"किरदार सियासत के"
सियासत के क़िरदार बहुत हैं
कौन है क़ाबिज़ यहाँ हक़दार बहुत हैं
हूँ कश्मकश में निशब्द ज़बाँ भी
फिर भी दिल में यूँ ग़ुबार बहुत हैं
मेरी मिलक़ियत तुझ से जुड़ी ऐ मेरे वतन
सींचता हूँ वतनपरस्ती का वो चमन
कैसे कहूँ दाग़दार नहीं हस्ती यहाँ किसी की
सफ़ेद लिबासों में भी छुपे दाग़दार बहुत हैं
एक क़तरा लहू बिछाकर तो देखो
इस मिट्टी के लिए जाँ लुटाकर तो देखो
मरना है तो देश के लिए कुछ कर के मरो
कह सके हिफ़ाज़त को यहाँ पहरेदार बहुत हैं
फ़र्क ख़ुदा या भगवानों में नहीं
इंसानियत बिकती दुकानों में नहीं
किसी को मुस्कुराहट देकर तो देखो
एक मुस्कुराहट के यहाँ ख़रीदार बहुत हैं
फ़र्क न करना कि ख़ून का रंग भी बदलता है
'नवी' हिमायती उस का जो इंसानियत की राह पर चलता है
फूँक ही डाला था चमन को कुछ सियासतदारों ने
ऐसी सोच के यहाँ बीमार बहुत हैं
उठो चैन से सोने वालों
झूठी सियासत पर रोने वालों
अब कर गुजरने का वक़्त है आया
इस अन्दरूनी कलह को पिरोने वालो
किस किस से बचाऊँ मुल्क को मेरे
यहाँ अपने ही छुपे बैठे ग़द्दार बहुत हैं















