Adeem Hashmi

Adeem Hashmi

@adeem-hashmi

Adeem Hashmi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Adeem Hashmi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मिलना तो ख़ैर उस को नसीबों की बात है देखे हुए भी उस को ज़माना गुज़र गया — Adeem Hashmi
इक खिलौना टूट जाएगा नया मिल जाएगा मैं नहीं तो कोई तुझ को दूसरा मिल जाएगा — Adeem Hashmi
फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था — Adeem Hashmi
बिछड़ के तुझ सेे न देखा गया किसी का मिलाप उड़ा दिए हैं परिंदे शजर पे बैठे हुए — Adeem Hashmi
भूलती कब हैं भला पिछली रुतों की सोहबतें हंस बैठा ही रहा सूखे हुए तालाब पर — Adeem Hashmi

Ghazal

तेरे लिए चले थे हम तेरे लिए ठहर गए तू ने कहा तो जी उठे तू ने कहा तो मर गए कट ही गई जुदाई भी कब ये हुआ कि मर गए तेरे भी दिन गुज़र गए मेरे भी दिन गुज़र गए तू भी कुछ और और है हम भी कुछ और और हैं जाने वो तू किधर गया जाने वो हम किधर गए राहों में ही मिले थे हम राहें नसीब बन गईं वो भी न अपने घर गया हम भी न अपने घर गए वक़्त ही जुदाई का इतना तवील हो गया दिल में तिरे विसाल के जितने थे ज़ख़्म भर गए होता रहा मुक़ाबला पानी का और प्यास का सहरा उमड उमड पड़े दरिया बिफर बिफर गए वो भी ग़ुबार-ए-ख़्वाब था हम भी ग़ुबार-ए-ख़्वाब थे वो भी कहीं बिखर गया हम भी कहीं बिखर गए कोई कनार-ए-आबजू बैठा हुआ है सर-निगूँ कश्ती किधर चली गई जाने किधर भँवर गए आज भी इंतिज़ार का वक़्त हुनूत हो गया ऐसा लगा कि हश्र तक सारे ही पल ठहर गए बारिश-ए-वस्ल वो हुई सारा ग़ुबार धुल गया वो भी निखर निखर गया हम भी निखर निखर गए आब-ए-मुहीत-ए-इश्क़ का बहर अजीब बहर है तैरे तो ग़र्क़ हो गए डूबे तो पार कर गए इतने क़रीब हो गए अपने रक़ीब हो गए वो भी 'अदीम' डर गया हम भी 'अदीम' डर गए उस के सुलूक पर 'अदीम' अपनी हयात-ओ-मौत है वो जो मिला तो जी उठे वो न मिला तो मर गए — Adeem Hashmi
आँखों में आँसुओं को उभरने नहीं दिया मिट्टी में मोतियों को बिखरने नहीं दिया जिस राह पर पड़े थे तिरे पाँव के निशाँ इस राह से किसी को गुज़रने नहीं दिया चाहा तो चाहतों की हदों से गुज़र गए नश्शा मोहब्बतों का उतरने नहीं दिया हर बार है नया तिरे मिलने का ज़ाइक़ा ऐसा समर किसी भी शजर ने नहीं दिया ये हिज्र है तो इस का फ़क़त वस्ल है इलाज हम ने ये ज़ख़्म-ए-वक़्त को भरने नहीं दिया इतने बड़े जहान में जाएगा तू कहाँ इस इक ख़याल ने मुझे मरने नहीं दिया साहिल दिखाई दे तो रहा था बहुत क़रीब कश्ती को रास्ता ही भँवर ने नहीं दिया जितना सकूँ मिला है तिरे साथ राह में इतना सुकून तो मुझे घर ने नहीं दिया इस ने हँसी हँसी में मोहब्बत की बात की मैं ने 'अदीम' उस को मुकरने नहीं दिया — Adeem Hashmi
सर-ए-सहरा मुसाफ़िर को सितारा याद रहता है मैं चलता हूँ मुझे चेहरा तुम्हारा याद रहता है तुम्हारा ज़र्फ़ है तुम को मोहब्बत भूल जाती है हमें तो जिस ने हँस कर भी पुकारा याद रहता है मोहब्बत में जो डूबा हो उसे साहिल से क्या लेना किसे इस बहर में जा कर किनारा याद रहता है बहुत लहरों को पकड़ा डूबने वाले के हाथों ने यही बस एक दरिया का नज़ारा याद रहता है सदाएँ एक सी यकसानियत में डूब जाती हैं ज़रा सा मुख़्तलिफ़ जिस ने पुकारा याद रहता है मैं किस तेज़ी से ज़िंदा हूँ मैं ये तो भूल जाता हूँ नहीं आना है दुनिया में दोबारा याद रहता है — Adeem Hashmi
मुफ़ाहमत न सिखा जब्र-ए-नारवा से मुझे मैं सर-ब-कफ़ हूँ लड़ा दे किसी बला से मुझे ज़बाँ ने जिस्म का कुछ ज़हर तो उगल डाला बहुत सुकून मिला तल्ख़ी-ए-नवा से मुझे रचा हुआ है बदन में अभी सुरूर-ए-गुनाह अभी तो ख़ौफ़ नहीं आएगा सज़ा से मुझे मैं ख़ाक से हूँ मुझे ख़ाक जज़्ब कर लेगी अगरचे साँस मिले उम्र भर हवा से मुझे ग़िज़ा इसी में मिरी मैं इसी ज़मीं की ग़िज़ा सदा फिर आती है क्यूँँ पर्दा-ए-ख़ला से मुझे मैं जी रहा हूँ अभी ऐ ज़मीन-ए-आदम-ख़ोर अभी तो देख न तू इतनी इश्तिहा से मुझे बिखर चुका हूँ मैं अब मुझ को मुजतमा' कर ले तू अब समेट भी अपनी किसी सदा से मुझे मैं मर रहा हूँ फिर आए सदा-ए-कुन-फ़यकूँ बनाया जाए मिटा के फिर इब्तिदास मुझे मैं सर-ब-सज्दा हूँ ऐ 'शिम्र' मुझ को क़त्ल भी कर रिहाई दे भी अब इस अहद-ए-कर्बला से मुझे मैं कुछ नहीं हूँ तो फिर क्यूँँ मुझे बनाया गया ये पूछने की इजाज़त तो हो ख़ुदा से मुझे मैं रेज़ा रेज़ा बदन का उठा रहा हूँ 'अदीम' वो तोड़ ही तो गया अपनी इल्तिजा से मुझे — Adeem Hashmi
किसी झूटी वफ़ा से दिल को बहलाना नहीं आता मुझे घर काग़ज़ी फूलों से महकाना नहीं आता मैं जो कुछ हूँ वही कुछ हूँ जो ज़ाहिर है वो बातिन है मुझे झूटे दर-ओ-दीवार चमकाना नहीं आता मैं दरिया हूँ मगर बहता हूँ मैं कोहसार की जानिब मुझे दुनिया की पस्ती में उतर जाना नहीं आता ज़र-ओ-माल-ओ-जवाहर ले भी और ठुकरा भी सकता हूँ कोई दिल पेश करता हो तो ठुकराना नहीं आता परिंदा जानिब-ए-दाना हमेशा उड़ के आता है परिंदे की तरफ़ उड़ कर कभी दाना नहीं आता अगर सहरा में हैं तो आप ख़ुद आए हैं सहरा में किसी के घर तो चल कर कोई वीराना नहीं आता हुआ है जो सदा उस को नसीबों का लिखा समझा 'अदीम' अपने किए पर मुझ को पछताना नहीं आता — Adeem Hashmi