"बदलता दौर"
कुछ नए चले गए कुछ पुराने चले गए
ज़िन्दगी की लीक पर कुछ अफ़्साने चले गए
मैं तो निकला था कारवाँ-ए-जुनूँ ले कर
कुछ राहों में भटके तो कुछ मयख़ाने चले गए
अज़ीब हालात हो गए अब
श्रीमती जी मुँह चिढ़ाकर के बोली
पुराने ख़यालात हो गए अब
क्यूँ रखते हो रंजिश ज़माने से
बहुत सवालात हो गए अब
ये दुनिया नहीं समझने वाली किसी की
फिर क्यूँ उन्हें समझाने चले गए
मैं वक़्त का दस्तूर समझाने के कोशिश में था
हालात को दिल से सुलझाने की कोशिश में था
भीड़ में समझा रहा था बातों को अपनी
कुछ समझे भी तो कुछ बातों को पचाने चले गए
अब हर रिवाज़ बदल गया
जीने का अंदाज़ बदल गया
कभी चौपालों से सजते थे जो आँगन
वो हुक्कों का सरताज बदल गया
वो नीम का पेड़ वो आँगन में पड़ी खाट
अब कहाँ वो पहले सी ठाठ
हर सुब्ह का वो आग़ाज़ बदल गया
नई राह दिखाते थे जो रहनुमा
उस हसीन दुनिया के वो सियाने चले गए
कुछ नए चले गए कुछ पुराने चले गए
ख़ुश नहीं हूँ ज़माने की बे-रुख़ी से
क्यूँ जलता है आदमी ही आदमी से
मौत तो आनी है जब ख़ुशी से
तो दो पल ख़ुशियाँ उधार ले ज़िन्दगी से
मैं मन को ले कर आख़िर जाऊँ भी तो कहाँ
अब ज़िन्दगी जीने के वो बहाने चले गए
कुछ नए चले गए कुछ पुराने चले गए















