Sarfaraz Shahid

Sarfaraz Shahid

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Sarfaraz Shahid shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Sarfaraz Shahid's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Shayari
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Sher

हो सके तो तुम बचा लो अब भी देसी नस्ल को वर्ना पीछे सिर्फ़ ''शेवर'' मुर्ग़ियाँ रह जाएँगी — Sarfaraz Shahid
इस दौर के मर्दों की जो की शक्ल-शुमारी साबित हुआ दुनिया में ख़्वातीन बहुत हैं — Sarfaraz Shahid
ईद पर मसरूर हैं दोनों मियाँ बीवी बहुत इक ख़रीदारी से पहले इक ख़रीदारी के ब'अद — Sarfaraz Shahid
लबों में आ के क़ुल्फ़ी हो गए अश'आर सर्दी में ग़ज़ल कहना भी अब तो हो गया दुश्वार सर्दी में — Sarfaraz Shahid
बजट की कई सख़्तियाँ और भी हैं अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं — Sarfaraz Shahid
फ़क़त रंग ही उन का काला नहीं है इसी क़िस्म की ख़ूबियाँ और भी हैं — Sarfaraz Shahid
स्पैशलिस्ट पेन-किलर दे तो कौन सा? ''सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है'' — Sarfaraz Shahid

Ghazal

माडर्न हीरें तो ज़र-दारों के हाँ रह जाएँगी और राँझाें के लबों पर मुरलियाँ रह जाएँगी हो सके तो तुम बचा लो अब भी देसी नस्ल को वर्ना पीछे सिर्फ़ ''शेवर'' मुर्ग़ियाँ रह जाएँगी ''सनफ़्लॉवर'' हो गया है इब्न-ए-आदम की ग़िज़ा अब चमन-ज़ारों में गोया सब्ज़ियाँ रह जाएँगी छोटी क़ौमों पर अगर ''वीटो'' का लठ चलता रहा सिर्फ़ ''यूँ.एन.ओ'' में ग़ुंडा-गर्दीयाँ रह जाएँगी नेक-सीरत शौहरों को देख कर हूरों के बीच ख़ुल्द के अंदर तड़प कर बीवियाँ रह जाएँगी ज़ुल्मतें होंगी तवानाई के इस बोहरान में सिर्फ़ आँखों में चमकती बिजलियाँ रह जाएँगी मुर्ग़ पर फ़ौरन झपट दावत में वर्ना ब'अद में शोरबा और गर्दनों की हड्डियाँ रह जाएँगी घर के गुल-दानों में 'शाहिद' फूल होंगे काग़ज़ी और पर्दों पर ''प्रिंटेड'' तितलियाँ रह जाएँगी — Sarfaraz Shahid
मुनाफ़ा मुश्तरक है और ख़सारे एक जैसे हैं कि हम दोनों की क़िस्मत के सितारे एक जैसे हैं मैं इक छोटा सा अफ़सर हूँ वो इक मोटा सा ''मिल-ओनर'' मगर दोनों के इन्कम गोश्वारे एक जैसे हैं इसे ज़ोफ़-ए-बसीरत उसे ज़ोफ़-ए-बसारत है हमारे दीदा-वर सारे के सारे एक जैसे हैं मटन और दाल की क़ीमत बराबर हो गई जब से यक़ीं आया कि दोनों में ''हरारे'' एक जैसे हैं जहाँ भर के सियासी दंगलों में हम ने देखा है ''अनूकी'' इक से इक ऊँचा है ''झारे'' एक जैसे हैं वो थाना हो शिफा-ख़ाना हो या फिर डाक-ख़ाना हो रिफ़ाह-ए-आम के सारे इदारे एक जैसे हैं सुरूर-ए-जाँ-फ़ज़ा देती है आग़ोश-ए-वतन सब को कि जैसे भी हों बच्चे माँ को प्यारे एक जैसे हैं बला का फ़र्क़ है लंदन की गोरी और काली में मगर दोनों की आँखों में इशारे एक जैसे हैं हर इक बेगम अगरचे मुनफ़रिद है अपनी सज-धज में मगर जितने भी शौहर हैं बिचारे एक जैसे हैं कोई ख़ुश-ज़ौक़ ही 'शाहिद' ये नुक्ता जान सकता है कि मेरे शे'र और नख़रे तुम्हारे एक जैसे हैं गुमाँ होता है 'शाहिद' रेडियो पर सुन के मौसीक़ी कि पक्के राग और नमकीं गरारे एक जैसे हैं — Sarfaraz Shahid
क़ाबिज़ रहा है दिल पे जो सुलतान की तरह आख़िर निकल गया शह-ए-ईरान की तरह ज़ाहिर में सर्द-ओ-ज़र्द है काग़ान की तरह लेकिन मिज़ाज उस का है मुल्तान की तरह राज़-ओ-नियाज़ में भी अकड़-फ़ूँ नहीं गई वो ख़त भी लिख रहा है तो चालान की तरह लुक़्मा हलाल का जो मिला अहल-कार को उस ने चबा के थूक दिया पान की तरह ज़िक्र उस परी-जमाल का जब और जहाँ छिड़ा फ़ौरन रक़ीब आ गया शैतान की तरह इक लम्हा उस की दीद हुई बस की भीड़ में और फिर वो खो गया मिरे औसान की तरह मैं मुब्तला-ए-क़र्ज़ रहा चार साल तक वो सिर्फ़ चार दिन रहा मेहमान की तरह हर बात के जवाब में फ़ौरन नहीं नहीं निकला ज़बान-ए-यार से गर्दान की तरह 'शाहिद' से कह रहे हो कि रोज़े रखा करे हर माह जिस का गुज़रा है रमज़ान की तरह — Sarfaraz Shahid
इश्क़ में कुछ इस सबब से भी है आसानी मुझे क़ल्ब सहराई मिला है आँख बारानी मुझे मेरे और मेरे चचा के दौर में ये फ़र्क़ है उन को तो बीवी मिली थी और उस्तानी मुझे एक ही मिसरे में दस दस बार दिल बिरयाँ हुआ वो ग़ज़ल में बाँध कर देते हैं बिरयानी मुझे कोका-कोला कर गई मुझ को क़लंदर की ये बात रेल के डब्बे में क्यूँँ मिलता नहीं पानी मुझे ज़ख़्म वो दिल पर लगाते हैं मिरे और उस पे रोज़ अपने घर से भेज देते हैं नमक-दानी मुझे सारे शिकवे दूर हो जाएँ जो क़ुदरत सौंप दे मेरी दानाई तुझे और तेरी नादानी मुझे फूँक देता हूँ मैं उस पर अपना कोई शेर-ए-ख़ुश जब डराता है कोई अंदोह-ए-पिन्हानी मुझे — Sarfaraz Shahid
वही मक़्बूल लीडर और डिप्लोमैट होता है जो मुँह से दिस कहे तो उस का मतलब दैट होता है अवामुन्नास को ऐसे दबोचा है गिरानी ने कि जैसे कैट के पंजे में कोई रैट होता है फ़राग़त ही नहीं मिलती बड़े-साहिब को मीटिंग से वो मीटिंग जिस का एजंडा फ़क़त चुप-चैट होता है क्रिकेटर बाज़ इस अंदाज़ से छका लगाते हैं ज़मीन पर गेंद होती है फ़ज़ा में बैट होता है यक़ीनन हो गया है माडर्न अपना घराना भी जहाँ पर कैप होती थी वहाँ अब हैट होता है यही देखा है 'शाहिद' तीसरी दुनिया के मुल्कों में कि अक्सर क़ौम पतली और लीडर फैट होता है — Sarfaraz Shahid

Nazm

"डॉज-महल" डॉज के नाम से जानाँ तुझे उल्फ़त ही सही डॉज होटल से तुझे ख़ास अक़ीदत ही सही उस की चाय से चिकन सूप से रग़बत ही सही डॉज करना भी अज़ल से तिरी आदत ही सही तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से क़ैस-ओ-लैला भी तो करते थे मोहब्बत लेकिन इश्क़-बाज़ी के लिए दश्त को अपनाते थे हम ही अहमक़ हैं जो होटल में चले आते हैं वो समझदार थे जंगल को निकल जाते थे तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से काश इस मरमरीं होटल के बड़े मतबख़ में तू ने पकते हुए खानों को तो देखा होता वो जो मुर्दार के क़ीमे से भरे जाते हैं काश उन रोग़नी नानों को तो देखा होता तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से जानाँ! रोज़ाना तिरे लंच का बिल कैसे दूँ मैं कोई सेठ नहीं कोई स्मगलर भी नहीं मुझ को होती नहीं ऊपर की कमाई हरगिज़ मैं किसी दफ़्तर-ए-मख़्सूस का अफ़सर भी नहीं तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से घाग बैरे ने दिखा कर बड़ा महँगा मेन्यूँँ हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़ इश्क़ है मुझ से तो ''कॉफ़ी'' ही को काफ़ी समझो मैं मँगा सकता नहीं मुर्ग़-मुसल्लम का तबाक़ तू मिरी जान कहीं और मिला कर मुझ से — Sarfaraz Shahid
"जश्न-ए-आज़ादी" काम जो रिश्वत से बन जाए बनाना चाहिए चोर-बाज़ारी में काला धन कमाना चाहिए दूध में पानी बा-आज़ादी मिलाना चाहिए जिस से मतलब हो उसे मक्खन लगाना चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? चावल और गंदुम न कुछ फ़ौलाद पैदा कीजिए निस्फ़ दर्जन कम से कम औलाद पैदा कीजिए मसअले फिर आप ला-तादाद पैदा कीजिए माहिर-ए-मंसूबा-बंदी को भगाना चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? माँग है स्टेरीओ की और वी-सी-आर की ख़ैर हो अब आडियो वीडियो के कारोबार की शक्ल मिलने लग गई हैप्पी से बर-ख़ुरदार की जिस के लप पर हर घड़ी डिस्को तराना चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? रिक्शा ओ टैक्सी का मीटर तेज़ होना चाहिए नर्सरी का मास्टर अंग्रेज़ होना चाहिए अक़्द का मेआर इतना ''रेज़'' होना चाहिए ज़िंदगी का पार्टनर मिस्ल-ए-''डियाना'' चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? जी में जो आए किए जाओ कि तुम आज़ाद हो मोटरें तेज़ी से दौड़ाओ कि तुम आज़ाद हो हादसा कर के खिसक जाओ कि तुम आज़ाद हो धर लिए जाओ तो फ़ौरन ''मकमकाना'' चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? आज इस अंदाज़ को यकसर बदलना है हमें हम बहुत बिगड़े हैं लेकिन अब सँवरना है हमें देस की ख़ातिर ही जीना और मरना है हमें जो न अब तक हो सका अब कर दिखाना चाहिए दोस्तो! यूँँ जश्न-ए-आज़ादी मनाना चाहिए? — Sarfaraz Shahid
"जदीद-तरीन आदमी-नामा" रॉकेट उड़ा रहा है सो है वो भी आदमी मोटर चला रहा है सो है वो भी आदमी बस में जो जा रहा है सो है वो भी आदमी पैडल घुमा रहा है सो है वो भी आदमी पैदल जो आ रहा है सो है वो भी आदमी पब्लिक से जिस ने वोट लिया वो भी आदमी रिश्वत का जिस ने नोट लिया वो भी आदमी ''लुन्डे'' का जिस ने कोट लिया वो भी आदमी ''चर्ग़ा'' उड़ा रहा है सो है वो भी आदमी जो दाल खा रहा है सो है वो भी आदमी बिज़नेस कोई करे तो कोई नौकरी करे कोई बने क्लर्क कोई अफ़सरी करे जो कुछ न कर सके वो फ़क़त लीडरी करे जल्सा सजा रहा है सो है वो भी आदमी नारे लगा रहा है सो है वो भी आदमी तस्ख़ीर जो ख़ला की करे वो भी आदमी उड़ जाए चाँद से भी परे वो भी आदमी और इस का जो यक़ीं न करे वो भी आदमी बातें बना रहा है सो है वो भी आदमी कुछ कर दिखा रहा है सो है वो भी आदमी टीवी पे आदमी हमें नग़्में सुनाए है डिस्को करे है आदमी और थरथराए है और कोई बाथ-रूम ही में गुनगुनाए है जो गीत गा रहा है सो है वो भी आदमी जो सर हिला रहा है सो है वो भी आदमी सिगरेट का जो उड़ाए धुआँ वो भी आदमी पीता है हीरोइन जो यहाँ वो भी आदमी निस्वार में जो पाए अमाँ वो भी आदमी बीड़ा चबा रहा है सो है वो भी आदमी जो पी पिला रहा है सो है वो भी आदमी — Sarfaraz Shahid
"जहाँ सुलताना पढ़ती थी" वो इस कॉलेज की शहज़ादी थी और शाहाना पढ़ती थी वो बे-बाकाना आती थी वो बे-बाकाना पढ़ती थी बड़े मुश्किल सबक़ थे जिन को वो रोज़ाना पढ़ती थी वो लड़की थी मगर मज़मून सब मर्दाना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी क्लासों में हमेशा देर से वो आया करती थी किताबों के तले फ़िल्मी रिसाले लाया करती थी वो जब दौरान-ए-लेक्चर बोर सी हो जाया करती थी तो चुपके से कोई ताज़ा-तरीन अफ़्साना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी किताबें देख कर कुढ़ती थी महव-ए-यास होती थी ब-क़ौल उस के किताबों में निरी बकवास होती थी तअज्जुब है कि वो हर साल कैसे पास होती थी जो ''इल्लम'' इल्म को मौलाना को ''मलवाना'' पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी बड़ी मशहूर थी कॉलेज में चर्चा आम था उस का जवानों के दिलों से खेलना बस काम था उस का यहाँ कॉलेज में पढ़ना तो बराए-नाम था उस का कि वो आज़ाद लड़की थी वो आज़ादाना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी अजब अंदाज़ के उश्शाक़ थे उस हीर के मा में खड़े रहते थे फाटक पर कई माझे कई गा में जो उस के नाम पर करते थे झगड़े और हंगा में वो उस तूफ़ान में रहती थी तूफ़ानाना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी वो सुलताना मगर पहली सी सुलताना नहीं यारो सुना है कोई भी अब उस का दीवाना नहीं यारो कोई इस शम्अ-ए-ख़ाकिस्तर का परवाना नहीं यारो ख़ुद अफ़्साना बनी बैठी है जो अफ़्साना पढ़ती थी यही कॉलेज है वो हमदम जहाँ सुलताना पढ़ती थी — Sarfaraz Shahid