ज़ुल्म के दश्त में बरसात के आसार हैं हम

फ़ौज-ए-कूफ़ा की रविश को रह-ए-पुर-ख़ार हैं हम

तुम ज़बाँ काटो हमारी या सर-ए-दार करो
ज़िक्र-ए-हैदर के लिए आक़िब-ए-तम्मार हैं हम

हक़-बयानी से ये सूली हमें क्या रोकेगी
कहीं ईसा तो कहीं मीसम-ए-तम्मार हैं हम

या अली ख़ुल्द नहीं माँगते ज़ारी के इवज़
क़ब्र में आप के बस तालिब-ए-दीदार हैं हम

ख़ालिक-ए-कुल तेरे मूसा से तक़ल्लुम की क़सम
शाह-ए-फ़िरदौस के ही घर के वफ़ादार हैं हम

मसनद-ए-अद्ल पे बैठा हुआ है शाह-ए-शाम
और ख़ुदा इश्क़-ए-हुसैनी में गिरफ़्तार हैं हम

ढूँढ़िए आप रिवायत में यज़ीदों के वक़ार
और कहिए कि फ़क़त साहिब-ए-किरदार हैं हम

जंग करनी है तो ले आओ तुम अपना लशकर
बात करनी है तो आओ सर-ए-दरबार हैं हम

— Abdulla Asif

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