"पिता"

यूँ ज़िन्दगी ठहर सी गई
तुम्हारे चले जाने से
उम्मीद की किरण भी धूमिल हो गई
तुम्हारे लौट कर कभी न आने से

हर सुब्ह तुम्हारे हाथों को पकड़ कर
उन नन्हे क़दमों ने सीखा था चलना
हर शाम सीने पर कान को टिका
सुना धड़कनों को गिनना

साए में था तुम्हारी वो बचपन मेरा
वो तुतलाकर पापा कहना वो लड़कपन मेरा

कैसे भुला दूँ वो यादें बचपन की
फिर किसी बहाने से
यूँ ज़िन्दगी ठहर सी गई
तुम्हारे चले जाने से

रौशन है वो राह अब तक
जो दिखाई थी तुम ने
हर क़दम उसी मंज़िल की ओर बढ़ रहे हैं
जो कभी बताई थी तुम ने
उम्मीद अब भी कहती है कि लौट आओ

और हौसला यही कहता है मुझ से 'नवी'
कि बढ़ा चल मंज़िलों की ओर
क्योंकि ये वक़्त ज़ालिम है नहीं रुक सकता
किसी शख़्स के चले जाने से

यूँ ज़िन्दगी ठहर सी गई
तुम्हारे चले जाने से

साथ हो तुम अब भी मेरे
चरणों में है तुम्हारी
मेरे सुख दुख के सवेरे
बना रहूँ बेटा हर जनम में तुम्हारा
माँ का आँचल ओढ़ लूँ
और बनु पिता का दुलारा
हर दुआ में माँगता हूँ हर ख़ुशियाँ सारी
हर सजदे में माँगता हूँ वो पल सुहाने से

यूँ ज़िन्दगी ठहर सी गई
तुम्हारे चले जाने से

— Naviii dar b dar

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