मेरी ख़ामुशी का तक़ाज़ा है कि वज़ाहतों से जवाब दे
तू क़रार अपना न याद रख मेरी चाहतों का हिसाब दे
मैं तसव्वुरों को न रोक पाया निकल पड़े हैं वो अर्श पर
मेरी जुरअतों को मुआ'फ़ कर मेरे हौसलों को उक़ाब दे
न हरीफ़ ऐसे भी दे मुझे कि मुझे दिलेरी से डर लगे
मेरे दुश्मनों कि तू ख़ैर कर मेरे दुश्मनों को तू ताब दे
मैं यहाँ नहीं तो कहाँ हूँ मैं जो कहीं नहीं तो कहाँ हूँ मैं
मैं यहाँ नहीं हूँ वो ठीक है तू कहीं नहीं का जवाब दे
— Abdulla Asif















