिर किरचियों का चाक पे आना फ़रेब है धोखे से मुझ को धोखा दिया जाने लग गया धोखे से जो हुआ मुझे धोखा फ़रेब है ऊँचे शजर के नीचे समर टूटने की आस इस आस का ज़मीन पे गिरना फ़रेब है मुझ को उदास देख के कहता है ख़ुश-मिज़ाज तेरा ख़ुशी पे शे'र ही कहना फ़रेब है सादिक़ लिखा गया है तेरे हर फ़रेब को सादिक फ़रेब को तेरे लिखना फ़रेब है साक़ी तू जिस अदा से मुझे दे रहा है मय पीना हलाल है मेरी तौबा फ़रेब है सच सुन न पाऊँगा कि भरम टूट जाएगा मेरे लिए हक़ीक़तें सुनना फ़रेब है सच भीड़ में है फिर भी है दहशत-ज़दा मगर बे-ख़ौफ़ उस के सामने तन्हा फ़रेब है — Abdulla Asif
चाहते हैं मगर नहीं हँसते लोग जो ख़ास-कर नहीं हँसते मैं जहाँ हूँ वहाँ नहीं होता मुझ पे उस दिन अगर नहीं हँसते बेमुरव्वत हैं किस कदर ये लोग मेरी नाकामी पर नहीं हँसते ज़िन्दगी फिर गुज़ारनी है कल सोच कर रात भर नहीं हँसते उन के मुँह से वफ़ा की बातें सुन ख़ुद पे हँसते अगर नहीं हँसते एक लकड़ी से ही बना आरा तब से सारे शजर नहीं हँसते इक तुम्हारे उदास होने से अब नगर के नगर नहीं हँसते गर पता होता हासिल-ए-मंज़िल फिर तो हम रस्ते भर नहीं हँसते गर्दिश-ए-वक़्त टूट जाता है आप जब वक़्त पर नहीं हँसते जानते हो तुम उस को वो हाँ बख़्त तो मियाँ बख़्त पर नहीं हँसते बात इंसान की तू करता है पीछे रह कर सिफ़र नहीं हँसते — Abdulla Asif
जैसा भी सोचता है तू वैसा नहीं हूँ मैं जैसा तू चाहता है बस ऐसा नहीं हूँ मैं हर कोई तोड़ने में ही मुझ को लगा है सिर्फ़ समझाए इनको कोई कि रिश्ता नहीं हूँ मैं कब से हूँ मुंतज़िर वो मेरा हाल पूछ लें और मुस्कुराके मैं कहूँ अच्छा नहीं हूँ मैं आँधी को चाहिए कि वो मेरा करे अदब खिड़की के पास रहता हूँ बुझता नहीं हूँ मैं मेरी कमी नहीं जो मैं रौशन नहीं हुआ ऐसी हथेलियों पे ही खिलता नहीं हूँ मैं या तो पिया गया या गिराया गया मुझे बोतल में जो बचा है वो हिस्सा नहीं हूँ मैं दरिया को पार मैं करूँँ रस्ता निकालकर नावें मुझे भी चाहिए मूसा नहीं हूँ मैं तेरे बदन की जुस्तुजू कल थी न आज है या'नी कि तुझ सेे प्यार ही करता नहीं हूँ मैं इक बार खो दिया मुझे फिर खो दिया मुझे ख़ुद को भी बार बार मैं मिलता नहीं हूँ मैं कितनी दफ़ा हुए हैं ये दुश्मन पे बे-असर अब तीर दोस्ती के चलाता नहीं हूँ मैं — Abdulla Asif
होते हैं जिन के कान वो दीवार हम नहीं ये भी नहीं कि साहिब-ए-असरार हम नहीं माना हिमायती नहीं फ़स्ल-ए-बहार के फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ के भी तो तरफ़दार हम नहीं होते नहीं हैं इश्क़ में दानिशवरी से काम मौला तेरे करम से समझदार हम नहीं फ़िरदौस माँग लें वो भी सजदों के मोल में ज़ाहिद नहीं पर इतने ख़ताकार हम नहीं कौसर को जाम जाम को कौसर बता दिया ख़ुद सोचते हैं सोच गिरफ़्तार हम नहीं अपने जनाज़े में भी न कंधा लगाएँगे ना-हक़ सही पर इतने गुनहगार हम नहीं ख़ुद राम जी के शहर को मिस्मार कर के आप कहते हो रावणों के तरफ़दार हम नहीं उस ने भी कह दिया नहीं इस बार भी नहीं हम ने भी कह दिया नहीं हर बार हम नहीं — Abdulla Asif
निगहबानी में जन्नत की वही फ़ौज-ए-बहत्तर है यज़ीदों ख़्वाब कौसर के न देखो तो ही बेहतर है फ़रिश्ते आसमानों से ज़मीं पर तो उतर आए मेरी सोहबत न रास आ जाए बस इस बात का डर है परस्तिश राह चलते देवताओं की नहीं करता तकब्बुर तुम इसे समझो न मेरा तो ही बेहतर है कहा जबसे कि करता हूँ यहाँ शीशा-गरी का काम कोई कंकड़ उठा लाया किसी के पास पत्थर है अभी इतनी सहूलत है यहाँ सब बे-गुनाहों को कि ख़ुद चुन सकते हैं वो कौन सी ज़ंजीर बेहतर है मेरे क़दमों में गिरते हैं तजल्ली के सभी तालिब किसी मेहताब को लगता है वो मुझ सेे भी बढ़कर है इलाही हो कभी मुझ पर इनायत तूर जैसी अब या बस तेरे चहेतों में फ़क़त तेरा पयम्बर है मैं अपने जिस्म-ए-ख़स्ता की मरम्मत कर तो लूँ लेकिन बड़े मग़रूर मरहम हैं बड़ा खु़द्दार पैकर है उधर तन्हा खड़ा है झूठ लेकिन फिर भी है बे-ख़ौफ़ इधर सच भीड़ में हैं और उसे पस्पाई का डर है सहारों को हमारी दस्तरस से दूर रहने दो बदल सकती नहीं क़िस्मत मुसीबत ही मुक़द्दर है बचाकर जिस को लाए थे लगाकर जान की बाज़ी हमारी पुश्त में पैवस्त उसी इंसाँ का ख़ंजर है उतारा है ग़ज़ल में जबसे अपने दिल के ज़ख़्मों को लबों पर सारे इंसानों के बस लफ़्ज़-ए-मुक़र्रर है वसीयत याद रक्खो जाबिर-ओ-जब्बार माँओं की वगरना कोई आएगा कहेगा नाम हैदर है अजब तरतीब से इस बार घूमा वक़्त का पहिया जो कल इस घर का मालिक था वो आज इस घर का नौकर है कभी मैं इस्तरी करता नहीं हूँ आस्तीं अपनी मुझे मालूम है 'आसिफ़' मेरे यारों का ये घर है किसे रोकें अब 'आसिफ़' हम किसे पहलू से जाने दें उदासी जावेदानी है मसर्रत कम मुयस्सर है — Abdulla Asif
फ़िराक़-ए-यार के मारे नहीं हैं हम आसिफ़ विसाल-ए-यार से घुटता है अपना दम आसिफ़ हरीफ़-ए-जाँ से मरासिम तो बाहमी हैं मगर अज़ीज़-ए-जाँ से तअल्लुक़ नहीं बहम आसिफ़ तबीब कोशिश-ए-दरमाँ में मर गए सारे मगर दिलों की जराहत हुई न कम आसिफ़ कोई है महव-ए-फ़ुग़ाँ तो कोई है नालागर यहाँ पे किस को सुनाएँ हम अपना ग़म आसिफ़ लिहाज़ कीजिए उन का लिहाज़ लाज़िम है ज़माने पर ये समझिए कि हैं करम आसिफ़ हसीं बदन की रसाई से तंग लोगों में फ़िराक़-ए-यार का था में हुए अलम आसिफ़ जबीं झुका के सर-ए-जाम बादा-ख़्वारों ने बना के छोड़ा है मयखा़ने को हरम आसिफ़ सितमगरों की ये बस्ती नमक चुरा लेगी किसी के आगे मत आना ब-चश्म-ए-नम आसिफ़ हवा-ए-तुंद से कह दो की लौट जाए अब खड़े हुए हैं चराग़ों के साथ हम आसिफ़ पयम्बरों से कोई उन की लाठियाँ छीने रखे हुए हैं मेरे दिल में कुछ सनम आसिफ़ शब-ए-फ़िराक़ को दीं गालियाँ बहुत उस ने सुना रही है मुझे शाम अपना ग़म आसिफ़ ग़रीबी ऐसी कि बस वक़्त मेरी जेब में है मैं फिर भी तुझ पे लुटाऊँगा ये रक़म आसिफ़ मसर्ररतों की है महफ़िल ब-जुज़ लिहाज़ नहीं उदासियों का हैं था में हुए अलम आसिफ़ — Abdulla Asif
ज़ुल्म के दश्त में बरसात के आसार हैं हम फ़ौज-ए-कूफ़ा की रविश को रह-ए-पुर-ख़ार हैं हम तुम ज़बाँ काटो हमारी या सर-ए-दार करो ज़िक्र-ए-हैदर के लिए आक़िब-ए-तम्मार हैं हम हक़-बयानी से ये सूली हमें क्या रोकेगी कहीं ईसा तो कहीं मीसम-ए-तम्मार हैं हम या अली ख़ुल्द नहीं माँगते ज़ारी के इवज़ क़ब्र में आप के बस तालिब-ए-दीदार हैं हम ख़ालिक-ए-कुल तेरे मूसा से तक़ल्लुम की क़सम शाह-ए-फ़िरदौस के ही घर के वफ़ादार हैं हम मसनद-ए-अद्ल पे बैठा हुआ है शाह-ए-शाम और ख़ुदा इश्क़-ए-हुसैनी में गिरफ़्तार हैं हम ढूँढ़िए आप रिवायत में यज़ीदों के वक़ार और कहिए कि फ़क़त साहिब-ए-किरदार हैं हम जंग करनी है तो ले आओ तुम अपना लशकर बात करनी है तो आओ सर-ए-दरबार हैं हम — Abdulla Asif
तेरी आँखों के होते हुए मय कशी मुझ सेे होती नहीं तुम रहो सामने बात फिर होश की मुझ सेे होती नहीं ज़िंदगी ख़ुद को तेरा तरफ़दार कब तक रखूॅं मैं यहाँ चार दिन हो गए अब तेरी पैरवी मुझ सेे होती नहीं तेरी यादों का ये मारका ज़ेहन से है मेरे और क्या हार जाऊँ भले जंग पर मुल्तवी मुझ सेे होती नहीं पास होता नहीं है तो मैं करता हूँ आरज़ू वस्ल की वो क़रीब आए तो ऐ ख़ुदा बात भी मुझ सेे होती नहीं जब भी जाए कोई छोड़कर जा-ब-जा मैं तड़पता फिरूँ बेकली हो मुबारक मुझे बेहिसी मुझ सेे होती नहीं है तवक़्क़ो तुम्हें नूर की तो मुझे छोड़ जाओ अभी तीरगी मेरी जाती नहीं रौशनी मुझ सेे होती नहीं शाह की हाँ में हामी भरो सच छुपाओ क़सीदे पढ़ो ख़ैर हो दार की झूठ की पैरवी मुझ सेे होती नहीं तुम ज़मीं पर नहीं आ सके और दुआ भी न पहुँची वहाँ आजिज़ी मेरी जाती नहीं बंदगी मुझ सेे होती नहीं शुक्र तेरा है ऐ बे-वफ़ा तू ने हम को दिया है सबक़ सो किसी हुस्न के बुत की अब बंदगी मुझ सेे होती नहीं — Abdulla Asif