यही हुआ न रहा जब भी अपनी हद में इश्क़
पड़ा मिला है हमें हादसों की ज़द में इश्क़
कभी तो आप रहें एक बात पर क़ायम
तबाह हो न कहीं इस क़ुबूल-ओ-रद्द में इश्क़
ये नफ़रतें ये बग़ावत अज़ल से जारी है
कभी हुआ ही नहीं नेक और बद में इश्क़
वो सोचता है के इस से जलेगा दिल मेरा
लड़ा रहा है हरीफ़ों से इस हसद में इश्क़
नबी के नक़्श-ए-क़दम पर मैं चलता हूँ 'साहिल'
करेंगे मुझ से नकीरैन भी लहद में इश्क़
— A R Sahil "Aleeg"















