Sheikh Ibrahim Zauq

Sheikh Ibrahim Zauq

@sheikh-ibrahim-zauq

Delhi· India

Sheikh Ibrahim Zauq shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Sheikh Ibrahim Zauq's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

दुनिया ने किस का राह-ए-फ़ना में दिया है साथ तुम भी चले चलो यूँही जब तक चली चले — Sheikh Ibrahim Zauq
आदमिय्यत और शय है इल्म है कुछ और शय कितना तोते को पढ़ाया पर वो हैवाँ ही रहा — Sheikh Ibrahim Zauq
हम नहीं वो जो करें ख़ून का दावा तुझ पर बल्कि पूछेगा ख़ुदा भी तो मुकर जाएँगे — Sheikh Ibrahim Zauq
ऐ शम्अ' तेरी उम्र-ए-तबीई है एक रात हँस कर गुज़ार या इसे रो कर गुज़ार दे — Sheikh Ibrahim Zauq
बोसा जो रुख़ का देते नहीं लब का दीजिए ये है मसल कि फूल नहीं पंखुड़ी सही — Sheikh Ibrahim Zauq

Ghazal

आते ही तू ने घर के फिर जाने की सुनाई रह जाऊँ सुन न क्यूँँकर ये तो बुरी सुनाई शिकवा किया जो हम ने गाली का आज उस से शिकवे के साथ उस ने इक और भी सुनाई मजनूँ ओ कोहकन के सुनते थे यार क़िस्से जब तक कहानी हम ने अपनी न थी सुनाई कुछ कह रहा है नासेह क्या जाने क्या कहेगा देता नहीं मुझे तो ऐ बे-ख़ुदी सुनाई कहने न पाए उस से सारी हक़ीक़त इक दिन आधी कभी सुनाई आधी कभी सुनाई सूरत दिखाए अपनी देखें वो किस तरह से आवाज़ भी न हम को जिस ने कभी सुनाई क़ीमत में जिंस-ए-दिल की माँगा जो 'ज़ौक़' बोसा क्या क्या न उस ने हम को खोटी-खरी सुनाई — Sheikh Ibrahim Zauq
अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएँगे तुम ने ठहराई अगर ग़ैर के घर जाने की तो इरादे यहाँ कुछ और ठहर जाएँगे ख़ाली ऐ चारागरो होंगे बहुत मरहम-दाँ पर मिरे ज़ख़्म नहीं ऐसे कि भर जाएँगे पहुँचेंगे रहगुज़र-ए-यार तलक क्यूँँ कर हम पहले जब तक न दो आलम से गुज़र जाएँगे शोला-ए-आह को बिजली की तरह चमकाऊँ पर मुझे डर है कि वो देख के डर जाएँगे हम नहीं वो जो करें ख़ून का दावा तुझ पर बल्कि पूछेगा ख़ुदा भी तो मुकर जाएँगे आग दोज़ख़ की भी हो जाएगी पानी पानी जब ये आसी अरक़-ए-शर्म से तर जाएँगे नहीं पाएगा निशाँ कोई हमारा हरगिज़ हम जहाँ से रविश-ए-तीर-ए-नज़र जाएँगे सामने चश्म-ए-गुहर-बार के कह दो दरिया चढ़ के गर आए तो नज़रों से उतर जाएँगे लाए जो मस्त हैं तुर्बत पे गुलाबी आँखें और अगर कुछ नहीं दो फूल तो धर जाएँगे रुख़-ए-रौशन से नक़ाब अपने उलट देखो तुम मेहर-ओ-माह नज़रों से यारों की उतर जाएँगे हम भी देखेंगे कोई अहल-ए-नज़र है कि नहीं याँ से जब हम रविश-ए-तीर-ए-नज़र जाएँगे 'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला उन को मय-ख़ाने में ले आओ सँवर जाएँगे — Sheikh Ibrahim Zauq