हम ही हैं कश्तियाँ काग़ज़ से बनाने वाले
हम ही हैं दरिया को औक़ात दिखाने वाले
हो कहीं के नहीं तुम भी हो यहीं के या'नी
या'नी तुम भी हो फ़क़त ख़ाक़ उड़ाने वाले
दुनिया वालों को मैं बेकार समझता हूँ और
मुझ को बेकार समझते हैं ज़माने वाले
हम तो सुनते हैं निखरता है हुनर ऐसों से
हमें भी चाहिए कुछ ऐब गिनाने वाले
— Abdulla Asif















