यही दुआ है यही है सलाम 'इश्क़ ब-ख़ैर
मिरे सभी रुफ़क़ा-ए-किराम 'इश्क़ ब-ख़ैर
दयार-ए-हिज्र की सूनी उदास गलियों में
पुकारता है कोई सुब्ह-ओ-शाम 'इश्क़ ब-ख़ैर
मैं कर रहा था दुआ की गुज़ारिशें उस से
सो कह गई है उदासी की शाम 'इश्क़ ब-ख़ैर
बड़े अजीब हैं शहर-ए-जुनूँ के बाशिंदे
हमेशा कहते हैं बा'द-अज़-सलाम 'इश्क़ ब-ख़ैर
ये रह ज़रूर तुम्हारे ही घर को जाती है
लिखा हुआ है यहाँ गाम गाम 'इश्क़ ब-ख़ैर
बयान की है ग़ज़ल-वार दास्तान-ए-इश्क़
सो इस किताब का रक्खा है नाम 'इश्क़ ब-ख़ैर
उफ़ुक़ के पार मुझे याद कर रहा है कोई
अभी मिला है उधर से पयाम-ए-इश्क़ ब-ख़ैर
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