मुफ़ाहमत न सिखा जब्र-ए-नारवा से मुझे

  - Adeem Hashmi

मुफ़ाहमत न सिखा जब्र-ए-नारवा से मुझे
मैं सर-ब-कफ़ हूँ लड़ा दे किसी बला से मुझे

ज़बाँ ने जिस्म का कुछ ज़हर तो उगल डाला
बहुत सुकून मिला तल्ख़ी-ए-नवा से मुझे

रचा हुआ है बदन में अभी सुरूर-ए-गुनाह
अभी तो ख़ौफ़ नहीं आएगा सज़ा से मुझे

मैं ख़ाक से हूँ मुझे ख़ाक जज़्ब कर लेगी
अगरचे साँस मिले उम्र भर हवा से मुझे

ग़िज़ा इसी में मिरी मैं इसी ज़मीं की ग़िज़ा
सदा फिर आती है क्यूँ पर्दा-ए-ख़ला से मुझे

मैं जी रहा हूँ अभी ऐ ज़मीन-ए-आदम-ख़ोर
अभी तो देख न तू इतनी इश्तिहा से मुझे

बिखर चुका हूँ मैं अब मुझ को मुजतमा' कर ले
तू अब समेट भी अपनी किसी सदा से मुझे

मैं मर रहा हूँ फिर आए सदा-ए-कुन-फ़यकूँ
बनाया जाए मिटा के फिर इब्तिदा से मुझे

मैं सर-ब-सज्दा हूँ ऐ 'शिम्र' मुझ को क़त्ल भी कर
रिहाई दे भी अब इस अहद-ए-कर्बला से मुझे

मैं कुछ नहीं हूँ तो फिर क्यूँ मुझे बनाया गया
ये पूछने की इजाज़त तो हो ख़ुदा से मुझे

मैं रेज़ा रेज़ा बदन का उठा रहा हूँ 'अदीम'
वो तोड़ ही तो गया अपनी इल्तिजा से मुझे

  - Adeem Hashmi

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    किसी झूटी वफ़ा से दिल को बहलाना नहीं आता
    मुझे घर काग़ज़ी फूलों से महकाना नहीं आता

    मैं जो कुछ हूँ वही कुछ हूँ जो ज़ाहिर है वो बातिन है
    मुझे झूटे दर-ओ-दीवार चमकाना नहीं आता

    मैं दरिया हूँ मगर बहता हूँ मैं कोहसार की जानिब
    मुझे दुनिया की पस्ती में उतर जाना नहीं आता

    ज़र-ओ-माल-ओ-जवाहर ले भी और ठुकरा भी सकता हूँ
    कोई दिल पेश करता हो तो ठुकराना नहीं आता

    परिंदा जानिब-ए-दाना हमेशा उड़ के आता है
    परिंदे की तरफ़ उड़ कर कभी दाना नहीं आता

    अगर सहरा में हैं तो आप ख़ुद आए हैं सहरा में
    किसी के घर तो चल कर कोई वीराना नहीं आता

    हुआ है जो सदा उस को नसीबों का लिखा समझा
    'अदीम' अपने किए पर मुझ को पछताना नहीं आता
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    Adeem Hashmi
    तेरे लिए चले थे हम तेरे लिए ठहर गए
    तू ने कहा तो जी उठे तू ने कहा तो मर गए

    कट ही गई जुदाई भी कब ये हुआ कि मर गए
    तेरे भी दिन गुज़र गए मेरे भी दिन गुज़र गए

    तू भी कुछ और और है हम भी कुछ और और हैं
    जाने वो तू किधर गया जाने वो हम किधर गए

    राहों में ही मिले थे हम राहें नसीब बन गईं
    वो भी न अपने घर गया हम भी न अपने घर गए

    वक़्त ही जुदाई का इतना तवील हो गया
    दिल में तिरे विसाल के जितने थे ज़ख़्म भर गए

    होता रहा मुक़ाबला पानी का और प्यास का
    सहरा उमड उमड पड़े दरिया बिफर बिफर गए

    वो भी ग़ुबार-ए-ख़्वाब था हम भी ग़ुबार-ए-ख़्वाब थे
    वो भी कहीं बिखर गया हम भी कहीं बिखर गए

    कोई कनार-ए-आबजू बैठा हुआ है सर-निगूँ
    कश्ती किधर चली गई जाने किधर भँवर गए

    आज भी इंतिज़ार का वक़्त हुनूत हो गया
    ऐसा लगा कि हश्र तक सारे ही पल ठहर गए

    बारिश-ए-वस्ल वो हुई सारा ग़ुबार धुल गया
    वो भी निखर निखर गया हम भी निखर निखर गए

    आब-ए-मुहीत-ए-इश्क़ का बहर अजीब बहर है
    तैरे तो ग़र्क़ हो गए डूबे तो पार कर गए

    इतने क़रीब हो गए अपने रक़ीब हो गए
    वो भी 'अदीम' डर गया हम भी 'अदीम' डर गए

    उस के सुलूक पर 'अदीम' अपनी हयात-ओ-मौत है
    वो जो मिला तो जी उठे वो न मिला तो मर गए
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    Adeem Hashmi
    फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था
    सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था
    Adeem Hashmi
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    आया हूँ संग-ओ-ख़िश्त के अम्बार देख कर
    ख़ौफ़ आ रहा है साया-ए-दीवार देख कर

    आँखें खुली रही हैं मिरी इंतिज़ार में
    आए न ख़्वाब दीदा-ए-बेदार देख कर

    ग़म की दुकान खोल के बैठा हुआ था मैं
    आँसू निकल पड़े हैं ख़रीदार देख कर

    क्या इल्म था फिसलने लगेंगे मिरे क़दम
    मैं तो चला था राह को हमवार देख कर

    हर कोई पारसाई की उम्दा मिसाल था
    दिल ख़ुश हुआ है एक गुनहगार देख कर
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    Adeem Hashmi
    इक खिलौना टूट जाएगा नया मिल जाएगा
    मैं नहीं तो कोई तुझ को दूसरा मिल जाएगा
    Adeem Hashmi
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