Ghulam Mohammad Qasir

Ghulam Mohammad Qasir

@ghulam-mohammad-qasir

Ghulam Muhammad Qasir shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ghulam Muhammad Qasir's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal

हर साल की आख़िरी शामों में दो चार वरक़ उड़ जाते हैं
अब और न बिखरे रिश्तों की बोसीदा किताब तो अच्छा हो

Ghulam Mohammad Qasir

अब उसी आग में जलते हैं जिसे
अपने दामन से हवा दी हम ने

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कोई मुँह फेर लेता है तो 'क़ासिर' अब शिकायत क्या
तुझे किस ने कहा था आइने को तोड़ कर ले जा

Ghulam Mohammad Qasir
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कहते हैं इन शाख़ों पर फल फूल भी आते थे
अब तो पत्ते झड़ते हैं या पत्थर गिरते हैं

Ghulam Mohammad Qasir
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जिसको इस फ़स्ल में होना है बराबर का शरीक
मेरे एहसास में तन्हाइयाँ क्यूँ बोता है

Ghulam Mohammad Qasir
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मैं बदन को दर्द के मल्बूस पहनाता रहा
रूह तक फैली हुई मिलती है उर्यानी मुझे

Ghulam Mohammad Qasir
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गलियों की उदासी पूछती है घर का सन्नाटा कहता है
इस शहर का हर रहने वाला क्यूँ दूसरे शहर में रहता है

Ghulam Mohammad Qasir

मिरे दिए ने अँधेरे से दोस्ती कर ली
मुझे तू अपने उजाले में जानता है तो आ

Ghulam Mohammad Qasir
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कश्ती भी नहीं बदली दरिया भी नहीं बदला
और डूबने वालों का जज़्बा भी नहीं बदला

Ghulam Mohammad Qasir

जिन की दर्द-भरी बातों से एक ज़माना राम हुआ
'क़ासिर' ऐसे फ़न-कारों की क़िस्मत में बन-बास रहा

Ghulam Mohammad Qasir
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नाम लिख लिख के तिरा फूल बनाने वाला
आज फिर शबनमीं आँखों से वरक़ धोता है

Ghulam Mohammad Qasir
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तेरी आवाज़ को इस शहर की लहरें तरसती हैं
ग़लत नंबर मिलाता हूँ तो पहरों बात होती है

Ghulam Mohammad Qasir
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ये भी इक रंग है शायद मिरी महरूमी का
कोई हँस दे तो मोहब्बत का गुमाँ होता है

Ghulam Mohammad Qasir
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बारूद के बदले हाथों में आ जाए किताब तो अच्छा हो
ऐ काश हमारी आँखों का इक्कीसवाँ ख़्वाब तो अच्छा हो

Ghulam Mohammad Qasir
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तुम यूँ ही नाराज़ हुए हो वर्ना मय-ख़ाने का पता
हम ने हर उस शख़्स से पूछा जिस के नैन नशीले थे

Ghulam Mohammad Qasir
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करूँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम
मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता

Ghulam Mohammad Qasir
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