काफ़ी ऊपर निकल गया हूँ मैं
और अंजाम जानता हूँ मैं
इक तवाइफ़ हूँ दिल के कोठे पर
पेश-ए-उम्मीद नाचता हूँ मैं
आँधियों लौट जाओ दिखता नहीं
सर-ए-क़िन्दील मैं खड़ा हूँ मैं
हर कोई मुझ से डरता फिरता है
ऐसा लगता है आइना हूँ मैं
कुछ ख़ुदा चाक पर रखे हुए हैं
और उन्हें नक़्श दे रहा हूँ मैं
सब तरफ़दार कशमकश में हैं
जबसे अपना अदू बना हूँ मैं
ठीक है तुम वफ़ा की मूरत हो
मान लेता हूँ बे-वफ़ा हूँ मैं
एक पहुँचा हुआ क़लंदर हूँ
पारसाई छुपा रहा हूँ मैं
जो हुआ भी नहीं अभी 'आसिफ़'
जाने क्यूँ उस से डर रहा हूँ मैं
— Abdulla Asif















