मानेंगे फूँक-फाँक के घर 'इश्क़ और तुम
कर देंगे मुझको ज़ेर-ओ-ज़बर 'इश्क़ और तुम
इक हम है जिसको होश नहीं ख़ुद के हाल का
रखते हैं कुल जहाँ की ख़बर 'इश्क़ और तुम
आता है जी में आग लगा दूँ जहान को
पड़ते हैं जब भी मुझ पे बिफर 'इश्क़ और तुम
मुझको ख़बर है कर के वफ़ाओं का मौइदत
जाएँगे एक रोज़ मुकर 'इश्क़ और तुम
ये सोचना है अब कि किधर जाएँगे ये पाँव
उस सिम्त है जहान इधर 'इश्क़ और तुम
मानेंगे मेरी नाव डुबो कर ही एक दिन
डाले हुए हैं दिल में भँवर 'इश्क़ और तुम
'साहिल' क़रार आए तो कैसे मुझे भला
दिन भर दुखाए रहते हो सर 'इश्क़ और तुम
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