जो मुझे हर तरफ़ से घेरे हैं
ये ग़मों के हसीं अँधेरे हैं
जिन को रहबर समझ रहा है तू
ग़ौर से देख सब लुटेरे हैं
अब किधर आशियाँ बनाएँ हम
चार-सू बिजलियों के डेरे हैं
मुँह छुपाएँ घटाएँ शरमाएँ
बाल उस ने भी क्या बिखेरे हैं
लब पे ता'रीफ़ें हैं रक़ीबों की
वैसे वो जाँ-निसार मेरे हैं
और तो कुछ नहीं बचा है इधर
दिल में ज़ख़्मों के उजड़े डेरे हैं
दरमियाँ यूँ हुआ है बँटवारा
सब ख़ुशी उन की रंज मेरे हैं
गुल तो सारे निगल चुकी है ख़िज़ाँ
अब तो शाख़ों को ख़ार घेरे हैं
मुझ को 'साहिल' नवाज़ते हैं ग़म
जितने ये ग़म-गुसार मेरे हैं
— A R Sahil "Aleeg"















