Rehman Faris

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Rehman Faris shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Rehman Faris's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

जता दिया कि मोहब्बत में ग़म भी होते हैं दिया गुलाब तो काँटे भी थे गुलाब के साथ — Rehman Faris
अगर हुकूमत तुम्हारी तस्वीर छाप दे नोट पर मेरी दोस्त तो देखना तुम कि लोग बिल्कुल फ़ुज़ूल-ख़र्ची नहीं करेंगे — Rehman Faris
ये क्या कि जब भी मिलो पूछ के बता के मिलो कभी करो मुझे हैरान अचानक आ के मिलो — Rehman Faris
ख़मोश झील के पानी में वो उदासी थी कि दिल भी डूब गया रात माहताब के साथ — Rehman Faris
तेरे बिन घड़ियाँ गिनी हैं रात दिन नौ बरस ग्यारह महीने सात दिन — Rehman Faris
तू ने बहुत ख़राब किया है मुझे मगर इस शे'र में ख़राब का मतलब कुछ और है — Rehman Faris
हम पे कर ध्यान अरे चाँद को तकने वाले चाँद के पास तो मोहलत है सहर होने तक — Rehman Faris
झेला है मैं ने तीन सौ पैंसठ दुखों का साल चाहो तो पिछले बारह महीनों से पूछ लो — Rehman Faris
सदाएँ देते हुए और ख़ाक उड़ाते हुए मैं अपने आप से गुज़रा हूँ तुझ तक आते हुए — Rehman Faris
कहानी ख़त्म हुई और ऐसी ख़त्म हुई कि लोग रोने लगे तालियाँ बजाते हुए — Rehman Faris
आप की आँखें अगर शे'र सुनाने लग जाएँ हम जो ग़ज़लें लिए फिरते हैं, ठिकाने लग जाएँ — Rehman Faris

Ghazal

यही दुआ है यही है सलाम इश्क़ ब-ख़ैर मिरे सभी रुफ़क़ा-ए-किराम इश्क़ ब-ख़ैर दयार-ए-हिज्र की सूनी उदास गलियों में पुकारता है कोई सुब्ह-ओ-शाम इश्क़ ब-ख़ैर मैं कर रहा था दुआ की गुज़ारिशें उस से सो कह गई है उदासी की शाम इश्क़ ब-ख़ैर बड़े अजीब हैं शहर-ए-जुनूँ के बाशिंदे हमेशा कहते हैं बा'द-अज़-सलाम इश्क़ ब-ख़ैर ये रह ज़रूर तुम्हारे ही घर को जाती है लिखा हुआ है यहाँ गाम गाम इश्क़ ब-ख़ैर बयान की है ग़ज़ल-वार दास्तान-ए-इश्क़ सो इस किताब का रक्खा है नाम इश्क़ ब-ख़ैर उफ़ुक़ के पार मुझे याद कर रहा है कोई अभी मिला है उधर से पयाम-ए-इश्क़ ब-ख़ैर — Rehman Faris
विदा-ए-यार का लम्हा ठहर गया मुझ में मैं ख़ुद तो ज़िंदा रहा वक़्त मर गया मुझ में सुकूत-ए-शाम में चीख़ें सुनाई देती हैं तू जाते जाते अजब शोर भर गया मुझ में वो पहले सिर्फ़ मिरी आँख में समाया था फिर एक रोज़ रगों तक उतर गया मुझ में कुछ ऐसे ध्यान में चेहरा तिरा तुलूअ'' हुआ ग़ुरूब-ए-शाम का मंज़र निखर गया मुझ में मैं उस की ज़ात से मुंकिर था और फिर इक दिन वो अपने होने का एलान कर गया मुझ में खंडर समझ के मिरी सैर करने आया था गया तो मौसम-ए-ग़म फूल धर गया मुझ में गली में गूँजी ख़मोशी की चीख़ रात के वक़्त तुम्हारी याद का बच्चा सा डर गया मुझ में बता मैं क्या करूँँ दिल नाम के इस आँगन का तिरी उमीद पे जो सज-सँवर गया मुझ में ये अपने अपने मुक़द्दर की बात है 'फ़ारिस' मैं इस में सिमटा रहा वो बिखर गया मुझ में — Rehman Faris
मुझे ग़रज़ है सितारे न माहताब के साथ चमक रहा है ये दिल पूरी आब-ओ-ताब के साथ नपी-तुली सी मोहब्बत लगा बँधा सा करम निभा रहे हो तअ'ल्लुक़ बड़े हिसाब के साथ मैं इस लिए नहीं थकता तिरे तआक़ुब से मुझे यक़ीं है कि पानी भी है सराब के साथ सवाल-ए-वस्ल पे इनकार करने वाले सुन सवाल ख़त्म नहीं होगा इस जवाब के साथ ख़मोश झील के पानी में वो उदासी थी कि दिल भी डूब गया रात माहताब के साथ जता दिया कि मोहब्बत में ग़म भी होते हैं दिया गुलाब तो काँटे भी थे गुलाब के साथ मैं ले उड़ूँगा तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से ता'बीर न देख मेरी तरफ़ चश्म-ए-नीम-ख़्वाब के साथ अरे ये सिर्फ़ बहाना है बात करने का मिरी मजाल कि झगड़ा करूँँ जनाब के साथ विसाल-ओ-हिज्र की सरहद पे झुट-पुटे में कहीं वो बे-हिजाब हुआ था मगर हिजाब के साथ शिकस्ता आइना देखा फिर अपना दिल देखा दिखाई दी मुझे ता'बीर-ए-ख़्वाब ख़्वाब के साथ वहाँ मिलूँगा जहाँ दोनों वक़्त मिलते हैं मैं कम-नसीब तिरे जैसे कामयाब के साथ दयार-ए-हिज्र के रोज़ा-गुज़ार चाहते हैं कि रोज़ा खोलें तिरे और शराब-ए-नाब के साथ तुम अच्छी दोस्त हो सो मेरा मशवरा ये है मिला-जुला न करो 'फ़ारिस'-ए-ख़राब के साथ — Rehman Faris
नज़र उठाएँ तो क्या क्या फ़साना बनता है सौ पेश-ए-यार निगाहें झुकाना बनता है वो लाख बे-ख़बर-ओ-बे-वफ़ा सही लेकिन तलब किया है गर उस ने तो जाना बनता है रगों तलक उतर आई है ज़ुल्मत-ए-शब-ए-ग़म सो अब चराग़ नहीं दिल जलाना बनता है पराई आग मिरा घर जला रही है सो अब ख़मोश रहना नहीं ग़ुल मचाना बनता है क़दम क़दम पे तवाज़ुन की बात मत कीजे ये मय-कदा है यहाँ लड़खड़ाना बनता है बिछड़ने वाले तुझे किस तरह बताऊँ मैं कि याद आना नहीं तेरा आना बनता है ये देख कर कि तिरे आशिक़ों में मैं भी हूँ जमाल-ए-यार तिरा मुस्कुराना बनता है जुनूँ भी सिर्फ़ दिखावा है वहशतें भी ग़लत दिवाना है नहीं 'फ़ारिस' दिवाना बनता है — Rehman Faris
सर-ब-सर यार की मर्ज़ी पे फ़िदा हो जाना क्या ग़ज़ब काम है राज़ी-ब-रज़ा हो जाना बंद आँखों वो चले आएँ तो वा हो जाना और यूँँ फूट के रोना कि फ़ना हो जाना इश्क़ में काम नहीं ज़ोर-ज़बरदस्ती का जब भी तुम चाहो जुदा होना जुदा हो जाना तेरी जानिब है ब-तदरीज तरक़्क़ी मेरी मेरे होने की है मे'राज तिरा हो जाना तेरे आने की बशारत के सिवा कुछ भी नहीं बाग़ में सूखे दरख़्तों का हरा हो जाना इक निशानी है किसी शहर की बर्बादी की नारवा बात का यक-लख़्त रवा हो जाना तंग आ जाऊँ मोहब्बत से तो गाहे गाहे अच्छा लगता है मुझे तेरा ख़फ़ा हो जाना सी दिए जाएँ मिरे होंट तो ऐ जान-ए-ग़ज़ल ऐसा करना मिरी आँखों से अदा हो जाना बे-नियाज़ी भी वही और तअ'ल्लुक़ भी वही तुम्हें आता है मोहब्बत में ख़ुदा हो जाना अज़दहा बन के रग-ओ-पै को जकड़ लेता है इतना आसान नहीं ग़म से रिहा हो जाना अच्छे अच्छों पे बुरे दिन हैं लिहाज़ा 'फ़ारिस' अच्छे होने से तो अच्छा है बुरा हो जाना — Rehman Faris
मैं कार-आमद हूँ या बे-कार हूँ मैं मगर ऐ यार तेरा यार हूँ मैं जो देखा है किसी को मत बताना इलाक़े भर में इज़्ज़त-दार हूँ मैं ख़ुद अपनी ज़ात के सरमाए में भी सिफ़र फ़ीसद का हिस्से-दार हूँ मैं और अब क्यूँँ बैन करते आ गए हों कहा था ना बहुत बीमार हूँ मैं मिरी तो सारी दुनिया बस तुम्हीं हो ग़लत क्या है जो दुनिया-दार हूँ मैं कहानी में जो होता ही नहीं है कहानी का वही किरदार हूँ मैं ये तय करता है दस्तक देने वाला कहाँ दर हूँ कहाँ दीवार हूँ मैं कोई समझाए मेरे दुश्मनों को ज़रा सी दोस्ती की मार हूँ मैं मुझे पत्थर समझ कर पेश मत आ ज़रा सा रहम कर जाँ-दार हूँ मैं बस इतना सोच कर कीजे कोई हुक्म बड़ा मुँह-ज़ोर ख़िदमत-गार हूँ मैं कोई शक है तो बे-शक आज़मा ले तिरा होने का दा'वे-दार हूँ मैं अगर हर हाल में ख़ुश रहना फ़न है तो फिर सब से बड़ा फ़नकार हूँ मैं ज़माना तो मुझे कहता है 'फ़ारिस' मगर 'फ़ारिस' का पर्दा-दार हूँ मैं उन्हें खिलना सिखाता हूँ मैं 'फ़ारिस' गुलाबों का सुहूलत-कार हूँ मैं — Rehman Faris
सदाएँ देते हुए और ख़ाक उड़ाते हुए मैं अपने आप से गुज़रा हूँ तुझ तक आते हुए फिर उस के बा'द ज़माने ने मुझ को रौंद दिया मैं गिर पड़ा था किसी और को उठाते हुए कहानी ख़त्म हुई और ऐसी ख़त्म हुई कि लोग रोने लगे तालियाँ बजाते हुए फिर उस के बा'द अता हो गई मुझे तासीर मैं रो पड़ा था किसी को ग़ज़ल सुनाते हुए ख़रीदना है तो दिल को ख़रीद ले फ़ौरन खिलौने टूट भी जाते हैं आज़माते हुए तुम्हारा ग़म भी किसी तिफ़्ल-ए-शीर-ख़ार सा है कि ऊँघ जाता हूँ मैं ख़ुद उसे सुलाते हुए अगर मिले भी तो मिलता है राह में 'फ़ारिस' कहीं से आते हुए या कहीं को जाते हुए — Rehman Faris
उम्र-भर इश्क़ किसी तौर न कम हो आमीन दिल को हर रोज़ अता ने'मत-ए-ग़म हो आमीन मेरे कासे को है बस चार ही सिक्कों की तलब इश्क़ हो वक़्त हो काग़ज़ हो क़लम हो आमीन हुजरा-ए-ज़ात में या महफ़िल-ए-याराँ में रहूँ फ़िक्र दुनिया की मुझे हो भी तो कम हो आमीन जब मैं ख़ामोश रहूँ रौनक़-ए-महफ़िल ठहरूँ और जब बात करूँँ बात में दम हो आमीन लोग चाहें भी तो हम को न जुदा कर पाएँ यूँँ मिरी ज़ात तिरी ज़ात में ज़म हो आमीन इश्क़ में डूब के जो कुछ भी लिखूँ काग़ज़ पर ख़ुद-ब-ख़ुद लौह-ए-ज़माना पे रक़म हो आमीन न डरा पाए मुझे तीरगी-ए-दश्त-ए-फ़िराक़ हर तरफ़ रौशनी-ए-दीदा-ए-नम हो आमीन 'मीर' के सदक़े मिरे हर्फ़ को दरवेशी मिले दूर मुझ से हवस-ए-दाम-ओ-दिरम हो आमीन मेरे कानों ने सुना है तिरे बारे में बहुत मेरी आँखों पे भी थोड़ा सा करम हो आमीन जब ज़मीं आख़िरी हिद्दत से पिघलने लग जाए इश्क़ की छाँव मिरे सर को बहम हो आमीन — Rehman Faris
सुकूत-ए-शाम में गूँजी सदा उदासी की कि है मज़ीद उदासी दवा उदासी की बहुत शरीर था मैं और हँसता फिरता था फिर इक फ़क़ीर ने दे दी दुआ उदासी की उमूर-ए-दिल में किसी तीसरे का दख़्ल नहीं यहाँ फ़क़त तिरी चलती है या उदासी की चराग़-ए-दिल को ज़रा एहतियात से रखना कि आज रात चलेगी हवा उदासी की वो इम्तिज़ाज था ऐसा कि दंग थी हर आँख जमाल-ए-यार ने पहनी क़बा उदासी की इसी उमीद पे आँखें बरसती रहती हैं कि एक दिन तो सुनेगा ख़ुदा उदासी की शजर ने पूछा कि तुझ में ये किस की ख़ुशबू है हवा-ए-शाम-ए-अलम ने कहा उदासी की दिल-ए-फ़सुर्दा को मैं ने तो मार ही डाला सो मैं तो ठीक हूँ अब तू सुना उदासी की ज़रा सा छू लें तो घंटों दहकती रहती है हमें तो मार गई ये अदा उदासी की बहुत दिनों से मैं उस से नहीं मिला 'फ़ारिस' कहीं से ख़ैर-ख़बर ले के आ उदासी की — Rehman Faris
ये जो मुझ पर निखार है साईं आप ही की बहार है साईं आप चाहें तो जान भी ले लें आप को इख़्तियार है साईं तुम मिलाते हो बिछड़े लोगों को एक मेरा भी यार है साईं किसी खूँटी से बाँध दीजे उसे दिल बड़ा बे-महार है साईं इश्क़ में लग़्ज़िशों पे कीजे मुआ'फ़ साईं ये पहली बार है साईं कुल मिला कर है जो भी कुछ मेरा आप से मुस्तआ'र है साईं एक कश्ती बना ही दीजे मुझे कोई दरिया के पार है साईं रोज़ आँसू कमा के लाता हूँ ग़म मिरा रोज़गार है साईं वुस'अत-ए-रिज़्क़ की दुआ दीजे दर्द का कारोबार है साईं ख़ार-ज़ारों से हो के आया हूँ पैरहन तार-तार है साईं कभी आ कर तो देखिए कि ये दिल कैसा उजड़ा दयार है साईं — Rehman Faris
क्यूँँ तिरे साथ रहीं उम्र बसर होने तक हम न देखेंगे इमारत को खंडर होने तक तुम तो दरवाज़ा खुला देख के दर आए हो तुम ने देखा नहीं दीवार को दर होने तक चुप रहीं आह भरें चीख़ उठें या मर जाएँ क्या करें बे-ख़बरो तुम को ख़बर होने तक हम पे कर ध्यान अरे चाँद को तकने वाले चाँद के पास तो मोहलत है सहर होने तक हाल मत पूछिए कुछ बातें बताने की नहीं बस दुआ कीजे दु'आओं में असर होने तक सग-ए-आवारा के मानिंद मोहब्बत के फ़क़ीर दर-ब-दर होते रहे शहर-बदर होने तक आप माली हैं न सूरज हैं न मौसम फिर भी बीज को देखते रहिएगा समर होने तक दश्त-ए-ख़ामोश में दम साधे पड़ा रहता है पाँव का पहला निशाँ राह-गुज़र होने तक फ़ानी होने से न घबराइए 'फ़ारिस' कि हमें अन-गिनत मर्तबा मरना है अमर होने तक — Rehman Faris