"सियासत का शोर"
है हर तरफ़ शोर सियासत का
न मुहाना न छोर सियासत का
खेल के पाले सी इस की दुनिया
फिर भी जलवा चारों ओर सियासत का
है कहीं घोड़े गाय की सियासत अब
तो कहीं अपने पराए की सियासत अब
कहीं धर्म और जाति के मुद्दे
तो कहीं छूटते साए की सियासत अब
बंद ज़बाँ में भी बता जाते है वो मक़सद
फिर भी ख़र्चा हर ओर सियासत का
मुल्क की हिफ़ाज़त की अब कौन सोचता है
सत्ता के हाथों में बस पैसा नोचता है
है विवादों में जो घिरने वाला
फिर भी नहीं वो चोर सियासत का
है कहीं मस्जिदों और मंदिरों की लड़ाई
कहीं बदज़बानी कहीं ख़ंजरों की लड़ाई
भूखे से पूछो एक निवाले की क़ीमत
है जो शिकार इस घोर सियासत का















