तेरी आँखों के होते हुए मय कशी मुझ सेे होती नहीं
तुम रहो सामने बात फिर होश की मुझ से होती नहीं
ज़िंदगी ख़ुद को तेरा तरफ़दार कब तक रखूॅं मैं यहाँ
चार दिन हो गए अब तेरी पैरवी मुझ से होती नहीं
तेरी यादों का ये मारका ज़ेहन से है मेरे और क्या
हार जाऊँ भले जंग पर मुल्तवी मुझ से होती नहीं
पास होता नहीं है तो मैं करता हूँ आरज़ू वस्ल की
वो क़रीब आए तो ऐ ख़ुदा बात भी मुझ से होती नहीं
जब भी जाए कोई छोड़कर जा-ब-जा मैं तड़पता फिरूँ
बेकली हो मुबारक मुझे बेहिसी मुझ से होती नहीं
है तवक़्क़ो तुम्हें नूर की तो मुझे छोड़ जाओ अभी
तीरगी मेरी जाती नहीं रौशनी मुझ से होती नहीं
शाह की हाँ में हामी भरो सच छुपाओ क़सीदे पढ़ो
ख़ैर हो दार की झूठ की पैरवी मुझ से होती नहीं
तुम ज़मीं पर नहीं आ सके और दुआ भी न पहुँची वहाँ
आजिज़ी मेरी जाती नहीं बंदगी मुझ से होती नहीं
शुक्र तेरा है ऐ बे-वफ़ा तू ने हम को दिया है सबक़
सो किसी हुस्न के बुत की अब बंदगी मुझ से होती नहीं















