दिल के दरबार में आता हूँ क़सीदे ले कर
लौट जाता हूँ उमीदों के लिफ़ाफ़े ले कर
टॉफ़ियाँ बेच रहे हैं यहाँ नन्हें बच्चे
और मैं बाज़ार में आया हूँ खिलौने ले कर
उस की सूरत से शिफ़ा पाते हैं बीमार-ए-शहर
घर को जाते हैं तबीब अपने ख़सारे ले कर
तज़्किरा अपनी वफ़ाओं का बहुत करती हो
मर न जाऊँ कहीं एहसान तुम्हारे ले कर
क़त्ल करने से भी बदला मेरा पूरा न हुआ
फिर से मक़्तल न चला जाऊँ जनाज़े ले कर
इक समुंदर ने किनारों की शिकायत न सुनी
तश्ना-लब उतरे हैं पानी में सफ़ीने ले कर
बात जब आ ही गई है तो कहे देते हैं
आप तो जीते हैं एहसान हमारे ले कर
— Abdulla Asif















