"जान-ए-बहार"
मुद्दतों बा'द वो मिलता ही गया जान-ए-बहार
दोष अपनों पे यूँ मढ़ता ही गया जान-ए-बहार
किस तरह उस को भुलाया मैं ने शाम-ओ-सहर
प्यार मुझ से ही वो करता ही गया जान-ए-बहार
किस तरह इश्क़ में सूरत हसीं यूँ लगती है
उम्र कितनी भी हो पर बेहतरीन यूँ लगती है
अब तो बस आँखों से मैं बात किया करता हूँ
बात कहने से मैं डरता ही गया जान-ए-बहार
अब तो हर एक बात पे यूँ ज़िक्र उन का आता है
किस पे हम दिल हार गए कुछ न सूझ पाता है
निकले वो जब चौक मोहल्ले गली चौबारे से
प्यार नदियों सा उमड़ता ही गया जान-ए-बहार
— Naviii dar b dar















