निगहबानी में जन्नत की वही फ़ौज-ए-बहत्तर है

यज़ीदों ख़्वाब कौसर के न देखो तो ही बेहतर है

फ़रिश्ते आसमानों से ज़मीं पर तो उतर आए
मेरी सोहबत न रास आ जाए बस इस बात का डर है

परस्तिश राह चलते देवताओं की नहीं करता
तकब्बुर तुम इसे समझो न मेरा तो ही बेहतर है

कहा जबसे कि करता हूँ यहाँ शीशा-गरी का काम
कोई कंकड़ उठा लाया किसी के पास पत्थर है

अभी इतनी सहूलत है यहाँ सब बे-गुनाहों को
कि ख़ुद चुन सकते हैं वो कौन सी ज़ंजीर बेहतर है

मेरे क़दमों में गिरते हैं तजल्ली के सभी तालिब
किसी मेहताब को लगता है वो मुझ से भी बढ़कर है

इलाही हो कभी मुझ पर इनायत तूर जैसी अब
या बस तेरे चहेतों में फ़क़त तेरा पयम्बर है

मैं अपने जिस्म-ए-ख़स्ता की मरम्मत कर तो लूँ लेकिन
बड़े मग़रूर मरहम हैं बड़ा खु़द्दार पैकर है

उधर तन्हा खड़ा है झूठ लेकिन फिर भी है बे-ख़ौफ़
इधर सच भीड़ में हैं और उसे पस्पाई का डर है

सहारों को हमारी दस्तरस से दूर रहने दो
बदल सकती नहीं क़िस्मत मुसीबत ही मुक़द्दर है

बचाकर जिस को लाए थे लगाकर जान की बाज़ी
हमारी पुश्त में पैवस्त उसी इंसाँ का ख़ंजर है

उतारा है ग़ज़ल में जबसे अपने दिल के ज़ख़्मों को
लबों पर सारे इंसानों के बस लफ़्ज़-ए-मुक़र्रर है

वसीयत याद रक्खो जाबिर-ओ-जब्बार माँओं की
वगरना कोई आएगा कहेगा नाम हैदर है

अजब तरतीब से इस बार घूमा वक़्त का पहिया
जो कल इस घर का मालिक था वो आज इस घर का नौकर है

कभी मैं इस्तरी करता नहीं हूँ आस्तीं अपनी
मुझे मालूम है 'आसिफ़' मेरे यारों का ये घर है

किसे रोकें अब 'आसिफ़' हम किसे पहलू से जाने दें
उदासी जावेदानी है मसर्रत कम मुयस्सर है

— Abdulla Asif

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