"क़द्र"
मेरी बातों को अपने दिल में याद कौन रखेगा
ज़िंदगानी की रिवायतों को आबाद कौन रखेगा
जब मुंसिफ़ का इंसाफ़ दिलों को जोड़ डालेगा
तब भला अपने घरों को बर्बाद कौन रखेगा
क़िस्मतों को कोसने से कुछ हासिल नहीं होता
वगरना उस के दर पे दु'आओं की फ़रियाद कौन रखेगा
हर ख़्वाब पूरे न हो पाएँ अगर
तो उन हसीं सपनों की बुनियाद कौन रखेगा
चल रहे हैं जो मंज़िलों को पाने की तलाश में
ठोकरों में भी हौसलें की दाद कौन रखेगा
कुछ उसूलों के पाबंद हम भी नज़र आते हैं 'नवी'
मेरी उन नादानियों को मेरे बा'द कौन रखेगा
ज़रा क़द्र करो माँ के साए की भी तुम
उस के जाने से फिर सिर पे हाथ कौन रखेगा
— Naviii dar b dar















