"मैं फ़ैज़ नहीं"
मैं फ़ैज़ नहीं काम या इश्क़ अधूरा छोड़ूँगा
इश्क़ को इश्क़ ही और क़ाम को काम समझता हूँ
जिस में उलझूँ जिस्म-ओ-जाँ से उलझता हूँ
काम का इश्क़ के आड़े आना ढब होता है
काम कोई भी हो इश्क़ बिना कब होता है
शायद इश्क़ से फ़ैज़ के काम अटकते होंगे
या वो काम के पीछे रोज़ भटकते होंगे
इस उलझन ने फ़ैज़ का दिल ही तोड़ दिया हो
यूँ भी काम-ओ-इश्क़ को फ़ैज़ ने छोड़ दिया हो
कोई कह दे इश्क़ बिना कुछ भाता है क्या
मुझ से पूछे इश्क़ का काम से नाता है क्या
इश्क़ के नाम पे दम तोडूँगा जब तोड़ूँगा
इश्क़ हो या काम कोई कामिल छोड़ूँगा
मैं फ़ैज़ नहीं काम या इश्क़ अधूरा छोड़ूँगा
— A R Sahil "Aleeg"















