Naviii dar b dar

Naviii dar b dar

@naviiiarya667

Naviii dar b dar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Naviii dar b dar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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Sher

हर नज़ारे की चमक फीकी लगे दीद जब से हो गई है यार की — Naviii dar b dar
उस के चेहरे से नज़र अब भला कैसे हटे उस में दिखती है झलक मुझ को मेरे यार की — Naviii dar b dar
कभी राह अपनी मुयस्सर भी होगी ग़रीबी जो हम को सताए हुए है — Naviii dar b dar
किसी ग़म की भरपाई कैसे करे हम मुहब्बत की रुस्वाई कैसे करे हम — Naviii dar b dar
मुहब्बत के ग़म में मुतअस्सिर हैं हम भी सभी के लिए बस मुसाफ़िर हैं हम भी — Naviii dar b dar
इक सिवा अब तुम्हारे यूँँ राहत नहीं इश्क़ को अब किसी की भी चाहत नहीं — Naviii dar b dar
यूँँ सपने भी मन में सजाए तो कैसे यहाँ मुफ़लिसी के सताए हैं हम भी — Naviii dar b dar
लगती है सब को कितनी आसान ज़िंदगी होता नहीं है जब तक आफ़त से सामना — Naviii dar b dar
माना हैं तल्ख़ तेवर दुनिया के वास्ते पर आदमी मैं दिल का इतना बुरा नहीं — Naviii dar b dar
इस यक़ीं में अब भी मैं खोया हुआ सा हूँ याद करता है वो ये हिचकी बताती है — Naviii dar b dar
इक मुहब्बत की वो दुनिया जो बनाई थी कभी अपनी अपनी ज़िंदगी में भूल बैठे हम सभी — Naviii dar b dar
यूँँ देगा तवज्जोह कोई तो यहाँ पर कभी ये ज़माना भी समझेगा हम को — Naviii dar b dar
जब मुकम्मल नहीं राह यूँँ फिर सुकूँ कैसा है अब नहीं पास वो पाने का ये जुनूँ कैसा है — Naviii dar b dar

Ghazal

हमारी ग़रीबी निभाती है रिश्ते रईसी अमीरी तुम्हीं को मुबारक — Naviii dar b dar

Nazm

"भोपाल" बहुत बरस पहले की एक वो बात निगली कितनी ज़िन्दगियाँ चंद पलों की एक रात क्या बच्चे क्या जवाँ बिछड़ गए न जाने कहाँ थी जो कभी सुहागिन आज बन गई थी अभागिन हर तरफ़ था बेबसी का नज़ारा क्या था मेरा क्या तुम्हारा हाथों में वो बच्चे मानो चैन की नींद सो रहे हों हर तरफ़ चित्कारें मानो अपनो को खो रहे हों मेहँदी जो हाथों से उतरी भी न थी अश्कों से मानों ख़ुद को भिगो रहे हों था कैसा वो भयानक मंज़र ज़मीं ख़ुद हो गई थी बंजर रोने लगे थे हर जज़्बात बदल गए चंद पलों में हालात बहुत बरस पहले की एक वो बात निगली कितनी ज़िन्दगियाँ चंद पलों की एक रात था कैसा वो हर एक पल सदमों भरा थे हर तरफ़ सह में लोग नज़रें व्याकुल मन अधमरा किस शब्दों में बयाँ करूँँ वो हालात जब अपने खोते चले गए मौत की आग़ोश में सोते चले गए वो कैसी हवा चली थी ज़हर भरी वो एक भयानक रात थी क़हर भरी रूह काँप उठती है मेरी वो मंज़र सोच कर दुनिया सभी की उजड़ी थी जो थी हरी भरी सोचता हूँ 'नवी' इल्ज़ाम किस को दूँ इंतक़ाम किस सेे लूँ मैं यूँँ ही वक़्त को कोसता रहा आँखों में थी नमी गहरी साँस लिए सोचता रहा हे ऊपरवाले रहमत अता कर हर इंसान पर इंसानियत ज़िंदा रहे हर अंजाम पर मज़हबों में फ़र्क न लाए कोई कहीं यक़ीन करें उस अल्लाह उस भगवान पर शामिल है 'नवी' उस हर ग़म में जिस ने खोया अपना लाल वो टीस अभी भी मिटी नहीं जिस का दंश अब भी झेल रहा भोपाल — Naviii dar b dar
"किरदार सियासत के" सियासत के क़िरदार बहुत हैं कौन है क़ाबिज़ यहाँ हक़दार बहुत हैं हूँ कश्मकश में निशब्द ज़बाँ भी फिर भी दिल में यूँँ ग़ुबार बहुत हैं मेरी मिलक़ियत तुझ सेे जुड़ी ऐ मेरे वतन सींचता हूँ वतनपरस्ती का वो चमन कैसे कहूँ दाग़दार नहीं हस्ती यहाँ किसी की सफ़ेद लिबासों में भी छुपे दाग़दार बहुत हैं एक क़तरा लहू बिछाकर तो देखो इस मिट्टी के लिए जाँ लुटाकर तो देखो मरना है तो देश के लिए कुछ कर के मरो कह सके हिफ़ाज़त को यहाँ पहरेदार बहुत हैं फ़र्क ख़ुदा या भगवानों में नहीं इंसानियत बिकती दुकानों में नहीं किसी को मुस्कुराहट देकर तो देखो एक मुस्कुराहट के यहाँ ख़रीदार बहुत हैं फ़र्क न करना कि ख़ून का रंग भी बदलता है 'नवी' हिमायती उस का जो इंसानियत की राह पर चलता है फूँक ही डाला था चमन को कुछ सियासतदारों ने ऐसी सोच के यहाँ बीमार बहुत हैं उठो चैन से सोने वालों झूठी सियासत पर रोने वालों अब कर गुजरने का वक़्त है आया इस अन्दरूनी कलह को पिरोने वालो किस किस से बचाऊँ मुल्क को मेरे यहाँ अपने ही छुपे बैठे ग़द्दार बहुत हैं — Naviii dar b dar
"पिता" यूँँ ज़िन्दगी ठहर सी गई तुम्हारे चले जाने से उम्मीद की किरण भी धूमिल हो गई तुम्हारे लौट कर कभी न आने से हर सुब्ह तुम्हारे हाथों को पकड़ कर उन नन्हे क़दमों ने सीखा था चलना हर शाम सीने पर कान को टिका सुना धड़कनों को गिनना साए में था तुम्हारी वो बचपन मेरा वो तुतलाकर पापा कहना वो लड़कपन मेरा कैसे भुला दूँ वो यादें बचपन की फिर किसी बहाने से यूँँ ज़िन्दगी ठहर सी गई तुम्हारे चले जाने से रौशन है वो राह अब तक जो दिखाई थी तुम ने हर क़दम उसी मंज़िल की ओर बढ़ रहे हैं जो कभी बताई थी तुम ने उम्मीद अब भी कहती है कि लौट आओ और हौसला यही कहता है मुझ सेे 'नवी' कि बढ़ा चल मंज़िलों की ओर क्योंकि ये वक़्त ज़ालिम है नहीं रुक सकता किसी शख़्स के चले जाने से यूँँ ज़िन्दगी ठहर सी गई तुम्हारे चले जाने से साथ हो तुम अब भी मेरे चरणों में है तुम्हारी मेरे सुख दुख के सवेरे बना रहूँ बेटा हर जनम में तुम्हारा माँ का आँचल ओढ़ लूँ और बनु पिता का दुलारा हर दुआ में माँगता हूँ हर ख़ुशियाँ सारी हर सजदे में माँगता हूँ वो पल सुहाने से यूँँ ज़िन्दगी ठहर सी गई तुम्हारे चले जाने से — Naviii dar b dar
"मेरे ख़्वाब" है अधूरी सी ज़िन्दगी यूँँ पास कोई हमराह नहीं चाह सब कुछ पाने की मगर दिल फिर भी गुमराह नहीं काश ये राह मुकम्मल हो जाए कभी कुछ ख़्वाब मेरे भी हैं अपने जीवन की उलझनों को दरकिनार कैसे कर लूँ ख़ुद को यूँँ किसी दिल में गिरफ़्तार कैसे कर लूँ मैं वो मौज हूँ साहिल पास नहीं जिस के वो ना-उम्मीद हूँ कोई आस नहीं जिस के काश ये ख़्वाहिशें परवाज़ बन जाएँ कभी कुछ ख़्वाब मेरे भी हैं ये दिल भी अजीब सा क्यूँ है वो पराया ही सही पर क़रीब सा क्यूँ है कश्मकश में हूँ 'नवी' कि क्या जवाब दूँ मन में आता वो सवाल फ़रेब सा क्यूँ है वो चंद लफ़्ज़ों की ख़ामोशी आग़ाज़ बन जाए कभी कुछ ख़्वाब मेरे भी हैं — Naviii dar b dar
"बदलता दौर" कुछ नए चले गए कुछ पुराने चले गए ज़िन्दगी की लीक पर कुछ अफ़्साने चले गए मैं तो निकला था कारवाँ-ए-जुनूँ ले कर कुछ राहों में भटके तो कुछ मयख़ाने चले गए अज़ीब हालात हो गए अब श्रीमती जी मुँह चिढ़ाकर के बोली पुराने ख़यालात हो गए अब क्यूँ रखते हो रंजिश ज़माने से बहुत सवालात हो गए अब ये दुनिया नहीं समझने वाली किसी की फिर क्यूँ उन्हें समझाने चले गए मैं वक़्त का दस्तूर समझाने के कोशिश में था हालात को दिल से सुलझाने की कोशिश में था भीड़ में समझा रहा था बातों को अपनी कुछ समझे भी तो कुछ बातों को पचाने चले गए अब हर रिवाज़ बदल गया जीने का अंदाज़ बदल गया कभी चौपालों से सजते थे जो आँगन वो हुक्कों का सरताज बदल गया वो नीम का पेड़ वो आँगन में पड़ी खाट अब कहाँ वो पहले सी ठाठ हर सुब्ह का वो आग़ाज़ बदल गया नई राह दिखाते थे जो रहनुमा उस हसीन दुनिया के वो सियाने चले गए कुछ नए चले गए कुछ पुराने चले गए ख़ुश नहीं हूँ ज़माने की बे-रुख़ी से क्यूँ जलता है आदमी ही आदमी से मौत तो आनी है जब ख़ुशी से तो दो पल ख़ुशियाँ उधार ले ज़िन्दगी से मैं मन को ले कर आख़िर जाऊँ भी तो कहाँ अब ज़िन्दगी जीने के वो बहाने चले गए कुछ नए चले गए कुछ पुराने चले गए — Naviii dar b dar
"सियासत का शोर" है हर तरफ़ शोर सियासत का न मुहाना न छोर सियासत का खेल के पाले सी इस की दुनिया फिर भी जलवा चारों ओर सियासत का है कहीं घोड़े गाय की सियासत अब तो कहीं अपने पराए की सियासत अब कहीं धर्म और जाति के मुद्दे तो कहीं छूटते साए की सियासत अब बंद ज़बाँ में भी बता जाते है वो मक़सद फिर भी ख़र्चा हर ओर सियासत का मुल्क की हिफ़ाज़त की अब कौन सोचता है सत्ता के हाथों में बस पैसा नोचता है है विवादों में जो घिरने वाला फिर भी नहीं वो चोर सियासत का है कहीं मस्जिदों और मंदिरों की लड़ाई कहीं बदज़बानी कहीं ख़ंजरों की लड़ाई भूखे से पूछो एक निवाले की क़ीमत है जो शिकार इस घोर सियासत का — Naviii dar b dar