करता है आशिक़ों के कलेजे पे वार इश्क़
जोबन पे ले के आता है जब भी निखार इश्क़
अच्छा नहीं है हिज्र ये दोनों के वास्ते
कुछ बे-क़रार हम हैं तो कुछ बे-क़रार इश्क़
है कौन बे-वफ़ा ये बताएगा एक दिन
ख़ुद फ़ैसला करेगा मियाँ आर-पार इश्क़
ये खेल हुस्न का है समझिए इसे हुज़ूर
करता नहीं दिलों का कोई कार-बार इश्क़
कुछ तो सुबूत अपनी वफ़ाओं के छोड़ दे
कैसे करेगा कोई तेरा ए'तिबार इश्क़
इक हम हैं हम से एक सँभाला नहीं गया
कुछ लोग कर रहे हैं यहाँ चार चार इश्क़
महफ़िल में देख उन को निगाहें यूँ फेर लीं
'साहिल' को कर न दे ये कहीं शर्मसार इश्क़
— A R Sahil "Aleeg"















