Aanis Moin

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Aanis Moin shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Aanis Moin's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

याद है 'आनिस' पहले तुम ख़ुद बिखरे थे आईने ने तुम से बिखरना सीखा था — Aanis Moin
आज की रात न जाने कितनी लंबी होगी आज का सूरज शाम से पहले डूब गया है — Aanis Moin
उतारा दिल के वरक़ पर तो कितना पछताया वो इंतिसाब जो पहले बस इक किताब पे था — Aanis Moin
बिखर के फूल फ़ज़ाओं में बास छोड़ गया तमाम रंग यहीं आस-पास छोड़ गया — Aanis Moin
गए ज़माने की चाप जिन को समझ रहे हो वो आने वाले उदास लम्हों की सिसकियाँ हैं — Aanis Moin
क्यूँँ खुल गए लोगों पे मिरी ज़ात के असरार ऐ काश कि होती मिरी गहराई ज़रा और — Aanis Moin
गहरी सोचें लम्बे दिन और छोटी रातें वक़्त से पहले धूप सरों पे आ पहुँची — Aanis Moin
गूँजता है बदन में सन्नाटा कोई ख़ाली मकान हो जैसे — Aanis Moin
अजब अंदाज़ से ये घर गिरा है मिरा मलबा मिरे ऊपर गिरा है — Aanis Moin
इक डूबती धड़कन की सदा लोग न सुन लें कुछ देर को बजने दो ये शहनाई ज़रा और — Aanis Moin
अंदर की दुनिया से रब्त बढ़ाओ 'आनिस' बाहर खुलने वाली खिड़की बंद पड़ी है — Aanis Moin
कब बार-ए-तबस्सुम मिरे होंटों से उठेगा ये बोझ भी लगता है उठाएगा कोई और — Aanis Moin
गया था माँगने ख़ुशबू मैं फूल से लेकिन फटे लिबास में वो भी गदा लगा मुझ को — Aanis Moin
हज़ारों क़ुमक़ुमों से जगमगाता है ये घर लेकिन जो मन में झाँक के देखूँ तो अब भी रौशनी कम है — Aanis Moin
मेरे अपने अंदर एक भँवर था जिस में मेरा सब कुछ साथ ही मेरे डूब गया है — Aanis Moin
ये इंतिज़ार सहर का था या तुम्हारा था दिया जलाया भी मैं ने दिया बुझाया भी — Aanis Moin
न जाने बाहर भी कितने आसेब मुंतज़िर हों अभी मैं अंदर के आदमी से डरा हुआ हूँ — Aanis Moin
वो जो प्यासा लगता था सैलाब-ज़दा था पानी पानी कहते कहते डूब गया है — Aanis Moin
हैरत से जो यूँँ मेरी तरफ़ देख रहे हो लगता है कभी तुम ने समुंदर नहीं देखा — Aanis Moin
था इंतिज़ार मनाएँगे मिल के दीवाली न तुम ही लौट के आए न वक़्त-ए-शाम हुआ — Aanis Moin

Ghazal

कितने ही पेड़ ख़ौफ़-ए-ख़िज़ाँ से उजड़ गए कुछ बर्ग-ए-सब्ज़ वक़्त से पहले ही झड़ गए कुछ आँधियाँ भी अपनी मुआविन सफ़र में थीं थक कर पड़ाव डाला तो ख़ेमे उखड़ गए अब के मिरी शिकस्त में उन का भी हाथ है वो तीर जो कमान के पंजे में गड़ गए सुलझी थीं गुत्थियाँ मिरी दानिस्त में मगर हासिल ये है कि ज़ख़्मों के टाँके उखड़ गए निरवान क्या बस अब तो अमाँ की तलाश है तहज़ीब फैलने लगी जंगल सुकड़ गए इस बंद घर में कैसे कहूँ क्या तिलिस्म है खोले थे जितने क़ुफ़्ल वो होंटों पे पड़ गए बे-सल्तनत हुई हैं कई ऊँची गर्दनें बाहर सरों के दस्त-ए-तसल्लुत से धड़ गए — Aanis Moin
बाहर भी अब अंदर जैसा सन्नाटा है दरिया के उस पार भी गहरा सन्नाटा है शोर थमें तो शायद सदियाँ बीत चुकी हैं अब तक लेकिन सहमा सहमा सन्नाटा है किस से बोलूँ ये तो इक सहरा है जहाँ पर मैं हूँ या फिर गूँगा बहरा सन्नाटा है जैसे इक तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी आज मिरी बस्ती में ऐसा सन्नाटा है नई सहर की चाप न जाने कब उभरेगी चारों जानिब रात का गहरा सन्नाटा है सोच रहे हो सोचो लेकिन बोल न पड़ना देख रहे हो शहर में कितना सन्नाटा है महव-ए-ख़्वाब हैं सारी देखने वाली आँखें जागने वाला बस इक अंधा सन्नाटा है डरना है तो अन-जानी आवाज़ से डरना ये तो 'आनिस' देखा-भाला सन्नाटा है — Aanis Moin
जीवन को दुख दुख को आग और आग को पानी कहते बच्चे लेकिन सोए हुए थे किस से कहानी कहते सच कहने का हौसला तुम ने छीन लिया है वर्ना शहर में फैली वीरानी को सब वीरानी कहते वक़्त गुज़रता जाता और ये ज़ख़्म हरे रहते तो बड़ी हिफ़ाज़त से रक्खी है तेरी निशानी कहते वो तो शायद दोनों का दुख इक जैसा था वर्ना हम भी पत्थर मारते तुझ को और दीवानी कहते तब्दीली सच्चाई है इस को मानते लेकिन कैसे आईने को देख के इक तस्वीर पुरानी कहते तेरा लहजा अपनाया अब दिल में हसरत सी है अपनी कोई बात कभी तो अपनी ज़बानी कहते चुप रह कर इज़हार किया है कह सकते तो 'आनस' एक अलाहिदा तर्ज़-ए-सुख़न का तुझ को बानी कहते — Aanis Moin
इक कर्ब-ए-मुसलसल की सज़ा दें तो किसे दें मक़्तल में हैं जीने की दुआ दें तो किसे दें पत्थर हैं सभी लोग करें बात तो किस से इस शहर-ए-ख़मोशाँ में सदा दें तो किसे दें है कौन कि जो ख़ुद को ही जलता हुआ देखे सब हाथ हैं काग़ज़ के दिया दें तो किसे दें सब लोग सवाली हैं सभी जिस्म बरहना और पास है बस एक रिदा दें तो किसे दें जब हाथ ही कट जाएँ तो थामेगा भला कौन ये सोच रहे हैं कि असा दें तो किसे दें बाज़ार में ख़ुशबू के ख़रीदार कहाँ हैं ये फूल हैं बे-रंग बता दें तो किसे दें चुप रहने की हर शख़्स क़सम खाए हुए है हम ज़हर भरा जाम भला दें तो किसे दें — Aanis Moin
मिलन की साअत को इस तरह से अमर किया है तुम्हारी यादों के साथ तन्हा सफ़र किया है सुना है उस रुत को देख कर तुम भी रो पड़े थे सुना है बारिश ने पत्थरों पर असर किया है सलीब का बार भी उठाओ तमाम जीवन ये लब-कुशाई का जुर्म तुम ने अगर किया है तुम्हें ख़बर थी हक़ीक़तें तल्ख़ हैं जभी तो! तुम्हारी आँखों ने ख़्वाब को मोतबर किया है घुटन बढ़ी है तो फिर उसी को सदाएँ दी हैं कि जिस हवा ने हर इक शजर बे-समर किया है है तेरे अंदर बसी हुई एक और दुनिया मगर कभी तू ने इतना लम्बा सफ़र किया है मिरे ही दम से तो रौनक़ें तेरे शहर में थीं मिरे ही क़दमों ने दश्त को रह-गुज़र किया है तुझे ख़बर क्या मिरे लबों की ख़मोशियों ने तिरे फ़साने को किस क़दर मुख़्तसर किया है बहुत सी आँखों में तीरगी घर बना चुकी है बहुत सी आँखों ने इंतिज़ार-ए-सहर किया है — Aanis Moin
ये क़र्ज़ तो मेरा है चुकाएगा कोई और दुख मुझ को है और नीर बहाएगा कोई और क्या फिर यूँँही दी जाएगी उजरत पे गवाही क्या तेरी सज़ा अब के भी पाएगा कोई और अंजाम को पहुँचूँगा मैं अंजाम से पहले ख़ुद मेरी कहानी भी सुनाएगा कोई और तब होगी ख़बर कितनी है रफ़्तार-ए-तग़य्युर जब शाम ढले लौट के आएगा कोई और उम्मीद-ए-सहर भी तो विरासत में है शामिल शायद कि दिया अब के जलाएगा कोई और कब बार-ए-तबस्सुम मिरे होंटों से उठेगा ये बोझ भी लगता है उठाएगा कोई और इस बार हूँ दुश्मन की रसाई से बहुत दूर इस बार मगर ज़ख़्म लगाएगा कोई और शामिल पस-ए-पर्दा भी हैं इस खेल में कुछ लोग बोलेगा कोई होंट हिलाएगा कोई और — Aanis Moin
हो जाएगी जब तुम से शनासाई ज़रा और बढ़ जाएगी शायद मेरी तन्हाई ज़रा और क्यूँँ खुल गए लोगों पे मेरी ज़ात के असरार ऐ काश कि होती मेरी गहराई ज़रा और फिर हाथ पे ज़ख़्मों के निशाँ गिन न सकोगे ये उलझी हुई डोर जो सुलझाई ज़रा और तरदीद तो कर सकता था फैलेगी मगर बात इस तौर भी होगी तेरी रुस्वाई ज़रा और क्यूँँ तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ भी किया लौट भी आया अच्छा था कि होता जो वो हरजाई ज़रा और है दीप तेरी याद का रौशन अभी दिल में ये ख़ौफ़ है लेकिन जो हवा आई ज़रा और लड़ना वहीं दुश्मन से जहाँ घेर सको तुम जीतोगे तभी होगी जो पस्पाई ज़रा और बढ़ जाएँगे कुछ और लहू बेचने वाले हो जाए अगर शहर में महँगाई ज़रा और इक डूबती धड़कन की सदा लोग न सुन लें कुछ देर को बजने दो ये शहनाई ज़रा और — Aanis Moin

Nazm

दानिश-वर कहलाने वालो तुम क्या समझो मुबहम चीज़ें क्या होती हैं थल के रेगिस्तान में रहने वाले लोगों तुम क्या जानो सावन क्या है अपने बदन को रात में अंधी तारीकी से दिन में ख़ुद अपने हाथों से ढाँपने वालो उर्यां लोगों तुम क्या जानो चोली क्या है दामन क्या है शहर-बदर हो जाने वालो फ़ुटपाथों पर सोने वालो तुम क्या समझो छत क्या है दीवारें क्या हैं आँगन क्या है इक लड़की का ख़िज़ाँ-रसीदा बाज़ू था में नब्ज़ के ऊपर हाथ जमाए एक सदा पर कान लगाए धड़कन साँसें गिनने वालो तुम क्या जानो मुबहम चीज़ें क्या होती हैं धड़कन क्या है जीवन क्या है सत्तरह-नंबर के बिस्तर पर अपनी क़ैद का लम्हा लम्हा गिनने वाली ये लड़की जो बरसों की बीमार नज़र आती है तुम को सोला साल की इक बेवा है हँसते हँसते रो पड़ती है अंदर तक से भीग चुकी है जान चुकी है सावन क्या है इस से पूछो काँच का बर्तन क्या होता है इस से पूछो मुबहम चीज़ें क्या होती हैं सूना आँगन तन्हा जीवन क्या होता है — Aanis Moin
तू मेरा है तेरे मन में छुपे हुए सब दुख मेरे हैं तेरी आँख के आँसू मेरे तेरे लबों पे नाचने वाली ये मासूम हँसी भी मेरी तू मेरा है हर वो झोंका जिस के लम्स को अपने जिस्म पे तू ने भी महसूस किया है पहले मेरे हाथों को छू कर गुज़रा था तेरे घर के दरवाज़े पर दस्तक देने वाला हर वो लम्हा जिस में तुझ को अपनी तन्हाई का शिद्दत से एहसास हुआ था पहले मेरे घर आया था तू मेरा है तेरा माज़ी भी मेरा था आने वाली हर साअ'त भी मेरी होगी तेरे तपते आरिज़ की दोपहर है मेरी शाम की तरह गहरे गहरे ये पलकों साए हैं मेरे तेरे सियाह बालों की शब से धूप की सूरत वो सुब्हें जो कल जागेंगी मेरी होंगी तू मेरा है लेकिन तेरे सपनों में भी आते हुए ये डर लगता है मुझ से कहीं तू पूछ न बैठे क्यूँँ आए हो मेरा तुम से क्या नाता है — Aanis Moin