होते हैं जिन के कान वो दीवार हम नहीं

ये भी नहीं कि साहिब-ए-असरार हम नहीं

माना हिमायती नहीं फ़स्ल-ए-बहार के
फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ के भी तो तरफ़दार हम नहीं

होते नहीं हैं इश्क़ में दानिशवरी से काम
मौला तेरे करम से समझदार हम नहीं

फ़िरदौस माँग लें वो भी सजदों के मोल में
ज़ाहिद नहीं पर इतने ख़ताकार हम नहीं

कौसर को जाम जाम को कौसर बता दिया
ख़ुद सोचते हैं सोच गिरफ़्तार हम नहीं

अपने जनाज़े में भी न कंधा लगाएँगे
ना-हक़ सही पर इतने गुनहगार हम नहीं

ख़ुद राम जी के शहर को मिस्मार कर के आप
कहते हो रावणों के तरफ़दार हम नहीं

उस ने भी कह दिया नहीं इस बार भी नहीं
हम ने भी कह दिया नहीं हर बार हम नहीं

— Abdulla Asif

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