मेरे दुश्मन को नहीं आती अदावत की तमीज़

ऐ मुनाफ़िक़ तू बता जब्र-ए-निहायत की तमीज़

हम फ़क़ीराने नज़फ़ हाथ में काँसा ले कर
बादशाहों को सिखाते हैं सखावत की तमीज़

एक ग़लती पे मेरी तर्क-ए-त'अल्लुक़ की दुआ
यार मालूम नहीं तुझ को शिकायत की तमीज़

इतना आसान नहीं इश्क़ का सहरा कि फ़क़त
ख़ाक उड़ाने से ही आ जाए मुहब्बत की तमीज़

हर कोई तेरा तरफ़दार बना बैठा है
हर किसी को नहीं मालूम हिमायत की तमीज़

— Abdulla Asif

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